संघर्षरत क्षेत्रों में हज़ारों बच्चे, भयावह हालात में रहने को विवश, यूएन रिपोर्ट

बच्चों और सशस्त्र संघर्ष पर संयुक्त राष्ट्र की सोमवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट में, वर्ष 2021 के दौरान दुनिया भर में बच्चों पर, विभिन्न तरह के संघर्षों द्वारा छोड़े गए विनाशकारी प्रभावों का विवरण दिया गया है. 

रिपोर्ट में वर्णित ख़तरों में संघर्ष भड़काव से लेकर, सैनिक विद्रोह, और सत्ता पर नियंत्रण, लम्बी अवधि के संघर्ष और नए संघर्षों तक का ज़िक्र शामिल है. साथ ही अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन भी रिपोर्ट में दिया गया है. 

सीमापार संघर्ष और अन्तर-सामुदायिक हिंसा ने भी बच्चों की सुरक्षा को प्रभावित किया है, विशेष रूप में लेक चाड बेसिन और मध्य साहेल क्षेत्रों में.

रिपोर्ट में बच्चों के विरुद्ध गम्भीर उल्लंघन के 24 हज़ार मामलों को रेखांकित किया गया है, जोकि औसतन हर दिन लगभग 65 मामलों की दर है. 

बच्चों की हत्या किया जाना और उन्हें अपंग बनाया जाना, सबसे भीषण अधिकार उल्लंघन है, उसके बाद बच्चों की भर्ती और उनका युद्धक गतिविधियों में प्रयोग किये जाने का नम्बर है, साथ ही मानवीय सहायता तक पहुँच से वंचित करने के मामले भी दर्ज किये गए हैं.

वर्ष 2021 के दौरान जिन स्थानों पर सबसे ज़्यादा बच्चे प्रभावित हुए, उनमें अफ़ग़ानिस्तान, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) इसराइल और इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किये हुए फ़लस्तीनी क्षेत्र, सोमालिया, सीरिया और यमन प्रमुख थे.

भयावह हालात

यूगाण्डा में एक 13 वर्षीय विस्थापित लड़का जि दक्षिण सूडान से निकलना पड़ा.
© Paddy Dowling
यूगाण्डा में एक 13 वर्षीय विस्थापित लड़का जि दक्षिण सूडान से निकलना पड़ा.

बच्चे व सशस्त्र संघर्ष पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि वर्जीनिया गाम्बा का कहना है, “ऐसा कोई भी शब्द मौजूद नहीं है जिसके ज़रिये, उन भयावह परिस्थितियों व कष्टों को बयान किया जा सके, जो सशस्त्र संघर्ष में बच्चों को भुगतने पड़े हैं.”

उन्होंने कहा, “जो बच्चे जीवित बच गए हैं वो जीवन गहरे शारीरिक व भावनात्मक ज़ख़्मों के साथ जीवन जियेंगे. मगर इस संख्या से हमारे प्रयास हतोत्साहित नहीं होने चाहिये. बल्कि, इस संख्या से, बच्चों के ख़िलाफ़ गम्भीर हनन के मामलों का ख़ात्मा करने का हमारा संकल्प और भी ज़्यादा मज़बूत होना चाहिये.”

“ये रिपोर्ट सशस्त्र संघर्ष में बच्चों की हिफ़ाज़त बेहतर करने और ये सुनिश्चित करने लिये के हमारे कामकाज को सघन बनाने के लिये कार्रवाई की पुकार है कि उन्हें हादसों से उबरने व अपने जीवन को बेहतर बनाते हुए प्रसन्नता के साथ जीने का वास्तविक अवसर दिया जाए.”

वर्जीनिया गाम्बा ने बताया कि लड़कों और लड़कियों को अक्सर भिन्न तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ता है, ये तथ्य ऐसे सन्दर्भ में यह समझने के लिये महत्वपूर्ण है जब निरोधक व प्रतिक्रियात्मक रणनीतियाँ विकसित की जाती हैं.

यूक्रेन चिन्ता का एक नया क्षेत्र

दक्षिण सूडान में शांति प्रयासों के तहत जुलाई 2019 में बाल सैनिकों को रिहा किया गया.
UNMISS/Nektarios Markogiannis
दक्षिण सूडान में शांति प्रयासों के तहत जुलाई 2019 में बाल सैनिकों को रिहा किया गया.

बच्चों के विरुद्ध दो तरह के अधिकार हनन में, वर्ष 2021 में बहुत ज़्यादा वृद्धि देखी गई: अपहरण, और बलात्कार सहित यौन हिंसा, जिनमें 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है.

स्कूलों व अस्पतालों पर हमलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जो महामारी के कारण और ज़्यादा जटिल हुई. 

दो हज़ार 800 से ज़्यादा बच्चों को, संघर्ष से सम्बद्ध पक्षों के साथ वास्तविक सम्बन्ध होने या सम्बन्ध होने के आरोपों के कारण बन्दी बनाया गया, जिसके कारण वो बच्चे प्रताड़ना, यौन हिंसा, और अन्य तरह के दुर्व्यवहार के चंगुल में फँस गए.

यूएन महासचिव की रिपोर्ट में चिन्ताजनक परिस्थितियों के कारण इथियोपिया, मोज़ाम्बीक़, और यूक्रेन को भी शामिल किया गया है क्योंकि इन क्षेत्रों में बच्चों पर संघर्षों के त्वरित प्रभाव पड़े हैं.

इसके अतिरिक्त, महासचिव ने मध्य साहेल क्षेत्र में भी बाल अधिकारों के उल्लंघन की निगरानी बढ़ाने का अनुरोध किया है. उन्होंने इसी तरह का अनुरोध 2020 में लेक चाड बेसिन के लिये भी किया था.

‘शान्ति अवश्य क़ायम रहे’

बच्चों के अधिकार उल्लंघन के इन मामलों के बीच, कुछ क्षेत्रों में इन चुनौतियों का सामना करने में कुछ प्रगति भी दर्ज की गई. कुल मिलाकर, 12 हज़ार 214 बच्चे, मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, कोलम्बिया, डीआरसी, म्याँमार और सीरिया में, सशस्त्र बलों और समूहों से रिहा कराए गए.

विशेष प्रतिनिधि ने सशस्त्र बलों और समूहों से रिहा कराए गए बच्चों को उनके समुदायों का फिर से हिस्सा बनने के लिये, उपयुक्त समर्थन व सहायता मुहैया कराए जाने की महत्ता को भी रेखांकित किया.

वर्जीनिया गाम्बा ने कहा की शान्ति प्रक्रियाओं और बातचीत में शामिल पक्षों को, बच्चों के अधिकार व ज़रूरतों को, शान्ति वार्ताओं और उनके अन्तिम समझौतों का हिस्सा बनाने पर विचार करना चाहिये, क्योंकि एक टिकाऊ शान्ति हासिल करने के लिये यही एक मात्र रास्ता है.

उन्होंने उदाहरण के तौर पर, यमन में हुए युद्ध विराम समझौते की सराहना की.

वर्जीनिया गाम्बा ने कहा, “जब लोग लापता होते हैं तो सबसे पहले बच्चों को ही, इस त्रासदीपूर्ण नुक़सान का सबसे ज़्यादा ख़मियाज़ा उठाना पड़ता है.”

“हमारे बच्चों की हिफ़ाज़त करने और उनके लिये एक सुरक्षित व बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिये, अभी कार्रवाई करने का समय, पहले से कहीं ज़्यादा अहम है.”

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