भारत: हरित पूंजी में व्यय के लिये चुनौतीपूर्ण रास्ता

नवम्बर 2021 में ग्लासगो में जलवायु सम्मेलन (COP26 )के दौरान, भारत ने नैट ज़ीरो प्राप्ति के लिये, उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लिये 2050 और चीन के लिये 2060 की तुलना में, 2070 की लक्ष्य तिथि निर्धारित की. भारत ने साथ ही, कोयले के सम्बन्ध में अपने संकल्प के शब्दों को "चरणबद्ध तरीक़े से ख़त्म" करने की बजाय "चरणबद्ध तरीक़े से कम करने" में बदल दिया. ये दूरगामी निर्णय थे, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता के कमज़ोर पड़ने के रूप में देखा गया. भारत के उस निर्णय की पृष्ठभूमि, व देश की वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHGs) कटौती की प्रतिबद्धताओं पूरा करने की योजना के बारे में, विश्व बैंक के जलवायु और स्थाई वित्त विशेषज्ञ अमन हंस के इस ब्लॉग में विस्तृत विश्लेषण...

1751 से 2017 तक, कुल वायुमण्डलीय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (GHGs) में, भारत का संचयी योगदान 3 प्रतिशत रहा है. आज, भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 1.92 टन है, जो एशियाई महाद्वीप के 4.48 टन औसत और कोविड पूर्व वैश्विक औसत के आधे से भी कम है. यह काफ़ी हद तक इस वजह से है कि देश की जीएनआई प्रति पूंजी 1902 डॉलर है जो इसे निम्न मध्यम-आय वाले राष्ट्र का दर्जा देती है.

लेकिन साथ ही, भारत को विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने का गौरव भी प्राप्त है. देश टिकाऊ विकास के माध्यम से, आने वाले दशक में, ऊपरी मध्यम-आय की स्थिति में छलांग लगाने में सक्षम हो सकेगा. हालाँकि, इस सफलता का एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह है कि देश अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जक बन गया है.

भारत के, वृद्धिशील ऊर्जा मांग का सबसे बड़ा हिस्सा बनाने की भी उम्मीद है, क्योंकि यह 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता बनने के लिये योरोपीय संघ से आगे निकलता दिखाई दे रहा है.

हम जानते हैं कि, भले ही ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी करना, देशों के लिये एक स्वैच्छिक कार्रवाई है, फिर भी इसकटौती में देरी करने से स्पष्ट और निहित लागतों में बढ़ोत्तरी होना लाज़मी है - जैसेकि देशों और कॉरपोरेट्स को हमेशा सख़्त "हरित" शर्तों का सामना करना पड़ता है, जलवायु सम्बन्धित वित्तीय प्रकटीकरण (टीसीएफ़डी) पर टास्क फोर्स, आवश्यकताओं और अन्तरराष्ट्रीय वित्त के प्रवाह एवं लागत को हरित व्यापार प्रमाण-पत्रों से जोड़ना.

बढ़ते प्रदूषण से ख़तरा भी

भारत जैसे आयात पर निर्भर देश की भी सख़्त ज़रूरत है कि वो ऊर्जा सुरक्षा और देश के खाते में सुधार के लिये, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करे. इसके अलावा, स्वच्छ ऊर्जा में निवेश का अर्थशास्त्र, निवेशकों के लिये अधिक आकर्षक होता जा रहा है. और अन्तिम लेकिन बेहद महत्वपूर्ण, भारत में बढ़ते प्रदूषण के स्तर से स्वास्थ्य के लिये एक बड़ा ख़तरा पैदा हो रहा है, जिससे श्रम उत्पादकता कम हो रही है और आर्थिक उत्पादन में सेन्ध लग रही है.

इसलिये, भारत जैसी विकासशील एवं बड़ी अर्थव्यवस्था के लिये, स्वच्छ ऊर्जा बदलाव हासिल करना केवल ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के बारे में नहीं है, यह देश के लिये सामर्थ्य, सुरक्षा और स्थिरता के साथ-साथ, दीर्घकालिक व्यापार बाधाओं को सन्तुलित करने का एक साधन भी है.

भारत ने कॉप26 में, 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद की कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत तक की कमी के लक्ष्य की घोषणा की है - नवीकरणीय स्रोतों से अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ. सरकार ने 2030 तक समग्र गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगा वाॉट तक बढ़ाने के अपने इरादे का संकेत दिया है, हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह विशेष रूप से बिजली उत्पादन के बारे में है या नहीं.

भारत की जलवायु परिवर्तन कार्रवाई को सफल बनाने के लिये, कई क्षेत्रों में भौतिक प्रगति की आवश्यकता है. इसमें विद्युतिकरण और दक्षता लाभ की एक प्रमुख भूमिका रहेगी, जबकि "हार्ड-टू-एबेट" यानि सीमेंट, स्टील और कृषि जैसे जिन क्षेत्रों के लिये बदलाव आसान नहीं है, उन्हें उपयुक्त कार्बन ऑफ़सेटिंग तंत्र पर भी विचार करने की आवश्यकता हो सकती है.

जीवाश्म ईंधन बिजली संयंत्र ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक में से एक हैं जो जलवायु परिवर्तन का कारण बनते हैं.
© Unsplash/Ella Ivanescu
जीवाश्म ईंधन बिजली संयंत्र ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक में से एक हैं जो जलवायु परिवर्तन का कारण बनते हैं.

सामान्यतः, प्राथमिक ऊर्जा स्रोत के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा की मांग को भौतिक रूप से बढ़ाया जा सकता है. हमें परिवहन के विद्युतीकरण और ग्रिड को हरा-भरा करने के लिये, बैटरी भण्डारण की अधिक पैठ के ज़रिये, तेज़ी से प्रगति की उम्मीद करनी चाहिये. रॉकी माउण्टेन इन्स्टीट्यूट की एक हाल ही की रिपोर्ट के अनुसार, उन्नत बैटरी स्टोरेज की संचयी मांग, 2030 तक दोगुनी से अधिक होने की उम्मीद है, और 2030 तक भारत, वैश्विक बाज़ार के एक बड़े हिस्से यानि वैश्विक बैटरी मांग के अनुमानित 13 प्रतिशत पर कब्ज़ा करने के लिये मुस्तैदी से तैयार है. 

कोयला प्रचुर मात्रा में घरेलू उपलब्धता के कारण, भारत की 70 प्रतिशत से अधिक बिजली के उत्पादन में इस्तेमाल होता है. हालाँकि, नवीकरणीय स्रोतों की तुलना में ग्रीनफील्ड कोयला संचालित संयंत्र तेजी से अव्यवहार्य होते जा रहे हैं. सरकार ने हाल ही में, ‘बण्डल्‍ड पावर’ नीतिगत समर्थन की भी घोषणा की, जिससे मौजूदा बिजली ख़रीद समझौतों के तहत, कोयला बिजली जैनरेटर को अक्षय ऊर्जा की आपूर्ति करने की अनुमति होगी.

इसके अलावा, देश के मज़बूत राष्ट्रीय नेटवर्क और बड़े पैमाने पर बैटरी अनुप्रयोग की बढ़ती व्यावसायिक व्यवहार्यता को देखते हुए, अक्षय स्रोतों से कुल बिजली उत्पादन का 50 प्रतिशत प्राप्त करना और कुल कोयला बिजली उत्पादन क्षमता को 200 गीगा वॉट के मौजूदा स्तर तक कम करने के लक्ष्य, 2030 तक हासिल करना सम्भव लगता है. लेकिन अगर इसके रास्ते की बाधाओं की बात करें तो वास्तविक परिवर्तन लाने के लिये बड़े पूंजीगत व्यय (CAPEX) की आवश्यकता है.

हरित हाइड्रोजन

भारत सरकार का अनुमान है कि 2023 से 2030 तक 'ग्रीन कैपेक्स'- स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन को सक्षम करने वाली प्रौद्योगिकी में 250 अरबन डॉलर तक के निवेश करने की ज़रूरत होगी. इसके लिये, एकजुट सार्वजनिक नीतियों की आवश्यकता है जो निजी क्षेत्र की भागीदारी पर जोर दें. इसमें कुछ सफलताएँ ज़रूर हासिल हुई हैं: भारत ने हाल ही में 50 GWh उन्नत बैटरी भण्डारण और 10GW सौर पैनलों के लिये उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन लागू किये हैं, जिसमें घरेलू निर्माताओं के लिये मूल्य पर कब्ज़ा और पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करने हेतु नक़द प्रोत्साहन शामिल हैं.

इन योजनाओं को निजी क्षेत्र से अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिली है. सरकार ने हाइब्रिड व इलैक्ट्रिक वाहनों को तेज़ी से अपनाने और निर्माण को बढ़ावा देने के लिये एक नीति भी लागू की है. हाल ही में, देश के सम्पूर्ण रेलवे नेटवर्क के विद्युतीकरण के रोडमैप की घोषणा भी सांकेतिक है.

हरित हाइड्रोजन भारत के लिये ज़्यादा सम्भावनापूर्ण व प्रासंगिक है. यह परिवहन के सभी रूपों के लिये आवश्यक ईंधन की जगह ले सकता है, ग्रिड-स्केल बिजली उत्पन्न और स्टोर कर सकता है,  उद्योगों में कोयले की जगह ले सकता है, और यहाँ तक कि घरों में पाइप से इसकी आपूर्ति की जा सकती है.

भारत सरकार ने देश को हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात के लिये एक वैश्विक केन्द्र बनाने के उद्देश्य से, अगस्त 2021 में अपने राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन की घोषणा की थी. भारत का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है - हरित हाइड्रोजन की लागत को 1 डॉलर प्रति किलोग्राम तक कम करना और 2030 तक 50 लाख टन के उत्पादन को उत्प्रेरित करने के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना.

भारत ने दिखाया है कि उचित नीति समर्थन के ज़रिये, वह एक सौर ऊर्जा बाज़ार बना सकता है जो तेज़ी से किफ़ायती रूप ले सकता है. अब, इसी तरह की सम्भावनाएँ, हरित हाइड्रोजन ईंधन और ईंधन-सेल सक्षम परिवहन, उन्नत बैटरी भण्डारण, एवं इलैक्ट्रिक वाहनों में मूल्य श्रृंखला व बुनियादी ढाँचे में निजी निवेश को आकर्षित करने के लिये उभर रही हैं.

देश अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के मामले में पीछे नहीं हट रहा है. बल्कि वह दूरदर्शी क़दम उठा रहा है, जिनमें से अनेक में सरकार द्वारा बेहतर सेवा वाले क्षेत्रों के लिये दुर्लभ सार्वजनिक ख़र्च को बनाए रखने हेतु, निजी क्षेत्र की भागीदारी शामिल है.
 
लेकिन क्या ये पर्याप्त होगा - यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका निष्पक्ष उत्तर देना एक चुनौती है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ था.

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