वैश्विक महामारी से पुनर्बहाली में, निर्धनतम देशों की उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने पर ज़ोर

व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) की एक नई रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि विश्व के निर्धनतम देशों को, कोविड-19 महामारी से उपजे संकटों से उबारने के लिये, उनकी आर्थिक उत्पादन क्षमता को मज़बूती प्रदान करना बेहद आवश्यक है. रिपोर्ट बाती है कि इससे इन देशों को टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी.

यूएन एजेंसी ने सोमवार को ‘Least Developed Countries Report 2021’ शीर्षक वाली रिपोर्ट जारी की है जिसका निष्कर्ष है कि सबसे कम विकसित देश (LDCs), उत्पादन क्षमता में बढ़ोत्तरी और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन के अभाव में, वैश्विक अर्थव्यवस्था के हाशिये पर ही रहेंगे.   

रिपोर्ट में राजकीय और उत्पादक क्षमताओं में संसाधन निवेश बढ़ाने की पुकार लगाई गई है. 

यूएन एजेंसी की महासचिव रेबेका ग्रीनस्पैन ने कहा, “आज सबसे कम विकसित देश (LDCs), स्वयं को एक अहम पड़ाव पर पाते हैं.”

“उन्हें अपनी उत्पादक क्षमताएँ विकसित करने और संस्थागत सामर्थ्य विकसित करने के लिये, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से निर्णायक समर्थन की दरकार है, ताकि पारम्परिक व नई चुनौतियों का मुक़ाबला कर सकें.”

ठोस निवेश ज़रूरी

यूएन एजेंसी के मुताबिक़ उत्पादक क्षमताओं से तात्पर्य, उत्पादक संसाधनों, उद्यम सम्बन्धी सामर्थ्य और उत्पादन कड़ियों से हैं, जो कि साथ मिलकर किसी देश की सामान व सेवाएँ उत्पादन करने और विकसित होने की क्षमताएँ निर्धारित करती हैं. 

बताया गया है कि उत्पादन क्षमता के विकास के ज़रिये, सबसे कम विकसित देश ढाँचागत, रूपान्तरकारी आर्थिक बदलावों को प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिनसे निर्धनता में कमी लाने और टिकाऊ विकास लक्ष्यों की दिशा में तेज़ प्रगति में मदद मिलेगी.  

रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि टिकाऊ विकास लक्ष्य हासिल करने के लिये व्यापक संसाधन निवेश व व्यय की आवश्यकता है, जो कि फ़िलहाल इन देशों के समूह के वित्तीय सामर्थ्य में नहीं है. 

सबसे कम विकसित देशों का समूह (LDCs)

संयुक्त राष्ट्र ने यह श्रेणी 50 वर्ष पहले स्थापित की थी. दुनिया की सबसे कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं का यह समूह, वर्ष 1971 में 25 देशों से बढ़कर 46 तक पहुँच चुका है. 

1991 में तो ऐसे देशों की संख्या 52 तक पहुँच गई थी. तब से अब तक महज़ छह देशों को ही सबसे कम विकसित देशों की श्रेणी से बाहर आने में सफलता मिली है. 

वर्ष 2020 में इस समूह के देशों में विकट आर्थिक हालात की वजह से, पिछले तीन दशकों की सबसे ख़राब प्रगति दर्ज की गई है. 

कोविड-19 महामारी के कारण इन देशों की संस्थागत, आर्थिक व सामाजिक दुर्बलताएँ उजागर हुई हैं.  

इसकी एक बानगी कोविड-19 टीकाकरण की दर है – अब तक कुल आबादी के महज़ दो फ़ीसदी हिस्से को ही कोरोनावायरस टीके मिल पाए हैं जबकि विकसित देशों में यह आँकड़ा 41 प्रतिशत है.

यूएन एजेंसी की शीर्ष अधिकारी ने एलडीसी समूह के विकास साझीदारों से, अक्टूबर में होने वाले एक सम्मेलन के दौरान, इन देशों की एक अरब आबादी की विशिष्ट ज़रूरतों को ध्यान में रखने का आग्रह किया है. 

इस सम्मेलन की थीम ‘विषमता व निर्बलता से सर्वजन के लिये समृद्धि तक’ रखी गई है. 

कठिन वित्तीय हालात

यूएन एजेंसी की रिपोर्ट में एलडीसी देशों की वित्तीय आवश्यकताओं को चुनौतीपूर्ण क़रार दिया गया है.

उदाहरणस्वरूप, एक अनुमान के मुताबिक़, सात फ़ीसदी की आर्थिक दर की प्राप्ति के लिये, 462 अरब डॉलर के औसत वार्षिक निवेश की दरकार होगी. 

वहीं, अत्यधिक निर्धनता का अन्त करने के लिये, औसत वार्षिक निवेश ज़रूरतें, 485 अरब डॉलर आँकी गई हैं.

रिपोर्ट बताती है कि विकास के लिये पर्याप्त वित्त पोषण का इन्तज़ाम करने की ख़ातिर, वित्तीय क्षमताओं को मज़बूती देनी होगी, घरेलू संसाधनों को संगठित करना होगा और सार्वजनिक व्यय की प्रभावशीलता बढ़ानी होगी. 

इसके बावजूद, यह सम्भव है कि ये उपाय पर्याप्त साबित ना हों.

इसके मद्देनज़र, रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे कम विकसित देशों में, टिकाऊ विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को अहम भूमिका निभानी होगी.  

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि महामारी से पहले, वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का स्तर, फिर से हासिल करने में, तीन से पाँच साल का समय लग सकता है. 

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