भारत: दयालुता के प्रसार के लिये वैश्विक मुहिम

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन - यूनेस्को के शान्ति एवं सतत विकास के लिये महात्मा गांधी शिक्षा संस्थान (UNESCO MGIEP) के #KindnessMatters अभियान में, हज़ारों युवा भारतीय शामिल हुए हैं, जिसका उद्देश्य है - युवाओं के बीच उदारता की सकारात्मक संस्कृति को बढ़ावा देना और विश्व को एक बेहतर जगह बनाने के लिये प्रोत्साहित करना.

केरल के मंचदिक्करी गाँव में अभी सूर्योदय नहीं हुआ है, लेकिन एनएस राजप्पन की आँखों में नींद नहीं है. 69 वर्षीय यह ग्रामीण बुज़ुर्ग के पाँव बचपन में पोलियो से लकवाग्रस्त हो गए थे. वो रेंगते हुए मीनाचिल नदी में जाते हैं और नाव पर चढ़ जाते हैं. फिर 17 घण्टे तक वो वेम्बनाड झील के जलमार्ग से प्लास्टिक कचरा एकत्र करते हैं.

ऐसा वो पिछले पाँच साल से लगभग रोज़ाना करते आ रहे हैं. "KindnessMatters" नामक पुस्तक के एक अध्याय में उनका ज़िक्र करते हुए कहा गया है, "और वह हर दिन काम करना जारी रखते हैं, अपने आस-पास की प्राकृतिक दुनिया में उदारता फैलाते हुए, बारी-बारी, एक-एक प्लास्टिक की बोतल के ज़रिये."

भारत और दुनिया भर में हज़ारों छात्रों के लिये, राजप्पन एक उम्मीद की किरण हैं. उनके जैसे कई लोग, एक बेहतर दुनिया के लिये – छोटे-बड़े - प्रयास कर रहे हैं. राजप्पन की कहानी, नवम्बर 2021 में प्रकाशित इस पुस्तक की 50 ऐसी ही कहानियों में से एक है.

यह कहानी सिद्ध करती है कि दुनिया में उदारता की कितनी आवश्यकता है. यही सोच, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के शान्ति एवं सतत विकास के लिये महात्मा गांधी शिक्षा संस्थान (MGIEP) के नेतृत्व में चल रहे इस वैश्विक आन्दोलन के केन्द्र में है.

यह पुस्तक, #KindnessMatters अभियान का एक हिस्सा है, जिसे यूनेस्को MGIEP ने 2018 में शुरू किया था और संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्यों द्वारा अपनाए गए 17 टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये, दुनियाभर के युवाओं को जुटाने का एक प्रयास है.

टिकाऊ विकास लक्ष्यों में ग़रीबी व भुखमरी समाप्त करने, लैंगिक समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं साफ़ पानी व स्वच्छता के लिये कार्रवाई शामिल है.

उदारता पर केन्द्रित मुहिम

यह अभियान 2 अक्टूबर, 2018 को शुरू हुआ, जोकि उदारता के सिद्धान्तों के लिये बेहद अहम दिन व साल है. शान्ति के दूत, महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को हुआ था, और 2018 में उनकी 150वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में समारोह आयोजित किये गए.

इस साल, दक्षिण अफ़्रीका के नेता और नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता, नेल्सन मण्डेला की जन्म शताब्दी भी मनाई गई. यह अभियान युवाओं पर केन्द्रित है और इसकी शुरूआत भारत, दक्षिण अफ़्रीका व पाकिस्तान में युवा गतिविधियों के साथ की गई.

भारतीय युवाओं के समूहों ने अन्तरराष्ट्रीय रैडक्रॉस संघ और रैड क्रिसेण्टट सोसाइटीज़ के सहयोग से, बड़े पैमाने पर रक्तदान अभियान, भोजन वितरण और वंचित बच्चों के लिये शैक्षिक सत्र आयोजित किये.

अभियान के तहत, प्रतिभागियों को यूनेस्को वैबसाइट के एक स्टोरीबोर्ड पर, अपनी उदारता की कहानियाँ प्रस्तुत करने के लिये आमंत्रित किया गया – फिर चाहे वो एक कम्बल दान करने की कहानी हो या फिर किसी जानवर की मदद करने की. इस पर अब तक, 150 देशों के युवाओं की 12 लाख कहानी दर्ज की जा चुकी हैं.

सम्पूर्ण जगत, एक परिवार

सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने वाले सामाजिक और भावनात्मक कौशल हासिल करने के लिये युवाओं को अवसर देने हेतु, UNESCO MGIEP ने अगस्त 2019 में, नई दिल्ली में उदारता पर पहला विश्व युवा सम्मेलन आयोजित किया.

'वसुधैव कुटुम्बकम: समकालीन दुनिया के लिये गांधी' विषय पर आधारित इस सम्मेलन में, एसडीजी हासिल करने में करुणा की भूमिका को उजागर किया गया. संस्कृत शब्द 'वसुधैव कुटुम्बकम' का अर्थ है – पूरा विश्व एक परिवार है.

सम्मेलन से युवा वैश्विक विचारकों को, अपनी सामाजिक और भावनात्मक क्षमताएँ विकसित करने के लिये एक आकर्षक मंच मिला. 13 नवम्बर को 'विश्व दयालुता दिवस' मनाया जाता है, जो 1998 में, अन्तरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संगठनों के गठबन्धन, विश्व दयालुता आन्दोलन ने शुरू किया था.

हर साल 13 नवम्बर को सकारात्मकता की शक्ति पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है. दूसरा विश्व सम्मेलन अक्टूबर 2020 में आयोजित किया गया था, जिसका 'शान्तिपूर्ण एवं टिकाऊ सह-अस्तित्व के लिये उदारता' ही मूल विषय था. 

2 अक्टूबर, 2021 को, UNESCO MGIEP और फेज़ मीडिया (कैनेडा) मीडिया समूह, ने ‘Achieving with Kindness’ विषय पर उदारता पर तीसरे विश्व युवा सम्मेलन की मेज़बानी की.

तीन घण्टे के इस नि:शुल्क वर्चुअल सम्मेलन में 10 लाख से अधिक कहानियों के संग्रह पर चर्चा हुई कि किस तरह स्वयं, दूसरों और प्रकृति के लिये उदारता दिखाने से, सतत विकास लक्ष्य प्राप्त करने में मदद मिलती है.

35 युवाओं ने, अभूतपूर्व कहानियाँ साझा करते हुए बताया कि कैसे उनके सहानुभूति, उदारता व करुणा के कार्यों ने उनके अपने मन मस्तिष्क में, एवं उनके समुदायों में स्थिरता व शान्ति स्थापित की.

युवाओं की शक्ति

दयालुता आन्दोलन भारत में भी युवाओं को आकर्षित कर रहा है. अप्रैल 2021 में देश भर के 107 स्कूलों के छात्र इस वैश्विक अभियान में शामिल हुए. तब से, स्कूलों ने छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और पूर्व छात्रों से दयालुता की एक लाख से अधिक कहानियाँ एकत्र करके, संयुक्त राष्ट्र को भेजी हैं.

ज़ाहिर है, स्कूल न केवल कक्षाओं की पढ़ाई, बल्कि पढ़ाए जाने वाले पाठों से मिले सबक़ पर भी ध्यान दे रहे हैं. 

माउण्ट आबू पब्लिक स्कूल, दिल्ली की प्रिंसिपल, ज्योति अरोड़ा कहती हैं, "एक शिक्षाविद् का काम केवल विज्ञान और गणित पढ़ाना ही नहीं है. हमें एक सम्वेदनशील समाज के निर्माण के लिये छात्रों को सशक्त बनाना है. हम यह कैसे करते हैं? दयालुता के माहौल को बढ़ावा देकर, जहाँ हर कोई एक-दूसरे का सम्मान करे."

2020 की शुरुआत से, स्कूल में छात्रों में करुणा का भाव जागृत करने के लिये कई गतिविधियाँ आयोजित की जा रही हैं. इसमें यह पाया गया कि अधिकांश छात्रों ने दान के साथ दया को जोड़ा.

इस परिभाषा को व्यापक बनाने के लिये शैक्षिक ऑनलाइन सत्र आयोजित किये गए. ज्योति अरोड़ा कहती हैं, "दया किसी भी तरह की हो सकती है - एक पेड़ को पानी देने से लेकर, आवारा जानवर को खाना खिलाने तक.”

उदारता का कोई भी काम, छोटा या बड़ा नहीं होता. नौंवी कक्षा की छात्रा प्रिया त्रिपाठी के लिये, इसके मायने एक दोस्त की मदद करना था, जिसे सड़क दुर्घटना का शिकार होने पर अस्पताल ले जाया गया था, प्रिया त्रिपाठी कहती हैं, ''समय पर इलाज मिलने से उसे जल्दी ठीक होने में मदद मिली.''

उसी स्कूल में छठी कक्षा की छात्रा, तनिष्का जौहर के लिये दयालुता के मायने थे - नियमित रूप से गली के कुत्तों को खाना खिलाना और पौधे लगाना. वो कहती हैं, "इन छोटे-छोटे करूणा भरे कार्यों से मुझे उपलब्धि महसूस होती है." 

स्कूल ने छात्र परिषद में भी ‘दयालुता लीडर’ का पद शुरू किया है. स्कूल परिसर के ठीक बाहर, दयालुता की एक दीवार भी खड़ी की गई है, जहाँ कोई भी कुछ भी दान कर सकते हैं - गर्म कपड़ों, बर्तनों से लेकर पेंसिल के बक्सों तक – जिसे कोई भी ज़रूरतमन्द व्यक्ति लेकर उपयोग कर सकते हैं.

दैनिक उपस्थिति के दौरान, छात्रों को दयालुता के अपने कार्यों से सम्बन्धित बातें बताने के लिये कहा जाता है.

स्कूल में, छात्रों के इन कार्यों की मासिक सूची तैयार की जाती है. दयालुता के पैमाने पर उच्चतम अंक पाने वाले Kindness Ambassadors के पुरस्कार से सम्मानित किये जाते हैं. ज्योति अरोड़ा कहती हैं, "इससे अन्य लोग भी अपनी दयालुता की कहानियाँ इसमें जोड़ने के लिये प्रेरित होते हैं." 

स्कूल ने यह भी साबित कर दिया है कि दयालुता संक्रामक है. ज़्योति अरोड़ा बताती हैं, "इसका एक लहर की भाँति प्रभाव पड़ा. हमने देखा कि यह आन्दोलन एक सकारात्मक बदलाव की सूनामी में तब्दील हो गया."

अपने छात्रों के बीच #KindnessMatters अभियान के लाभों को देखते हुए, उन्होंने अप्रैल 2021 में, पूरे भारत के 1,500 स्कूलों के संघ, ग़ैर-मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की कार्य समिति (the Action Committee of Unaided Recognised Private Schools) को एक प्रस्तुति दी. इनमें से 107 स्कूल UNESCO MGIEP अभियान से जुड़ें.

‘उदारता की दीवार’ पर अपने दान किये सामान के साथ एक परिवार
UNESCO New Delhi/Mount Abu Public School
‘उदारता की दीवार’ पर अपने दान किये सामान के साथ एक परिवार

बड़ी तस्वीर

दक्षिण अफ्रीका के दिवंगत नोबेल पुरस्कार विजेता, आर्चबिशप डेसमण्ड टुटू ने एक बार कहा था, "आप जहाँ भी हैं, वहाँ कुछ अच्छा करें; यह छोटे-छोटे करुणामय कार्य एक साथ मिलकर, दुनिया में बदलाव ला सकते हैं."

यही दयालुता अभियान की जड़ है, जो लोगों को ख़ुद के प्रति, अपने आसपास के लोगों के प्रति और प्रभावी रूप से दुनिया के प्रति दयालु होने की ज़रूरत को रेखांकित करता हैं.

दयालुता की संस्कृति को मज़बूत करने वाले सम्पर्क बनाकर, यह अभियान युवाओं को एक सशक्त मंच प्रदान करता है जहाँ वे करुणा की कहानियाँ साझा करते हैं, और चर्चा करते हैं कि जलवायु परिवर्तन, प्रवासन, विविधता और सामाजिक समावेशन में कमी जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने के लिये इनका उपयोग कैसे किया जा सकता है.

उदाहरण के लिये, वैबसाइट पर कई कहानियाँ, अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ बनाने के बारे में हैं.

करोड़ों भारतीय छात्रों ने स्टोरीबोर्ड में योगदान दिया है. वैबसाइट पर एक सन्देश में कहा गया है कि पूर्वी राज्य ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर की झुग्गियों में, कलिंग दन्त विज्ञान संस्थान के डॉक्टर और इण्टर्न ने हाथों की स्वच्छता व सामाजिक दूरी के बारे में जागरूकता अभियान चलाया.

वहीं एक युवक ने पूर्वी राज्य, पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर से एक सन्देश भेजा, जिसमें लोगों को कोविड-19 के समय में खाद्य सामग्री वितरित करने के बारे में बताया गया था.

पश्चिमी भारतीय प्रदेश महाराष्ट्र की एक स्कूली छात्रा ने लिखा कि उसने अपने शिक्षकों को कोरोना योद्धा मानते हुए, धन्यवाद देने के लिये कार्ड बनाए.

दयालुता के कार्य जारी हैं. लेकिन यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि अध्ययनों में पाया गया है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से दयालु होते हैं. साथ ही, परोपकारी या उदार व्यवहार, पुरस्कार से जुड़े मस्तिष्क नैटवर्क से सम्बन्धित होता है. इस अभियान में, इसी सकारात्मक बदलाव के निर्माण के लिये, इस जैविक आवश्यकता का लाभ उठाने की उम्मीद की गई है.

UNESCO MGIEP की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी, नन्दिनी चैटर्जी सिंह कहती हैं कि दयालुता एक ऐसा गुण है जोकि मानव मस्तिष्क से जुड़ा है.

"शोध से मालूम होता है कि दयालुता दिखाने से ऑक्सीटॉसिन निकलता है, एक न्यूरोट्रांसमीटर, जो सामाजिक रिश्ते व विश्वास बनाने में एक अभिन्न भूमिका निभाता है, और दिल ख़ुश करता है. दयालु होने से सेरोटोनिन भी बढ़ता है, जो मूड को नियन्त्रित करने और सकारात्मक रहने में मदद करता है. निरन्तर उदारता दिखाना अत्यधिक फ़ायदेमन्द रहता है."

यह अभियान दयालुता पर केन्द्रित अन्य मंचों की भूमिका को भी रेखांकित करता है. अलीना आलम को इस विषय पर 2021 के विश्व युवा सम्मेलन में बोलने के लिये आमन्त्रित किया गया था. अलीना, ‘मिट्टी कैफ़े’ नामक कैफ़ेटेरिया चलाती हैं, जिसे पूरी तरह से शारीरिक या मानसिक विकलांगता की अवस्था में जीवन गुज़ार रहे लोग चलाते हैं.

वो कहती हैं, "जब कोई व्यवसाय दयालुता में निवेश करता है, तो निवेश पर लाभ अधिक मिलता है." 

‘मिट्टी कैफ़े’ की शुरुआत वर्ष 2017 में ज़ीरो कैपिटल स्टार्ट-अप के रूप में हुई थी. कैफ़े के बुनियादी ढाँचे का लगभग 90 प्रतिशत दान से आया था - चम्मच, कप और प्लेट से लेकर सैकेण्ड हैण्ड अवन तक.

जैसे-जैसे परियोजना को गति मिली, अलीना आलम ने मिट्टी सोशल इनिशिएटिव फ़ाउण्डेशन शुरू कर दिया, जो विकलांग वयस्कों को प्रशिक्षित करके, उन्हें रोज़गार खोजने में मदद करता है.

कोविड-19 महामारी के दौरान, फ़ाउण्डेशन ने अपना करुणा भोजन अभियान शुरू किया, जो 20 लाख ज़रूरतमन्दों को भोजन मुहैया करवाने का एक प्रयास था.अलीना आलम कहती हैं, "यह विचार एक सेरिब्रल पॉलसी पीड़ित व्यक्ति से आया था. मिट्टी परिवार का हिस्सा बनने से पहले वो सड़क पर रहता था."

दयालुता न केवल सेतुओं का निर्माण कर रही है बल्कि लोगों में विश्वास भी पैदा कर रही है. दयालुता पर 2019 विश्व युवा सम्मेलन के #KindnessConcert में #KindnessAnthem (गीत) जारी करने वाले संगीतकार, रिकी केज कहते हैं, "हम उम्मीद करते हैं कि सरकारें, एनजीओ और कॉरपोरेशन बदलाव लाएंगे."

"सच्चाई यह है कि हमें अपने अन्दर झाँकने और अपने जीवन में लगातार बदलाव लाने की ज़रूरत है."

वो कहते हैं, "हमें यह जानने की ज़रूरत है कि उदारता के प्रत्येक छोटे कार्य के साथ हम एक बड़ा सकारात्मक प्रभाव पैदा करते हैं." यह गीत, चार महाद्वीपों के संगीतकारों ने मिलकर तैयार किया था.

भावी दिशा

अभियान को और आगे ले जाने की आशा रखने वाले संगठनों में 'विश्व दयालुता आन्दोलन' (WKM) भी शामिल है, जिसकी अध्यक्ष, निर्मला मेहेंडेल बताती हैं, "जब यूनेस्को ने उदारता को अपने लक्ष्य के रूप में रखा, तो मैं ख़ुशी से उछल पड़ी. यहाँ एक शक्तिशाली, वैश्विक संगठन था जो कहता है कि टिकाऊ विकास लक्ष्यों के लिये करुणा मायने रखती है. यह उस कार्य से बिल्कुल तालमेल खाता था, जो हम कर रहे थे." 

#KindnessMatters अभियान के हिस्से के रूप में, WKM ने 2021 के सम्मेलन में कार्यशालाओं का आयोजन किया और MGIEP के स्टोरीबोर्ड में उदारता की 20 हज़ार कहानियाँ जोड़ीं.

निर्मला मेहेंडेल कहती हैं, महामारी के बाद, दुनिया को एक ' kindemic' यानि ‘दयालुता की महामारी’ की ज़रूरत है.

दयालुता के पैरोकार, देबाशीष मोहन्ती भी इससे सहमत हैं. अभियान के स्टोरीबोर्ड पर प्रकाशित की गई ओडिशा के युवाओं की कहानी, कोविड-19 महामारी पर केन्द्रित है.

वे लिखते हैं, "इस महामारी में हमने हर सम्भव तरीक़े से लोगों की मदद करना शुरू कर दिया है. लोगों को भोजन उपलब्ध कराना और किराने का सामान, मास्क और सैनिटाइज़र वितरित करना. अच्छा कर्म स्वयं को शक्ति देता है और दूसरों को अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है."

विशेष रूप से महामारी के कारण हुई तालाबन्दी के दौरान, उदारता के कार्य देखने को मिले. यह ऐसा समय था जो अनकहे दुखों का गवाह बना. जैसे-जैसे ऑफ़लाइन और ऑनलाइन दुनिया एक साथ आई, सोशल मीडिया ने लोगों को स्वयंसेवी संगठनों तक पहुँचने, व्यक्तिगत मदद देने, या ज़रूरतमन्द लोगों तक भोजन, पीपीई किट और ज़रूरत के अन्य सामान पहुँचाने के लिये, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

सोशल मीडिया ने लोगों को जुड़े रहने और अकेले व समुदायों दोनों तरह, एक साथ काम करने में सक्षम बनाया, जिससे ऐसे समय में ज़रूरतमन्द लोगों की मदद हो, जब शारीरिक रूप से मिलना लगभग असम्भव था.

बड़ी संख्या में छात्र ऐसे लोगों तक पहुँचे, जो कोविड-19 महामारी से प्रभावित थे और रोज़गार छिनने व अन्य सम्बन्धित मुद्दों के कारण आर्थिक परेशानी का सामना कर रहे थे.

2020 में भारत में राष्ट्रीय तालाबन्दी से बहुत से दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों को कामकाज व भोजन से दूर कर दिया. ऐसे में, ग़रीबों को भोजन खिलाने के लिये समर्पित एक समूह की पहल, ‘रोटी (ब्रैड) बैंक’ के सहयोग से, दिल्ली के मॉडर्न पब्लिक स्कूल ने वंचित क्षेत्रों में परिवारों को खाना खिलाने के लिये 'रोटी बैंक्स ऑन व्हील्स' की शुरुआत की.

इस बस के ज़रिये उन नागरिकों से भोजन के पैकेट एकत्र किये गए, जिन्होंने स्वेच्छा से योगदान दिया था और उन्हें ज़रूरतमन्द लोगों तक पहुँचाया. रोटी भारतीय लोगों का प्रमुख भोजन है.

UNESCO MGIEP के निदेशक, अनन्त के दुरईअप्पा कहते हैं कि योगदान, सहायता, समर्थन और अपनेपन की आवश्यकता, मनुष्य की एक मौलिक प्रवृत्ति है, जो स्वाभाविक रूप से दयालु होते हैं. उन्होंने Kindness Matters पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है, "सोचें, सहानुभूति दें, दयालु बनें." 

पिछले साल की सफलता के आधार पर, 2022 का लक्ष्य है, करुणा के 50 लाख कार्यों को दर्ज करना और दयालुता पर चौथा विश्व युवा सम्मेलन आयोजित करना.

एक छोटा क़दम, वास्तव में, एक आन्दोलन का रूप ले सकता है, और उसी तरह, एक ख़ुशहाल दुनिया की ओर ले जा सकता है. जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था: "एक सौम्य तरीक़े से, आप दुनिया में बदलाव ला सकते हैं."

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