महामारी के दौर में हुए शिक्षा नुक़सान का आकलन करने और स्कूल फिर खोलने का आग्रह

संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों और उनके साझीदार संगठनों ने मंगलवार को कहा है कि कोविड-19 महामारी के कारण स्कूल बन्द होने से छात्रों की शिक्षा का जो नुक़सान हुआ है उसकी भरपाई के लिये लगभग एक तिहाई देशों में अभी तक कोई उपचारात्मक कार्यक्रम लागू नहीं किये गए हैं.

ये बात, एक ताज़ा सर्वे के नतीजों में कही गई है जो यूनेस्को, यूनीसेफ़, विश्व बैंक और आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने मिलकर आयोजित कराया था.

इस बीच केवल एक तिहाई देश, अपने यहाँ प्राथमिक और निम्न सेकण्डरी स्तरों पर हुए शिक्षा नुक़सान का जायज़ा लेने के लिये क़दम उठा रहे हैं. इनमें मुख्य रूप से उच्च आय वाले देश शामिल हैं.

यूनेस्को के सांख्यिकी संस्थान की निदेशिक सिलविया माँटोया का कहना है, “शिक्षा प्राप्ति में हुए नुक़सान का जायज़ा लेना, इसके परिणामों का असर कम करने की दिशा में पहला क़दम है."

"ये बहुत अहम और ज़रूरी है कि देश, सटीक उपचारात्मक उपाय करने के लिये, शिक्षा प्राप्ति में हुए नुक़सान का गहराई से आकलन करने में संसाधन निवेश करें.” 

सर्वे में जोखिमों की जानकारी

कुल मिलाकर, 142 देशों ने इस सर्वे में भाग लिया जो वर्ष 2021 के दौरान फ़रवरी से मई महीनों के बीच कराया गया. इसमें पूर्व प्राइमरी से लेकर ऊपरी सेकण्डरी स्कूली शिक्षा के चार स्तर शामिल किये गए.

निम्न व मध्य आय वाले एक तिहाई से भी कम देशों ने बताया कि सभी छात्र, शिक्षा प्राप्ति के लिये स्कूलों में आने लगे है, जिससे शिक्षा प्राप्ति में हुए नुक़सान और स्कूली शिक्षा से वंचित रहने वाले बच्चों की संख्या का अन्दाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.

अलबत्ता, अधिकतर देशों ने फिर से शिक्षा प्राप्ति के लिये छात्रों को स्कूल जाने की ख़ातिर प्रोत्साहित करने के लिये अनेक उपाय किये हैं जिनमें सामुदायिक सम्पर्क, स्कूल आधारित निगरानी, वित्तीय आकर्षण और पानी, स्वच्छता व साफ़-सफ़ाई सेवाओं में बेहतरी करना शामिल है.

इस सर्वे में ये जानकारी भी एकत्र की गई है कि देशों में, स्कूल फिर से खोले जाने और दूरस्थ शिक्षा रणनीतियाँ लागू करने के रास्ते में आने वाली चुनौतियों का किस तरह सामना कर रहे हैं.

यूनीसेफ़ के शिक्षा मामलों के वैश्विक प्रमुख रॉबर्ट जैनकिन्स का कहना है, “दुनिया भर में स्कूल बन्द रहने के दौरान, दूरस्थ शिक्षा, बहुत से बच्चों के लिये जीवन रेखा साबित हुई है. लेकिन कमज़ोर हालात वाले बहुत से बच्चों के लिये, दूरस्थ शिक्षा भी पहुँच के बाहर थी. ये बहुत ज़रूरी और तात्कालिक है कि हम हर बच्चे को, अब फिर से स्कूली शिक्षा में शामिल करें.”

स्कूल तत्काल खुलें

ये रिपोर्ट, मंगलवार को यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा बैठक में, मंत्री स्तरीय प्रखण्ड के दौरान जारी की गई जोकि संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास पर उच्च स्तरीय राजनैतिक फ़ोरम के हिस्से के रूप में आयोजित की गई.

यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले और यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशक हैनरिएटा फ़ोर ने यह बैठक शुरू होने से पहले एक वक्तव्य जारी किया जिसमें स्कूल तत्काल खोले जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया.

19 देशों में अब भी स्कूली शिक्षा लगभग बन्द है जिसके कारण लगभग 15 करोड़ 60 लाख बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है. यूएन एजेंसियों की शीर्ष पदाधिकारियों ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा है कि बच्चों और किशोरों के स्कूली शिक्षा से वंचित रहने की भरपाई, शायद कभी ना हो पाए.

भविष्य का गिरवीं रखा जाना

यूएन एजेंसियों की पदाधिकारियों का कहना है कि स्कूल बन्द रहने से माता-पिता, अभिभावकों और देखभाल करने वालों पर भी असर पड़ता है, क्योंकि बच्चों को घर पर रखकर देखभाल करने के कारण, बहुत से अभिभावकों को अपने रोज़गार व कामकाज छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ा है, विशेष रूप से उन देशों में जहाँ परिवार के लिये अवकाश की या बिल्कुल भी नीतियाँ नहीं हैं या फि सीमित स्तर की हैं.

संयुक्त राष्ट्र पदाधिकारियों ने निर्णय-निर्माताओं और सरकारों से आग्रह किया है कि स्कूल फिर से सुरक्षित तरीक़े से खोले जाने को प्राथमिकता दें ताकि एक पूरी पीढ़ी को तबाही से बचाया जा सका. 

उन्होंने ऐसे सबूतों की तरफ़ भी ध्यान दिलाया जिनमें कहा गया है कि स्कूल, कोरोनावायरस संक्रमण के फैलाव के मुख्य केन्द्र नहीं रहे हैं. स्कूल खोल जाएँ या नहीं, ये फ़ैसला जोखिम विश्लेषण और महामारी सम्बन्धी विभिन्न पहलुओं पर गहराई से ग़ौर करने के बाद किया जाना चाहिये, जिसमें स्थानीय समुदायों की परिस्थितियों का आकलन भी शामिल हो.

उन्होंने कहा, “स्कूल बन्द रखने से, वर्तमान में अस्पष्ट फ़ायदों की ख़ातिर, हमारा भविष्य गिरवीं रखा जाता है. हमें ज़्यादा बेहतर विकल्पों को प्राथमिकता पर रखना होगा. हम सुरक्षित तरीक़े से स्कूल फिर से खोल सकते हैं, और हमें ऐसा करना ही होगा.”

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