विषमतापूर्ण हालात में जीवन गुज़ारते विकलांगजन: कुछ अहम जानकारी

एक अनुमान के अनुसार, विश्व आबादी का क़रीब 15 प्रतिशत, यानि एक अरब से अधिक लोग विकलांग हैं, यह दुनिया का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है. आमजन की तुलना में विकलांग व्यक्तियों के लिये जीवन चुनौतियों भरा है, और उन्हें स्कूलों, स्वास्थ्य सेवाओं, कार्यस्थलों, मनोरंजन गतिविधियों, खेलकूद सहित, जीवन के हर क्षेत्र में अनेक अवरोधों का सामना करना पड़ता है. एक नज़र कुछ अहम तथ्यों व आँकड़ों पर...

विकलांगजन की कुल संख्या का क़रीब 80 प्रतिशत हिस्सा, विकासशील देशों में रहता है. 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लगभग 46 फ़ीसदी लोग, विकलांगता के साथ जीवन जी रहे हैं.

विकलांगता की अवस्था में जीवन गुज़ार रहे व्यक्तियों की संख्या में नाटकीय वृद्धि हो रही है, जिसकी वजह जनसंख्या सम्बन्धी रुझान और लम्बे समय से चली आ रही स्वास्थ्य अवस्थाओं सहित अन्य कारण बताए गए हैं.

हर क्षेत्र में विकलांगों को कथित रूप से कलंक का सामना करना पड़ता है और अक्सर उन्हें अपने अधिकारों की पूरी समझ नहीं होती.

कोविड-19 महामारी के दौरान, विकलांग व्यक्तियों की मुश्किलें बढ़ी हैं और वे विषमतापूर्ण ढंग से प्रभावित हुए हैं.  

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने 3 दिसम्बर को ‘अन्तरराष्ट्रीय विकलांगजन दिवस’ के अवसर पर ध्यान दिलाया कि मानवता के साझा भविष्य को आगे बढ़ाने के लिये, विकलांगजन के अधिकारों व नेतृत्व को मूर्त रूप देना होगा.

विकलांगता, विभिन्न वर्गों व समुदायों, और जीवन के विविध आयामों को अनेक रूपों में प्रभावित करती है.

विकलांग बच्चों के स्वास्थ्य-कल्याण पर असर

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा नवम्बर 2021 में जारी की गई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में क़रीब 24 करोड़ विकलांग बच्चे हैं. यानि हर दस में एक बच्चा. 

इण्डोनेशिया के मध्य जावा में, शारीरिक विकलांगता का शिकार एक बच्चा, अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ बैठा है, जोकि दृष्टिदोष से पीड़ित है.
© UNICEF/Fauzan Ijazah
इण्डोनेशिया के मध्य जावा में, शारीरिक विकलांगता का शिकार एक बच्चा, अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ बैठा है, जोकि दृष्टिदोष से पीड़ित है.

विकलांगता के साथ रह रहे बच्चों को समाज में पूर्ण भागीदारी के लिये अनेक अवरोधों का सामना करना पड़ता है. 

उनकी स्वास्थ्य, पोषण, संरक्षण व शिक्षा समेत अन्य महत्वपूर्ण सेवाओं तक पहुँच नहीं होती है और हिंसा, शोषण व दुर्व्यवहार का शिकार होने की आशंका भी अपेक्षाकृत अधिक होती है. 

रोज़मर्रा के जीवन में, आम बच्चों की तुलना में विकलांग बच्चों के नाख़ुश रहने की सम्भावना 50 फ़ीसदी ज़्यादा है. साथ ही, उनके लिये कभी स्कूल ना जा पाने और प्राथमिक शिक्षा के दायरे से बाहर रह जाने की आशंका बढ़ जाती है. 

उनमें बुनियादी गणना और शिक्षा हासिल का कौशल होने की सम्भावना 42 फ़ीसदी कम होती है,

पूर्ण रूप से विकसित ना हो पाने की सम्भावना 25 प्रतिशत अधिक, और नाटेपन का शिकार होने की सम्भावना 34 फ़ीसदी अधिक होती है.

महिलाओं व लड़कियों के लिये विषमतापूर्ण हालात

18 वर्ष व उससे अधिक उम्र की महिलाओं में, विकलागंता की औसत दर 19 प्रतिशत है, यानि क़रीब हर पाँच में से एक महिला. पुरुषों के लिये यह आँकड़ा 12 फ़ीसदी है.

महिला सशक्तिकरण के लिये यूएन संस्था (UN Women) के मुताबिक़, विकलांगता की अवस्था में रह रही महिलाओं व लड़कियों को व्यवस्थागत अवरोधों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका सामाजिक व आर्थिक दर्जा प्रभावित होता है. 

विकलांग महिलाओं व लड़कियों के यौन हिंसा या बलात्कार, और लिंग-आधारित भेदभावपूर्ण प्रथाओं का शिकार होने की आशंका अधिक होती है.

मानव विकास सूचकामक रिपोर्ट सभी देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन के स्तर का आकलन करके, तैयार की जाती है.
UNDP/Fahad Kaizer
मानव विकास सूचकामक रिपोर्ट सभी देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन के स्तर का आकलन करके, तैयार की जाती है.

अक्सर, उनकी क़ानूनी संरक्षण सेवाओं और रोकथाम देखभाल तक पहुँच नहीं होती है और अनेक मामलों में पुलिस द्वारा हस्तक्षेप भी सम्भव नहीं हो पाता.

इससे समानता के आधार पर, जीवन के अहम क्षेत्रों में उनकी भागीदारी प्रभावित होती है.

विकलांगजन के लिये रोज़गार अवसरों पर असर 

विश्व में लगभग 80 करोड़ विकलांगजन कामकाजी उम्र के हैं. इनमें से बड़ी संख्या में विकलांगों को अपने लिये उपयुक्त रोज़गार की तलाश में, रवैयात्मक, सामाजिक, शारीरिक व सूचना-सम्बन्धी, अनेक प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ता है.  

कार्यबल में व्यापक विविधता सुनिश्चित किये जाने के लिये यह आवश्यक है कि विकलांग व्यक्तियों को रोज़गार मुहैया कराया जाए. इसमें ठोस आर्थिक लाभ भी निहित हैं. 

अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, श्रम बाज़ार में विकलांगजन की पूर्ण भागीदारी ना होने की वजह से, विकासशील देशों को अपने सकल घरेलू उत्पाद के सात फ़ीसदी का नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

दुनिया भर में नियोक्ता (Employers) अब कार्यबल की विविधता में निहित लाभ पहचान रहे हैं, और पहले से ज़्यादा संख्या में विकलांगजन के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ रहे हैं.  

शिक्षा के रास्ते में रुकावटें

विकासशील देशों में विकलांगता की अवस्था में रह रहे 90 फ़ीसदी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं, जिससे भावी पीढ़ियों के पीछे छूट जाने का ख़तरा है. 

कोरोनावायरस संकट के दौरान यह संकट और भी गहरा हुआ है.

आर्मीनिया में एक विकलांग बच्चा, कोविड-19 के दौरान पढ़ाई करते हुए.
© UNICEF/Grigoryan
आर्मीनिया में एक विकलांग बच्चा, कोविड-19 के दौरान पढ़ाई करते हुए.

संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक़, कोविड-19 महामारी के दौरान, निम्न और निम्नतर-मध्य आय वाले 40 प्रतिशत देश, स्कूलों में तालाबन्दी के दौरान वंचित समुदायों को पढ़ाई के लिये ज़रूरी समर्थन प्रदान करने में विफल रहे. 

10 प्रतिशत से भी कम देशों में, शिक्षा क्षेत्र में पूर्ण समावेश सुनिश्चित करने के इरादे से क़ानून उपलब्ध हैं. 

25 करोड़ से अधिक बच्चे और युवजन, शिक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं, और शिक्षा सुलभता में निर्धनता उनके लिये सबसे बड़ा अवरोध है.

दुनिया भर में केवल 41 देशों में ही संकेत भाषा को आधिकारिक रूप से मान्यता दी गई है. बताया गया है कि स्कूल भी, विकलांग छात्रों की ज़रूरतों पर ध्यान देने के बजाय, इण्टरनेट सुलभता हासिल करने के ज़्यादा इच्छुक हैं. 

शारीरिक विकलांगता और मानसिक स्वास्थ्य

कामकाज या रोज़मर्रा के जीवन में चलने-फिरने या अन्य गतिविधियों में मुश्किलें महूसस करने वाले लोगों के लिये मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियाँ भी खड़ी हो जाती हैं. 

इनमें बेचैनी और मानसिक अवसाद के लक्षण सामने आते हैं. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक़, मानसिक अवसाद, दुनिया भर में विकलांगता का एक प्रमुख कारण है. एक अनुमान के अनुसार, 28 करोड़ लोग अवसाद से ग्रस्त हैं – पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अधिक प्रभावित होती हैं.  

शारीरिक विकलांगता के कारण ना सिर्फ़ मानसिक कष्ट पैदा होता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य बीमारियाँ भी एक प्रकार से अदृश्य विकलांगता का ही रूप है. 

इन्हें व्यक्तित्व के विकास से जुड़े एक ऐसे अहम मुद्दे के रूप में देखा जाता है जिसकी अक्सर उपेक्षा की जाती है. 

मानसिक स्वास्थ्य समस्या के साथ रह रहे लोग, कोविड-19 महामारी से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हुए हैं. 

माली में विकलांगों को साबुन और जूते बनाना सिखाया जा रहा है.
MINUSMA/Sylvain Liecht
माली में विकलांगों को साबुन और जूते बनाना सिखाया जा रहा है.

हिंसा: विकलांगता की एक वजह 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, किसी घटना में चोट लगने या हिंसा की चपेट में आना, विकलांगता में गुज़ारे जाने वाले वर्षों के 10 फ़ीसदी के लिये ज़िम्मेदार है. 

युद्ध में मारे जाने वाले हर एक बच्चे के लिये, तीन अन्य घायल होते हैं और फिर वे स्थाई रूप से किसी विकलांगता का शिकार होते हैं. 

कुछ देशों में, विकलांगता के क़रीब एक चौथाई मामले, हिंसा व चोट लगने होने से सामने आते हैं,  

संयुक्त राष्ट्र के सक्रिय प्रयास

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विकलांगजन को पीछे ना छूटने देने के लिये एकीकृत उपाय अपनाए जाने ज़रूरी हैं. 

जीवन के हर क्षेत्र में विकलांग व्यक्तियों का समावेशन सुनिश्चित किया जाना, मानवाधिकारों की रक्षा, टिकाऊ विकास की दिशा में प्रगति और शान्ति व सुरक्षा के नज़रिये से बेहद अहम है. 

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने जून 2019 में विकलांगता समावेश रणनीति पेश की थी जिसके माध्यम से संगठन के मानक और प्रदर्शन को ऊपर उठाने का प्रयास किया जा रहा है. 

यह रणनीति एक ऐसी मज़बूत नींव तैयार करने का वादा करती है जिससे संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में विकलांगता समावेशन पर टिकाऊ और कायापलट कर देने वाली प्रगति संभव बनाई जा सके.

भारत में विकलांग बच्चों को भी मुख्य धारा की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए माता-पिता, अभिभावक और शिक्षकों के नज़रिये में बदलाव बहुत ज़रूरी है.
UNESCO – India
भारत में विकलांग बच्चों को भी मुख्य धारा की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए माता-पिता, अभिभावक और शिक्षकों के नज़रिये में बदलाव बहुत ज़रूरी है.

टिकाऊ विकास के 2030 ऐजेण्डा के तहत, विकलांगता के विषय पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, अनेक टिकाऊ विकास लक्ष्य इसमें शामिल किये गए हैं जिनमें मुख्य रूप से शिक्षा, रोज़गार, असमानता, मानव बस्तियां हैं.

वर्ष 2006 में पारित हुई विकलांगजन अधिकार सन्धि के लिये, विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों व सम्भावनाओं को साकार करने और उनके कल्याण के लिये अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण का प्रयास किया जा रहा है. 

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