संघर्ष वाले देशों में, शस्त्र ख़ामोशी शुरू होने के बाद, राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी अहम

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि यूएन शान्तिरक्षा मिशन, किसी देश को संघर्ष के बाद के हालात में, सही रास्ते पर तो पहुँचा सकता है, मगर वहाँ की राष्ट्रीय सरकारों की प्रतिबद्धता के ज़रिये ही, देश को, लम्बी अवधि के लिये सही रास्ते पर टिकाए रखा जा सकता है. 

यूएन महासचिव एंतोनियो गटेरेश ने दीर्घकालीन शान्ति की दिशा में आगे बढ़ने के लिये मौजूद समर्थन का जायज़ा लेने के वास्ते, बुधवार को सुरक्षा परिषद की एक बैठक को सम्बोधित करते हुए ये बात कही.

एंतोनियो गुटेरेश ने, शान्ति रक्षा और शान्ति निर्माण में संयुक्त राष्ट्र द्वारा सीखे गए चार सबक भी साझा किये, इनमें काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य और सूडान भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि किसी देश में, संघर्ष समाप्त होने के बाद, शान्ति स्थापना का रास्ता, तब शुरू होता है जब संयुक्त राष्ट्र का मिशन वहाँ पहुँचता है.

यूएन प्रमुख ने कहा, “मैदानी मिशनों, मेज़बान देशों की सरकारों, देश में मौजूद संयुक्त राष्ट्र की टीमों, और स्थानीय व वैश्विक साझीदारों के बीच, बिल्कुल शुरुआती और टिकाऊ तालमेल स्थापित करने पर ही सफलता निर्भर करती है."

"और ये कामयाबी, उन स्थानीय लोगों व समुदायों के साथ विश्वास व साख़ कायम करने पर निर्भर करती है जिनकी हम सेवा करने के लिये वहाँ पहुँचते हैं.”

उत्साह और जोखिम

यूएन महासचिव ने, प्रासंगिक देशों में शान्ति की एकजुट स्थापना, सहनक्षमता निर्माण और उन देशों के फिर से युद्ध में फिसल जाने से रोकने के मुद्दों को, उनके रोकथाम एजेण्डा के केन्द्र में रखा है. ये एजेण्डा ‘एक्शन फॉर पीसकीपिंग’ (A4P) से मेल खाता है जो तीन वर्ष पहले शुरू किया गया था.

उसका अगला चरण A4P Plus मार्च 2021 में घोषित किया गया था जिसके तहत, उन देशों में हासिल की गई कामयाबियों को सहजने के यथासम्भव प्रयास किये जाते हैं जहाँ यूएन मिशनों ने अपने शासनादेश पूरे कर लिये हैं.

उन्होंने कहा, “संघर्ष से उबरने वाले किसी देश में, यूएन शान्तिरक्षा मिशन पूरा करना और शान्ति की चाह रखना, उत्साह का एक लम्हा हो सकता है. मगर ये पल, एक बढ़े हुए जोखिम के भी क्षण हैं.”

“वर्षों के दौरान शान्ति निर्माण और सुरक्षा सम्बन्धी कामयाबियाँ दाव पर लगे हैं. वैश्विक ध्यान और सावधानियाँ, व्यर्थ जा सकती हैं – जिनमें इस परिषद का ध्यान बँटना भी शामिल है.”

सतत सम्पर्क व सम्वाद

यूएन प्रमुख ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने अनुभव से जो सबक सीखे हैं उनमें सबसे प्रमुख ये है कि परिवर्तन और उससे भी आगे के दौर में, राजनैतिक सम्वाद व सम्पर्क क़ायम रहना बहुत ज़रूरी है. 

इसमें, महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण के लिये, स्थानीय और राष्ट्रीय सरकारों के साथ गहन तालमेल व सम्वाद भी शामिल हैं.
राष्ट्रीय नेतृत्व और परिवर्तन प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी सम्भालना भी बहुत महत्वपूर्ण है, और ये A4P Plus एजेण्डा का केन्द्रीय बिन्दु भी है. इसके तहत, टिकाऊ व दीर्घकालीन शान्ति के लिये तमाम सम्बद्ध पक्षों की बहुत अहम भूमिका होती है.

एंतोनियो गुटेरेश ने कहा, “हम ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि राष्ट्रीय सरकारों के संस्थान, साझीदार, सिविल सोसायटी, विशेष रूप से महिलाओं, अल्पसंख्यकों और युवाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन, सभी, शान्ति को आगे बढ़ाने, और सही मायनों में प्रतिनिधिक, ज़िम्मेदार और जवाबदेह संस्थानों के निर्माण की ख़ातिर एक साथ मिलकर काम करें.”

किसी देश में यूएन मिशन ख़त्म होने के समय ही, अक्सर विदेशी सहायता में कमी भी देखी जाती है, और ये वित्तीय कठिनता, पहले से ही नाज़ुक शान्ति और विकास प्रयासों को पटरी से उतार सकती है.

निर्बल लोगों की हिफ़ाज़त

एक और जो सबक सीखा गया है वो है कि देश में मज़बूत सुरक्षा और हिफ़ाज़त प्रणालियों और व्यवस्थाओं के निर्माण में, राष्ट्रीय अधिकारों को समर्थन देना.

यूएन प्रमुख ने कहा, “जब एक यूएन मिशन ख़त्म होता है तो, आम आबादी और निर्बल समूहों के लिये दरपेश जोखिम, यूँ ही, अपने आप ग़ायब नहीं हो जाते हैं.”

“हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि संघर्ष में शामिल पक्ष, अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करें. और आम आबादी के लिये बचे जोखिमों से निपटने के लिये, हमें इस परिषद की सहायता की ज़रूरत है.”

लाइबेरिया से सबक

लाइबेरिया की पूर्व राष्ट्रपति ऐलेन जॉनसन सरलीफ़ ने भी इस बारे में अपने अनुभव साझा किये कि उनके देश में, 15 वर्षों से भी ज़्यादा समय तक चले यूएन मिशन ने, किस तरह, मौजूदा शान्ति में योगदान किया.

लाइबेरिया में यूएन मिशन 2018 में बन्द हुआ था जो, देश में दो गृहयुद्धों के बाद शुरू किया गया था. उन गृहयुद्धों में लगभग ढाई लाख लोगों की जानें गईं थीं. 

लाइबेरिया में, यूएन मिशन के चरम पर, एक समय लगभग एक लाख 80 हज़ार शान्तिरक्षक, 16 हज़ार पुलिस अधिकारी, और 24 हज़ार सिविल कर्मचारी मौजूद थे.

उन्होंने कहा कि बदलाव के लिये बनाई गई योजनाओं में, विशिष्ट देशों की विशेष परिस्थितियों का ख़ास ध्यान रखा जाए, और उन योजनाओं का लचीला होना भी बहुत ज़रूरी है.

यूएन महासचिव की ही तरह, ऐलेन जॉनसन सरलीफ़ ने भी ज़ोर देकर कहा कि बदलाव प्रक्रिया का राष्ट्रीय स्वामित्व वाली होने के साथ-साथ एकीकृत, संयोजित और टिकाऊ होना भी ज़रूरी है.

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