भारत: वायु प्रदूषण के ख़िलाफ़ प्रदेशों की मुहिम

भारत में वायु गुणवत्ता प्रबन्धन एक क्षेत्रीय मुद्दा है. विश्व बैंक, राज्य-व्यापी स्वच्छ वायु कार्य योजना विकसित करने के लिये, शहर स्तर पर योजना बनाने में उत्तर प्रदेश और बिहार प्रदेशों की  मदद कर रहा है, जिसे पूरे राज्य में विस्तार के लिये उपयोग किया जा सकेगा.

भारत में पिछले कुछ दशकों में, आर्थिक विकास के कारण वायु गुणवत्ता में तेज़ी से गिरावट आई है. राजधानी दिल्ली का उच्च प्रदूषण स्तर और दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में लगातार नाम आने से मीडिया का ध्यान इस तरह आकृष्ट हुआ है, जिससे वायु प्रदूषण नियमित सार्वजनिक जाँच के दायरे में आ गया है.

हालाँकि, आम धारणा के विपरीत, भारत में वायु प्रदूषण केवल शहरी या एक शहर का मुद्दा नहीं है. देश की वायु गुणवत्ता क्षेत्रीय स्तर पर ख़तरनाक बनी हुई है, ख़ासतौर पर गंगा नदी के मैदानी इलाक़ों में - जिसके अन्तर्गत सात उत्तरी राज्य आते हैं.

हालाँकि सब जानते हैं कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) पर, पड़ोसी राज्यों, पंजाब और हरियाणा में फ़सल अवशेष जलाने से वायु गुणवत्ता पर असर पड़ता है, लेकिन प्रदूषण प्रबन्धन के लिये भारत की वर्तमान योजना का ढाँचा अभी सीमित है. 

शहरी कार्य योजनाएँ अपने अधिकार क्षेत्र तक ही सीमित हैं और वायु प्रदूषण के उन मूल स्रोतों की पहचान नहीं करतीं, जो उनकी नगरपालिका की सीमा से परे होते हैं. जैसेकि, गंगा के मैदानी इलाक़े में स्थित कानपुर व पटना जैसे शहरों को घेरने वाले कोहरे का लगभग एक तिहाई हिस्सा, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में खाना पकाने व गर्माई करने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले ईंधन के जलने से उत्पन्न होता है.

चूँकि वायु प्रदूषण स्पष्ट रूप से शहरों, राज्यों और यहाँ तक कि राष्ट्रों की सीमाओं से परे का मुद्दा है, इसलिये केवल शहरी कार्य योजनाएँ, व्यापक क्षेत्र में उत्सर्जन को कम करने के लिये पर्याप्त नहीं होंगी.

इसके लिये, सबसे पहले हर एक राज्य को अपनी मदद करने के प्रयास करने होंगे, उसके बाद ही इसका लाभ दूसरे राज्यों को मिल सकेगा.

बिहार और उत्तर प्रदेश, मुहिम में अग्रणी

अच्छी ख़बर यह है कि इस चुनौती से निपटने के लिये राज्य बेहतर राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार की घनी आबादी वाले राज्यों में, जो देश के सबसे ग़रीब राज्य भी हैं, विश्व बैंक राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि राज्य-व्यापी स्वच्छ वायु कार्य योजनाएँ विकसित की जा सकें. इनकी प्राथमिकता है कि वर्ष 2024 या 2030 तक वायु गुणवत्ता लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये कार्रवाई की जा सके.

बिहार राज्य के भीतर और बाहर दोनों से प्रदूषक आते हैं,  जिससे प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय मानकों से बहुत अधिक रहता है. सरकारों ने अब पूरे राज्य में वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों के एक नेटवर्क की स्थापना का बीड़ा उठाया है.

स्थानीय ज्ञान और अन्तरराष्ट्रीय उत्कृष्ट प्रथाओं के मेल से, बिहार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में अपने निगरानी स्टेशन स्थापित किये हैं, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि किस स्रोत से कितना प्रदूषण होता है - कृषि, उद्योग, घर, परिवहन या निर्माण. इससे पहले, केवल पटना, गया और मुजफ़्फ़रपुर के प्रमुख शहरों में निगरानी स्टेशन थे और राज्य के 38 ज़िलों में से सिर्फ़ 4 ज़िलों में योजना लागू की गई थी.

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव, एस चन्द्रशेखर ने बताया, "अब हम शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में, 24 स्टेशनों से आँकड़े एकत्र कर रहे हैं और इसका केन्द्रीय रूप से विश्लेषण कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि भविष्य में, उनकी योजना शहरों से आगे बढ़ने और विभिन्न क्षेत्रों को एक साथ लाने की होगी, जिससे उन्हें अपने कार्य समन्वित करने में मदद मिलेगी ताकि राज्य के साथ-साथ उसके बाहर के लोगों को भी लाभ मिल सके."

इसके अलावा, चूँकि घरों में बायोमास जलाना, बिहार में वायु प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है, इसलिए ‘द एनर्जी रिसर्च इन्स्टीट्यूट (TERI)’ के सहयोग से, विश्व बैंक की 'जीविका ग्रामीण आजीविका परियोजना', एक ऐसे कार्यक्रम में मदद कर रही है जो ग्रामीण महिलाओं के बीच सौर ऊर्जा से चलने वाले धुँआ रहित चूल्हों के उपयोग को बढ़ावा देता है. महिलाओं का कहना है कि बायोमास जलाने वाले चूल्हों से स्वच्छ ऊर्जा वाले चूल्हों में बदलाव लाने से, उनके स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ा है और ईंधन की भी बचत हुई है.

उत्तर प्रदेश ने भी राज्य भर में वायु प्रदूषण के मुद्दे को हल करने के लिये सक्रिय रूप से काम शुरू कर दिया है. उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कानपुर के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और विश्व बैंक के साथ मिलकर एक स्वच्छ एयरशेड योजना विकसित कर रहा है. आँकड़े इकट्ठे किए जा रहे हैं और प्रत्येक क्षेत्र में सबसे अधिक लागत प्रभावी हस्तक्षेपों पर फ़ैसला करने के लिये मॉडल जाँचे जा रहे हैं. राज्य की स्वच्छ वायु प्रतिबद्धताओं और लक्ष्यों तक पहुँचने के लिये आवश्यक नीतियाँ, संस्थान और अनुपालन तंत्र विकसित करने के प्रयास भी जारी हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव, आशीष तिवारी कहते हैं, “उत्तर प्रदेश गंगा के मैदान के बीचो-बीच है, जिसे दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण का 'हॉटस्पॉट' भी माना जाता है. इसलिये, हमारे राज्य पर न केवल अपने स्थानीय स्रोतों के प्रदूषण प्रबन्धन करने की चुनौती है, बल्कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे आसपास के राज्यों से होने वाले उत्सर्जन से निपटने की दोहरी चुनौती भी है. हमारी राज्य कार्य योजना हमें लम्बी दूरी के प्रदूषकों से निपटने के लिये एक रोडमैप देगी ताकि यहाँ के नागरिक स्वच्छ हवा में साँस ले सकें. यह योजना क्षेत्रीय सहयोग के आधार पर एक मजबूत वायु प्रदूषण शमन रणनीति की नींव भी प्रदान करेगी.”

अगले क़दम

जबकि इन दो गंगा-मैदानी राज्यों में स्वच्छ हवा के लिये पहले क़दम उठाए जा रहे हैं, इन्हें जारी रखने के लिये पर्याप्त कार्रवाई की आवश्यकता होगी.

राज्यों को बहु-क्षेत्रीय सम्वाद के लिये शहर और राज्य प्रशासनों के साथ-साथ लाइन विभागों के बीच समन्वय के नए तरीक़े विकसित करने की आवश्यकता होगी, ताकि कार्यों को समन्वित करके, प्राथमिकता दी जा सके. इसमें हितधारकों के साथ विचार-विमर्श कर, व्यापक क्षेत्र के लिये नए प्राधिकरणों का निर्माण शामिल हो सकता है. 

राज्यों के प्रयासों के अलावा, केन्द्र सरकार के समर्थन से क्षेत्रीय समन्वय तंत्र भी स्थापित करने की आवश्यकता होगी. तभी राज्यवार स्वच्छ वायु योजनाएँ अन्तरराज्यीय और क्षेत्रीय सहयोग के लिये एक महत्वपूर्ण आधार बन सकेंगी.
 
विश्व बैंक की प्रमुख पर्यावरण विशेषज्ञ, कैरिन शेपर्डसन ने कहा, “हम इस महत्वपूर्ण मोड़ पर भारत के साथ काम कर रहे हैं, क्योंकि इसमें व्यापक प्रबन्धन दृष्टिकोण अपनाया गया है. उत्सर्जन में एक औसत दर्जे की कमी करके, लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर जीवन गुणवत्ता हासिल होगी.”

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ था.

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