2021 पर एक नज़र: जलवायु कार्रवाई, या आँय, बाँय, शाँय?

इस वर्ष, संयुक्त राष्ट्र समर्थित रिपोर्टों और ग्लासगो में यूएन के वार्षिक जलवायु सम्मेलन (कॉप26) में निरन्तर यह कड़ा सन्देश दोहराया गया: मानव गतिविधियों की वजह से जलवायु परिवर्तन, ना केवल तात्कालिक बल्कि पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिये बहुत बड़ा ख़तरा है. क्या जलवायु संकट से निपटने के लिये अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों के सार्थक नतीजे सामने आएँगे?

'हम अनजान रास्ते पर बढ़ रहे हैं'

भयावह जलवायु परिवर्तन से बचने के लिये, वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से अधिकतम 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की आवश्यकता है, लेकिन अगले पांच वर्षों में दुनिया का तापमान बढ़ने की सम्भावना बढ़ती जा रही है.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की वैश्विक जलवायु रिपोर्ट (State of the Global Climate) में अप्रैल में चेतावनी दी गई कि वैश्विक औसत तापमान पहले ही लगभग 1.2 डिग्री बढ़ चुका है. 

वहीं अक्टूबर में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के एक अध्ययन से पता चला कि यदि हानिकारक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के संकल्पों को मज़बूती नहीं दी गई, तो इस सदी में दुनिया 2.7 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होने की राह पर होगी.

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की कई अन्य रिपोर्टों के मुताबिक़, ग्रीनहाउस गैस सघनता रिकॉर्ड स्तर पर है और पृथ्वी ख़तरनाक स्तर पर गर्म होने की ओर अग्रसर है, जिसके वर्तमान व भविष्य की पीढ़ियों के लिये चिन्ताजनक परिणाम हो सकते हैं.

जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम, लगातार चरम मौसम की घटनाओं के रूप में देखे जाते हैं, और इस वर्ष इनमें बढ़ोत्तरी हुई है. 

जैसेकि कई पश्चिमी यूरोपीय देश जुलाई में भयावह बाढ़ की चपेट में आए, और वहाँ अनेक मौतें हुईं. 

अगस्त में भूमध्यसागरीय देशों और रूस में जंगलों में विनाशकारी आग फैल गई. 

WMO के आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले कुछ दशकों में, प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि से ग़रीब देश असमान रूप से प्रभावित हुए हैं और पिछले साल, अफ़्रीका में बढ़ती खाद्य असुरक्षा, ग़रीबी और विस्थापन की ये एक बड़ी वजह साबित हुए हैं.

निचले तटीय इलाक़ों वाले देश, किरिबाती में तूफ़ानों और बाढ़ से नुक़सान बढ़ रहा है.
© UNICEF/Vlad Sokhin
निचले तटीय इलाक़ों वाले देश, किरिबाती में तूफ़ानों और बाढ़ से नुक़सान बढ़ रहा है.

दुष्प्रभावों की आँच

मौजूदा दौर का विरोधाभास यह है कि जलवायु संकट से सबसे अधिक पीड़ित वे देश हैं जो कि इसके लिये सबसे कम ज़िम्मेदार हैं.

इसके मद्देनज़र, अनेक देशों की सरकारों और जलवायु कार्यकर्ताओं ने बार-बार अनुकूलन के मुद्दे को एजेण्डे में सबसे ऊपर रखने पर ज़ोर दिया है.

अनुकूलन, जलवायु परिवर्तन पर वर्ष 2015 के पेरिस समझौते का एक प्रमुख स्तम्भ है. इसका उद्देश्य है – जलवायु परिवर्तन के असर के प्रति सहनक्षमता बढ़ाना, और विभिन्न देशों व समुदायों की इसके प्रति सम्वेदनशीलता में कमी लाना.

हालाँकि, लघु द्वीपीय विकासशील देशों के लिये समय बीतता जा रहा है, चूँकि बढ़ते समुद्री स्तर से इनके जलमग्न होने का जोखिम बढ़ रहा है. 

मगर, उनकी सहायता के लिये आवश्यक वित्त पोषण अभी भी नहीं उपलब्ध हो पा रहा है.

नवम्बर में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) की एक प्रमुख रिपोर्ट में कहा गया कि अगर देश आज भी उत्सर्जन बन्द कर दें, तब भी जलवायु पर इसका असर आने वाले दशकों तक बना रहेगा. 

यूएन एजेंसी की प्रमुख, इन्गर एण्डरसन ने कहा, "हमें जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुक़सान को कम करने के लिये, अनुकूलन हेतु रक़म की महत्वाकाँक्षा और कार्यान्वयन में बड़े बदलाव की ज़रूरत है. और इसकी हमें तत्काल आवश्यकता है."

जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल जारी 

यदि हमें तापमान वृद्धि को सीमित करना हैं, तो दुनिया भर में ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों के उपयोग की ओर बढ़ना होगा और कोयले के इस्तेमाल का अन्त करने की भी ज़रूरत होगी.

हालाँकि, इस मोर्चे पर अभी ख़ास प्रगति नहीं हुई है: वर्तमान योजनाओं के तहत देशों की सरकारें, जीवाश्म-ईंधन स्रोतों से ऊर्जा का उत्पादन करना जारी रखेंगी, जिससे बेहतर जलवायु प्रतिबद्धताओं के बावजूद, तापमान वृद्धि होगी.

मंगोलिया के उलानबाटर में कोयला-चालित बिजली संयंत्रों में उत्सर्जन से वायु प्रदूषित हो रही है.
ADB/Ariel Javellana
मंगोलिया के उलानबाटर में कोयला-चालित बिजली संयंत्रों में उत्सर्जन से वायु प्रदूषित हो रही है.

सरकारों की योजनाओं से अनुमान लगाया गया है कि अगले दो दशकों में वैश्विक तेल और गैस उत्पादन में वृद्धि होगी, वहीं कोयला उत्पादन में मामूली कमी ही दिखाई देगी. 

यानि, कम से कम वर्ष 2040 तक जीवाश्म ईंधन का उत्पादन बढ़ने के आसार दिखाई देते हैं.

इन निष्कर्षों को संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम ‘Production Gap’ रिपोर्ट में पेश किया गया.

रिपोर्ट में जीवाश्म ईंधन का उत्पादन करने वाले 15 प्रमुख देशों के सम्बन्ध में जानकारी साझा की गई. यह स्पष्ट था कि अधिकाँश देश, जीवाश्म ईंधन उत्पादन में बढ़ोत्तरी का समर्थन करना जारी रखेंगे.

मौजूदा हालात में बदलाव लाने के लिये, संयुक्त राष्ट्र ने ऊर्जा पर एक उच्च-स्तरीय वार्ता आयोजित की, जो 40 वर्षों में अपनी तरह की पहली वार्ता थी. 

देशों की सरकारों ने दुनिया भर में 16 करोड़ 60 लाख से अधिक लोगों को बिजली उपलब्ध कराने के लिये प्रतिबद्धता जताई, और निजी कम्पनियों ने भी 20 करोड़ से अधिक लोगों तक बिजली पहुँचने का वादा किया है.

सरकारों ने, सौर, पवन, भू-तापीय, जलविद्युत और नवीकरणीय-आधारित हाइड्रोजन के ज़रिये, वर्ष 2030 तक अतिरिक्त 698 गीगावाट अक्षय ऊर्जा स्थापित करने के लिये प्रतिबद्धता जताई.

व्यवसायों, विशेष रूप से बिजली उपयोगिता कम्पनियों, ने 2030 तक अतिरिक्त 823 गीगावाट स्थापित करने का वादा किया है.

प्रकृति के साथ समरसता ज़रूरी

चरम मौसम की बढ़ती घटनाएँ यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि प्राकृतिक दुनिया, मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन पर प्रतिक्रिया दे रही है. प्रकृति के साथ समरसता क़ायम करना ही सन्तुलन बहाल करने के सर्वोत्तम तरीक़ों में है.

इसके लिये बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता होगी, और प्राकृतिक दुनिया के साथ हमारे बर्ताव में बदलाव की भी ज़रूरत होगी.

प्राकृतिक पर्यावासों को बहाल कर, जलवायु व जैविविविधता संकटों से निपटने में मदद मिल सकती है.
CIFOR/Terry Sunderland
प्राकृतिक पर्यावासों को बहाल कर, जलवायु व जैविविविधता संकटों से निपटने में मदद मिल सकती है.

संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया है कि पृथ्वी की जैवविविधता व उस पर निर्भर समुदायों के संरक्षण के लिये, लगभग चीन के आकार की किसी भूमि को उसकी प्राकृतिक स्थिति में बहाल करना होगा.

साथ ही, जलवायु, जैवविविधता और भूमि क्षरण की तिहरी चुनौती से निपटने के लिये, प्रकृति-आधारित समाधानों में वार्षिक निवेश में वर्ष 2030 तक तीन गुना और 2050 तक चार गुना बढ़ोत्तरी की जानी होगी. 

इस बीच, दस लाख से अधिक प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं.

अक्टूबर में आयोजित,संयुक्त राष्ट्र जैवविविधता सम्मेलन के पहले खण्ड में, संयुक्त राष्ट्र प्रमुख, एंतोनियो गुटेरेश ने सभी देशों से, मानव एवं पृथ्वी के लिये एक स्थायी भविष्य सुनिश्चित करने हेतु एकसाथ मिलकर काम करने का आह्वान किया. 

सम्मेलन का दूसरा खण्ड  2022 में आयोजित किये जाने की योजना है.

इस सम्मेलन में, अगले दशक के लिये जैवविविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, रक्षा, बहाली व स्थायी प्रबन्धन के लिये एक वैश्विक रोडमैप विकसित किया जाएगा.

वित्तीय संसाधन कहाँ है?

नवीकरणीय ऊर्जा से लेकर विद्युत परिवहन, वनों की पुनर्बहाली और जीवन शैली में परिवर्तन तक, मानव अस्तित्व के लिये ख़तरे के रूप में देखे जाने वाले जलवायु संकट से निपटने के लिये अनगिनत समाधान हैं. 

यह अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि इससे निपटने के लिये धन कहाँ से आएगा.

एक दशक से भी अधिक समय पहले, विकसित देशों ने जलवायु कार्रवाई में विकासशील देशों की सहायता के लिये, वर्ष 2020 तक प्रति वर्ष संयुक्त रूप से, 100 अरब डॉलर जुटाने का वादा किया था. 

जलवायु कार्रवाई के तहत नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिये जाने को अहम बताया गया है.
UNDP/Karin Schermbucker
जलवायु कार्रवाई के तहत नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिये जाने को अहम बताया गया है.

हालाँकि, यह वादा अभी पूरा नहीं हो पाया है.

फिर भी, व्यवसाय जगत इसकी अहमियत समझने लगा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में निवेश करने में आर्थिक समझदारी है. 

उदाहरणस्वरूप, अधिकाँश देशों में सौर ऊर्जा अब नए कोयला बिजली संयंत्रों के निर्माण से सस्ता है, और स्वच्छ ऊर्जा निवेश से 2030 तक 1 करोड़ 80 लाख रोज़गार पैदा होने की उम्मीद है.

अक्टूबर में, प्रमुख कम्पनियों के 30 सीईओ और वरिष्ठ व्यवसायी, ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (GISD) एलायन्स’ की एक बैठक में शामिल हुए.

बैठक का उद्देश्य, ऐसे दिशानिर्देशों व उत्पादों को विकसित करना था, जिनसे मौजूदा वित्त व निवेश तंत्रों को टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप बनाया जा सके.

अस्तित्व में आने के बाद से ही, जीआईएसडी एलायन्स ने, टिकाऊ दुनिया का वित्त पोषण करने के लिये मानक व तरीक़े विकसित किये हैं.

इस वर्ष, जीआईएसडी ने टिकाऊ विकास लक्ष्यों पर कम्पनियों के प्रभाव को सटीक रूप से मापने और निवेशकों को महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करने के लिये अपना नवीनतम उपाय प्रकाशित किया.

समूह अब ऐसा कोष स्थापित कर रहा है, जिससे वास्तविक जीवन में एसडीजी लक्ष्यों को पूरा करने के अवसर पैदा होंगे.

कॉप26 में बड़े वादे

नवम्बर में ग्लासगो में आयोजित कॉप26 संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन, मीडिया और आम जनता के बीच, वर्ष का केन्द्र बिन्दु माना जाने वाला जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम रहा.

दो सप्ताह की यह गहन बैठक, 2015 के सम्मेलन के पेरिस समझौते में किये गए वादों को आगे बढ़ाने के लिये बुलाई गई थी. उद्देश्य था - इन प्रतिबद्धताओं को ठोस कार्रवाई में बदलने के लिये विस्तृत खाका तैयार करना.

स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में कॉप26 सम्मेलन आयोजन स्थल के बाहर विरोध प्रदर्शन.
UN News/Laura Quinones
स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में कॉप26 सम्मेलन आयोजन स्थल के बाहर विरोध प्रदर्शन.

कॉप26 से पहले कई चेतावनी जारी की गई थीं कि सम्मेलन में, वांछित परिणाम सामने नहीं आ पाएंगे. यूएन न्यूज़ टीम ग्लासगो में मौजूद थी, और वहाँ जलवायु मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ, सम्मेलन स्थल के बाहर, सभी उम्र के लोगों ने, सरकारों से अधिक कार्रवाई की माँग करते हुए बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किये. 

हालाँकि, लम्बे समय से कॉप सम्मेलन पर नज़र रख रहे विशेषज्ञों ने यह भी महसूस किया कि पिछले सम्मेलनों के मुक़ाबले इस बार एक अलग माहौल था - अधिक सकारात्मकता, और कुछ ठोस हासिल करने की भावना महसूस की गई. 

सम्मेलन के शुरुआती दिनों में, दुनिया के जंगलों को बहाल करने के लिये एक बड़ा संकल्प देखने को मिला. 

साथ ही, जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैवविविधता के विनाश व भुखमरी पर अंकुश लगाने एवं आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिये, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के भागीदारों की प्रतिबद्धताओं की एक लम्बी सूची भी सामने आई.

जलवायु वित्त पोषण दिवस पर घोषणा की गई कि लगभग 500 वैश्विक वित्तीय सेवा कम्पनियाँ, 130 ट्रिलियन डॉलर यानि दुनिया की वित्तीय सम्पत्ति का लगभग 40 प्रतिशत, पेरिस समझौते के जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप ढालने पर तैयार हैं.

मगर, ग्लासगो में वित्तीय मुद्दों पर वार्ता से कई विश्व नेता निराश भी थे.

सबसे कम विकसित देशों (LDC) के समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले भूटान ने अफ़सोस जताया कि देशों द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयान, अक्सर बैठक में की गई बातों से भिन्न होते हैं.

भूटान के प्रतिनिधि ने 'अनुकूलन दिवस' पर कहा, "हम बड़ी उम्मीदों के साथ ग्लासगो आए थे. हमें भविष्य में एलडीसी में रहने वाले एक अरब लोगों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिये मज़बूत प्रतिबद्धताओं की आवश्यकता है." 

'ऊर्जा दिवस' पर, ‘ग्लोबल क्लीन पावर ट्रान्ज़िशन’ के तहत संकल्पों की घोषणा की गई. इसके तहत, कोयले में निवेश को समाप्त करने, स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने, एक न्यायोचित बदलाव लाने, और 2030 तक प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एवं 2040 तक अन्य देशों में, कोयले को चरणबद्ध तरीक़े से समाप्त करने की प्रतिबद्धता जताई गई.

13 नवम्बर को, ग्लासगो में, कॉप26 की समाप्ति पर प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया. ये यूएन जलवायु सम्मेलन 31 अक्टूबर को शुरू हुआ था.
UN News/Laura Quinones
13 नवम्बर को, ग्लासगो में, कॉप26 की समाप्ति पर प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया. ये यूएन जलवायु सम्मेलन 31 अक्टूबर को शुरू हुआ था.

इन 77 सदस्य देशों में, पोलैण्ड, वियतनाम और चिली जैसे 46 देश शामिल हैं, और इनमें से 23 ऐसे देश हैं जो पहली बार कोयले के इस्तेमाल को ख़त्म करने की प्रतिबद्धता जता रहे हैं. हालाँकि, सबसे बड़े कोयला वित्त पोषक (चीन, जापान और कोरिया गणराज्य) इसमें शामिल नहीं हुए.

'आगे बढ़ते रहना होगा'

कॉप26 समझौता, कुछ हद तक उम्मीदों से कम और नाटकीयता भरा रहा. विलम्बित सत्र के अन्त में, अध्यक्ष आलोक शर्मा तनावपूर्ण माहौल के दौरान तब भावुक हो उठे, जब अन्तिम पलों में भारत के हस्तक्षेप से जीवाश्म ईंधन से सम्बन्धित शब्दों में कुछ बदलाव किया गया. इससे कईं देश रूष्ट हो गए. 

हालाँकि, यह समझौता इस नज़रिये से उल्लेखनीय था कि इसमें, पहली बार ‘जीवाश्म ईंधन’ शब्दों को COP में शामिल किया गया, जिसे दुनिया के देश ‘चरणबद्ध तरीक़े से ख़त्म करने’ की बजाय ‘चरणबद्ध तरीक़े से कम करने’ की शब्दावली पर सहमत हुए.

कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि यह समझौता दुनिया को जलवायु-सम्बन्धी आपदाओं से बचाने के लिये पर्याप्त नहीं है, लेकिन अन्य पक्षों को इसमें आशा की वो भावना दिखी है, जिसे लेकर वार्ता आयोजित की गई थी. 

सम्भावना है कि इसके बाद के कॉप सम्मेलनों में मानव व पृथ्वी के स्थायी भविष्य के लिये अधिक सार्थक क़दम उठाये जाएंगे. 

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा, "मुझे पता है कि आप निराश हैं. लेकिन प्रगति का मार्ग हमेशा एक सीधी रेखा नहीं होता. कभी-कभी दूसरे रास्ते अपनाने पड़ते हैं. कभी राह में गढ्ढे भी आते हैं.” 

“लेकिन मुझे पता है कि हम वहाँ पहुँच सकते हैं. हम अपने जीवन की लड़ाई लड़ रहे हैं, और इस लड़ाई को जीतना ही होगा. कभी हार मत मानो. पीछे मत हटो. आगे बढ़ते रहो."

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