सीसा-युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल पर रोक - स्वास्थ्य व पर्यावरण के मोर्चे पर बड़ी सफलता

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एजेंसी (UNEP) के नेतृत्व में स्वच्छ ईंधन व वाहनों के लिये, दो दशकों से जारी प्रयासों के परिणामस्वरूप, वैश्विक स्तर पर सीसा-युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल पर पूर्ण रूप से विराम लग गया है. 

इस वर्ष जुलाई महीने में अल्जीरिया के सर्विस स्टेशनों पर सीसा-युक्त पेट्रोल की बिक्री बन्द कर दी गई. 

इसके साथ ही आधिकारिक रूप से दुनिया भर में सीसा-युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल पर अब पूरी तरह पाबन्दी लग गई है. 

यूएन पर्यावरण एजेंसी की कार्यकारी निदेशक इन्गर एण्डरसन ने बताया कि वैश्विक स्वास्थ्य और हमारे पर्यावरण के लिये सीसा-युक्त पेट्रोल पर पाबन्दी को सफलतापूर्वक लागू किया जाना एक बेहद अहम पड़ाव है. 

वर्ष 1922 से, इन्जन के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिये टेट्राएथिललेड को पेट्रोल में मिलाया जाता रहा है. 

मगर, इस वजह से कईं दशकों तक वायु, धूल, मृदा, पेयजल और फ़सलें दूषण का शिकार हुई और यह मानव स्वास्थ्य के लिये भी समस्या बन गया.

वर्ष 1970 तक दुनिया भर में लगभग हर जगह पेट्रोल के उत्पादन में सीसे का इस्तेमाल किया जाता था.   

पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिये ख़तरा

वर्ष 2002 में जब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एजेंसी ने पेट्रोल में सीसे के इस्तेमाल के उन्मूलन के लिये अपनी मुहिम शुरू की, तो यह मानव स्वास्थ्य के लिये सबसे गम्भीर ख़तरों में था.  

सीसा-युक्त पेट्रोल से हृदय रोग, स्ट्रोक और कैन्सर जैसी बीमारियाँ होने का जोखिम होता है और मानव मस्तिष्क के विकास पर भी असर पड़ता है.

बच्चों के लिये यह विशेष रूप से नुक़सानदेह है.

लाखों-करोड़ों को प्रभावित करने वाली, पर्यावरण के क्षरण और एक सदी से हो रही मौतों व बीमारियों के लिये ज़िम्मेदार वजहों पर मिली इस कामयाबी से स्वच्छ वाहनों और बिजली चालित वाहनों की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. 

बताया गया है कि सीसा-युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल पर पाबन्दी से प्रति वर्ष 12 लाख असामयिक मौतों को टालना सम्भव हो सकेगा. 

बच्चों के लिये आईक्यू प्वाइन्ट्स में इज़ाफ़ा होगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिये दो हज़ार 450 अरब डॉलर की बचत होगी.    

चुनौती बरक़रार

हालांकि इस प्रगति के बावजूद, वैश्विक वाहनों का तेज़ी से बढ़ता बेड़ा, स्थानीय स्तर पर वायु, जल व मिट्टी के प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार है. साथ ही वैश्विक जलवायु संकट भी बढ़ता है.

एक अनुमान के मुताबिक, ऊर्जा-सम्बन्धी वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में परिवहन सैक्टर का क़रीब एक-चौथाई योगदान है. वर्ष 2050 तक यह आँकड़ा बढ़कर एक तिहाई हो जाने की आशंका है.

अनेक देशों ने बिजली-चालित वाहनों की दिशा में क़दम बढ़ाना शुरू कर दिया है, मगर आने वाले सालों में एक अरब 20 करोड़ वाहन सड़कों पर उतरेंगे. 

इनमें ख़राब गुणवत्ता वाले और पहले इस्तेमाल में लाए जा चुके वो लाखों वाहन भी हैं जिनका योरोपीय देशों, अमेरिका और जापन से मध्य और निम्न आय वाले देशो को निर्यात किया जाता है. 

इनके इस्तेमाल से पृथ्वी का तापमान बढ़ता है, वायु प्रदूषित करने वाला ट्रैफ़िक  होता है और दुर्घटना की आशंका भी बढ़ जाती है.

इनमें से बहुत से वाहन जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल करने वाले होंगे, विशेष रूप से विकासशील देशों में. 

हरित भविष्य की ओर 

यूएन पर्यावरण एजेंसी की प्रमुख इन्गर एण्डरसन ने कहा कि सरकारों, व्यवसायों और नागरिक समाज के संयुक्त राष्ट्र-समर्थित एक गठबन्धन के ज़रिये दुनिया को इस ज़हरीले ईंधन से निजात दिलाने में सफलता मिली है. 

उनके मुताबिक यह विश्व को एक स्वच्छ व हरित भविष्य की दिशा में ले जाने में बहुपक्षवाद की शक्ति को दर्शाता है. 

“हम इन्हीं पक्षकारों से इस विशाल उपलब्धि से प्रेरणा लेने का आग्रह करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके, कि हमारे पास स्वच्छतर ईंधन होने के बाद, हम पहले से स्वच्छ वाहनों के वैश्विक मानकों को भी अपना सकें. स्वच्छतर ईंधन और वाहनों के ज़रिये उत्सर्जनों में 80 फ़ीसदी की कटौती लाई जा सकती है.”

यूएन एजेंसी ने आगाह किया है कि सीसा प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत के उन्मूलन में सफलता ज़रूर मिली है, मगर अन्य स्रोतों से होने वाले सीसा प्रदूषण पर विराम लगाने के लिये कार्रवाई की आवश्यकता है. 

इनमें पेण्ट में इस्तेमाल होने वाला सीसा, सीसे का प्रयोग करने वाली बैटरी और घर-गृहस्थी के सामान में इस्तेमाल होने वाला सीसा है.

सीसा-युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल के अन्त से टिकाऊ विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रगति में मदद मिलने की उम्मीद है. 

इनमें अच्छे स्वास्थ्य व कल्याण (एसडीजी-3), स्वच्छ जल (एसडीजी-6), स्वच्छ ऊर्जा (एसडीजी-7), टिकाऊ शहर (एसडीजी-11), जलवायु कार्रवाई (एसडीजी-13) और भूमि पर जीवन (एसडीजी-15) लक्ष्य शामिल हैं.

साथ ही, इस वर्ष 7 सितम्बर को, ‘नीले आकाश के लिये स्वच्छ वायु के अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ से पहले यह ठोस प्रगति को भी दर्शाता है. 

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