विकासशील जगत में जलवायु अनुकूलन, हरित औद्योगिक नीतियाँ अहम

व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) ने सचेत किया है कि विकासशील देशों में जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखते हुए, अनुकूलन प्रयासों के लिये हरित औद्योगिक नीतियाँ अपनाया जाना बेहद अहम है. जलवायु-सम्बन्धी आपदाओं के कारण, विकासशील देशों को पहले ही, उच्च-आय वाले देशों की तुलना में तीन गुना आर्थिक नुक़सान झेलना पड़ रहा है. 

यूएन एजेंसी ने गुरूवार को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में रूपान्तरकारी तरीक़े अपनाए जाने पर ज़ोर दिया है, जिससे इन देशों को मौजूदा व भावी जलवायु ख़तरों से निपटने में मदद मिले और, आर्थिक प्रगति व रोज़गार सृजित किया जाना भी सम्भव हो सके.

यूएन एजेंसी के मुताबिक़, अनेक विकासशील देशों में आर्थिक और जलवायु व्यवधानों के प्रति सम्वेदनशीलता एक दूसरे को और पैना कर रही हैं. 

वैश्विक तापमानों में जितनी बढ़ोत्तरी दर्ज की जाएगी, दक्षिणी गोलार्द्ध मे स्थित देशों में उतनी ही अधिक क्षति होने की आशंका है. 

यूएन एजेंसी की महासचिव रेबेका ग्रीनस्पान ने बताया, “रिपोर्ट दर्शाती है कि जलवायु चुनौती के अनुरूप ढलने के लिये पर्याप्त कार्रवाई के लिये, रूपान्तरकारी बदलाव की आवश्यकता है, जो केवल प्रतिक्रियात्मक होने के बजाय सक्रियतापूर्ण और रणनैतिक हो.” 

इसके लिये, विकासशील देशों की सरकारों को पर्याप्त नीतिगत व वित्तीय उपायों के ज़रिये, भावी जलवायु जोखिमों का सामना करने के लिये, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश के लिये लामबन्दी की आवश्यकता होगी.

बताया गया है कि इस प्रक्रिया में विकास लक्ष्य भी सुनिश्चित किये जाने होंगे. 

यह अध्ययन, यूएन एजेंसी की वार्षिक व्यापार एवं विकास रिपोर्ट की दूसरी कड़ी है, जिसका पहला हिस्सा सितम्बर में जारी किया गया था.

अनुकूलन क़ीमतों में बढ़ोत्तरी

यूएन एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती के समानान्तर, जलवायु अनुकूलन पर भी ध्यान दिया जाना बेहद अहम है, मगर अभी इस दिशा में अपर्याप्त प्रयास ही नज़र आए हैं. 

विकासशील देशों के लिये यह विशेष रूप महंगा और अदूरदर्शितापूर्ण साबित हो सकता है, जहाँ जलवायु झटकों से आर्थिक प्रगति सम्भावनाओं पर असर पड़ सकता है और सरकारों को अन्य क्षेत्रों में, सीमित संसाधन आबण्टित करने के लिये मजबूर होना पड़ सकता है. 

विकासशील देशों के लिये अनुकूलन क़ीमतें पिछले एक दशक में दोगुनी हो गई हैं और इसकी एक मुख्य वजह कार्रवाई का अभाव है.

तापमान में बढ़ोत्तरी होने के साथ ही, इनमें और अधिक वृद्धि होने की सम्भावना है – वर्ष 2030 में यह 300 अरब डॉलर और 2050 में 500 अरब डॉलर का आँकड़ा छू सकती है. 

देशों को सलाह दी गई है कि जलवायु सहनक्षमता को मज़बूत करने के लिये डेटा संग्रहण और जोखिम मूल्यांकन तकनीकों को बेहतर बनाया जाना होगा.  

मगर, रिपोर्ट में सचेत भी किया गया है कि अनुकूलन, जोखिम प्रबन्धन का विषय होने से ज़्यादा, विकास योजना से जुड़ा मामला अधिक है, और इसमें सरकार की अहम भूमिका है. 

अहम उपाय

रिपोर्ट में पेश किये गए प्रस्ताव के अनुसार, हरित औद्योगिक नीतियों को लागू करने के लिये, विकास को फिर से संयोजित किया जा सकता है. इन नीतियों को तैयार करते समय, स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों का भी ख़याल रखा जाना होगा. 

उदाहरणस्वरूप, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, लघु स्तर पर संचालित किया जा सकता है और इससे छोटे उद्यमों और ग्रामीण इलाक़ों के लिये नए व्यावसायिक अवसर भी पैदा होंगे. 

इन उपायों से आर्थिक उत्पादन को विविधतापूर्ण बनाने, चन्द अहम वस्तुओं पर निर्भरता घटाने और करदाताओं की संख्या बढ़ाने में मदद मिलेगी.

इससे, विकास वित्त पोषण के लिये नए घरेलू स्रोत भी सृजित किये जा सकेंगे. 

रिपोर्ट में पेश अनुशंसाओं के अनुसार, विकासशील देशों में जलवायु अनुकूलन के लिये कुछ अहम बातें समाहित की जानी होंगी. 

इसके अन्तर्गत, व्यापक पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा और हरित टैक्नॉलॉजी में सार्वजनिक निवेश किया जाना होगा, पर्यावरण व लघु उत्पादकों का संरक्षण सुनिश्चित करने वाली हरित कृषि नीतियाँ अपनाई जानी होंगी और आमतौर पर ज़्यादा अपनाई जाने वाली मितव्ययिता सम्बन्धी नीतियों से हटना होगा. 

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