भारत के 'टीकाकरण चैम्पियन' - सभी बाधाओं का डटकर किया मुक़ाबला

भारत ने जनवरी 2021 में कोविड-19 के विरुद्ध दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू किया और देश अपनी कुल आबादी के 61.3 प्रतिशत लोगों का पूर्ण टीकाकरण करने में सफल रहा है. यह विशाल प्रयास, देश भर में टीकाकरण अभियान से जुड़े स्वास्थ्यकर्मियों और स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं के योगदान से सम्भव हुआ.

अग्रिम मोर्चे पर डटे स्वास्थ्यकर्मियों की कोशिशों के परिणामस्वरूप, वैश्विक महामारी के दौरान, कोविड-19 टीकाकरण के साथ-साथ, गर्भवती महिलाओं और बच्चों का नियमित टीकाकरण भी सुनिश्चित किया गया.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने ‘विश्व प्रतिरक्षण सप्ताह’ (World Immunization Week) के अवसर पर, हर घर तक पहुँचने और हर एक बच्चे का टीकाकरण सुनिश्चित करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों और स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं का आभार प्रकट किया है. इनमें से कुछ स्वास्थ्यकर्मियों से मुलाक़ात...

मिलिये, डॉक्टर मुकेश मैदा से, जिन्होंने राजस्थान के एक दूरस्थ आदिवासी बहुल ज़िले बाँसवाड़ा के कोटड़ा गाँव तक पहुँचने के लिये, उफ़नती नदियों को पार करते हुए, दूर-दराज़ के द्वीपों तक जाने वाले सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों की एक टीम का नेतृत्व किया.

डॉक्टर मुकेश मैदा, भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान के बांसवाड़ा के रामगढ़ में, अपनी टीम के साथ नाव में सावर होकर, एक सुदूर गाँव में टीकाकरण सत्र आयोजित करने जा रहे हैं.
© UNICEF/Srishti Bhardwaj
डॉक्टर मुकेश मैदा, भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान के बांसवाड़ा के रामगढ़ में, अपनी टीम के साथ नाव में सावर होकर, एक सुदूर गाँव में टीकाकरण सत्र आयोजित करने जा रहे हैं.

बाँसवाड़ा क्षेत्र तक पहुँचना एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में, डॉक्टर मैदा की टीम ने उन लोगों तक टीकाकरण अभियान पहुँचाने का बीड़ा उठाया, जो जलभराव के कारण टीकाकरण केन्द्रों तक नहीं आ सकते थे.

यह एक आसान काम नहीं था क्योंकि टीम को टीकाकरण से जुड़ी गहरी झिझक और मिथकों से भी निपटना था.

डॉक्टर मैदा कहते हैं, “हम गाँव-गाँव, घर-घर गए और लोगों को कोविड-19 के सम्पर्क में आने के जोखिम और टीकाकरण के लाभ के बारे में बताया."

"हमने उन्हें बताया कि हमने भी कोविड-19 वैक्सीन की दोनों ख़ुराकें ले रखी हैं और वो पूरी तरह सुरक्षित हैं.”

पारम्परिक रीति-रिवाज़ों के ज़रिये समाधान 

झाबुआ के नरसिंह रुण्डा में एक बैठक के दौरान, आरकेएसके की स्वयंसेवक, कोविड-19 उपयुक्त व्यवहार (CAB) पर जागरूकता पैदा करने के लिये बच्चों के बातचीत करते हुए.
© UNICEF/Sujay Reddy
झाबुआ के नरसिंह रुण्डा में एक बैठक के दौरान, आरकेएसके की स्वयंसेवक, कोविड-19 उपयुक्त व्यवहार (CAB) पर जागरूकता पैदा करने के लिये बच्चों के बातचीत करते हुए.

सितम्बर 2021 में झाबुआ ज़िले का नरसिंहरुण्डा, सभी लोगों को कोविड-19 वैक्सीन की दोनों ख़ुराके देने वाला मध्य प्रदेश का पहला गाँव बना गया. यह स्वयंसेवकों के अथक प्रयासों से सम्भव हुआ, जिन्होंने निवासियों को पूर्ण टीकाकरण के लिये राज़ी करने और प्रोत्साहित करने के लिये कड़ी मेहनत की.

भारत सरकार के राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Adolescent Health Programme) के तहत, एक युवा स्वयंसेवक हर्षाली पुरोहित और उनकी टीम ने कोविड-19 टीकाकरण पर ग़लत सूचना को जड़ से ख़त्म करने और अपने गाँव में टीके की झिझक दूर करने के लिये कड़ी मेहनत की.

उन्होंने अपने गाँव में जानकारी के अभाव को दूर करने के लिये एक पारम्परिक रीति-रिवाज़ का नए ढँग से उपयोग करते हुए, समुदाय के सदस्यों को दिये जाने वाले शादी के निमंत्रण के तरीक़ों में थोड़ा फेरबदल किया. 

परम्परागत रूप से विवाह के शुभ समारोह के निमंत्रण के प्रतीक के रूप में, अतिथियों के दरवाज़े पर चावल और हल्दी का मिश्रण रखा जाता है. उनकी टीम ने इस मिश्रण को टीकाकरण के निमंत्रण के रूप में इस्तेमाल करते हुए, लोगों के द्वार पर रखकर उन्हें टीकाकरण के लिये बुलाया.

हर्षाली ने बताया, "हमें लोगों की समझ के अनुसार काम करना पड़ा. इससे लोग ख़ुश हुए और वे टीकाकरण के लिये आने के लिये तैयार हो गए".

कोल्ड चेन भण्डारण और वितरण प्रक्रिया 

उत्तरपूर्वी भारतीय राज्य नागालैंड के चुनलीखा गांव कोहिमा में, लेविनो थाप्रू,  एक नियमित टीकाकरण केन्द्र में बच्चे का वजन जाँच रहे हैं.
© UNICEF/Jamir
उत्तरपूर्वी भारतीय राज्य नागालैंड के चुनलीखा गांव कोहिमा में, लेविनो थाप्रू, एक नियमित टीकाकरण केन्द्र में बच्चे का वजन जाँच रहे हैं.

नागालैण्ड के रमणीय शहर कोहिमा में, लेविन चप्रू एक सहायक नर्स व दाई हैं जो गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिये नियमित टीकाकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. लेविन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चुनलिखा के तत्वावधान में, क्षेत्र के दूर-दराज़ कोनों में घर-घर जाकर शिशुओं का टीकाकरण करते हैं.

नई माताएँ ख़ासतौर पर उनकी बेहद आभारी हैं और उनके प्रयासों की सराहना करती हैं, क्योंकि वे अक्सर अपने बच्चों को टीका लगाने के लिये स्वास्थ्य केन्द्र नहीं जा पातीं.

राज्य में कोल्ड चेन भण्डारण और वितरण प्रक्रिया को काफ़ी मज़बूत बनाया गया है, जिससे स्वास्थ्यकर्मी अब आसानी से दूरदराज़ के इलाक़ों तक टीके ले जा सकते हैं.

नागरिकों के कल्याण के लिये नियमित टीकाकरण आवश्यक है, और लेविन व अन्य लोगों के प्रयास, इस मिशन में बहुत योगदान दे रहे हैं.

लेविन कहती हैं कि वैक्सीन ले जाने के लिये वाहक (carrier) उपलब्ध होने के कारण, मैं टीकों को दूर के गाँवों तक ले जा पाती हूँ और माताओं व उनके बच्चों का टीकाकरण कर सकती हूँ.

झिझक दूर करने की अनूठी रणनीति

उत्तरी कश्मीर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बोनियार के एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, तबस्सुम बशीर, दिसम्बर 2021 में कंपकपाती ठण्ड और बर्फ़बारी का सामना करते हुए, भारत के उत्तरी क्षेत्र, कश्मीर और लद्दाख के सुदूर बोनियार क्षेत्र में रहने वाले लोगों को टीका लगान
UNICEF/Nanda
उत्तरी कश्मीर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बोनियार के एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, तबस्सुम बशीर, दिसम्बर 2021 में कंपकपाती ठण्ड और बर्फ़बारी का सामना करते हुए, भारत के उत्तरी क्षेत्र, कश्मीर और लद्दाख के सुदूर बोनियार क्षेत्र में रहने वाले लोगों को टीका लगान

भारत के केन्द्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर के बारामूला ज़िले के उरी में स्थित, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (PHC) बोनियार, एक उबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाक़े के बीचों-बीच स्थित है.

तबस्सुम बशीर, एक युवा स्वयंसेवक हैं, जिन्होंने महामारी के दौरान अपनी चिकित्सा परीक्षा पूरी की, और ज़िले में कोविड-19 वैक्सीन का वितरण सुनिश्चित करने में बहुत योगदान दिया.

भारी बर्फ़बारी के दौरान, इन दूर-दराज़ के गाँवों में पैदल यात्रा करते हुए, तबस्सुम को अक्सर रात भर रुकना पड़ता था.

हालाँकि उनकी टीम को सभी आयु के लोगों से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर भी वो PHC बोनियार की लगभग पूरी वयस्क आबादी को कोविड का टीका लगवाने के लिये मनाने में कामयाब रहीं.

लोगों को टीकाकरण के लिये मनाने में मदद हेतु, गाँवों में इमामों जैसे धार्मिक नेताओं का साथ भी जुटाया गया.

महामारी के दौरान, महिलाओं और बच्चों के लिये, समय पर नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिये, टीम ने स्वास्थ्य और कल्याण केन्द्रों के साथ बड़े पैमाने पर मिलकर काम किया.

तबस्सुम बताती हैं, "हमने रणनैतिक रूप से गाँवों के शिक्षित परिवारों को अपनी बात समझाई, ताकि वे बाकी लोगों को मना सकें."

नवाली कुमाती ग्रासिया के साथ हुजी बाई. नवाली कुमारी पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान में, लोक संगीत और रंगमंच के ज़रिये, आदिवासी क्षेत्रों और अपने समुदाय के बीच कोविड-19 टीकाकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं.
© UNICEF/UN0618026
नवाली कुमाती ग्रासिया के साथ हुजी बाई. नवाली कुमारी पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान में, लोक संगीत और रंगमंच के ज़रिये, आदिवासी क्षेत्रों और अपने समुदाय के बीच कोविड-19 टीकाकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं.

नृत्य व संगीत का सहारा

राजस्थान के सिरोही ज़िले में, गरासिया नामक एक आदिवासी समुदाय है, जो अपने रंगबिरंगे कपड़ों, रिश्तों के प्रति ग़ैर-परम्परागत दृष्टिकोण और वयस्क होने तक अपने शरीर को न छेदने में विश्वास की परम्परा के कारण जाना जाता है.

मतलब यह कि समुदाय में सुईं (syringe) का डर बैठ गया है, जिससे गर्भवती महिलाओं और शिशुओं की टीकाकरण दर पर असर पड़ा.

चूँकि यह इलाक़ा पहाड़ी और जंगली है, इसलिये गरासिया आधुनिक दुनिया से कटे हुए हैं. जब टीका अभियान शुरू हुआ, तो इस समुदाय के घरों तक पहुँचने में एक घण्टे का समय लगता था, और यह जानने का कोई तरीक़ा ही नहीं था कि घर पर कोई मिलेगा भी या नहीं. ख़ुराक़ें बर्बाद हो रही थीं, और टीकाकरण को लेकर झिझक चारों ओर फैली थी.

टीकाकरण हेतु इन सामाजिक और भौगोलिक बाधाओं से निपटने के लिये, नवली घरासिया ने समुदाय को टीकाकरण के लिये मनाने के इरादे से, नृत्य और संगीत जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग करने का फ़ैसला किया.

अपने रंगीन घाघरे में, टीकों के बारे में लोक गीतों पर नाचते हुए, नवली ने समुदाय की कई महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने में सफलता पाई, जिन्होंने फिर उनसे टीकाकरण के लिये सम्पर्क स्थापित करना शुरू कर दिया. इसके बाद, उनके परिवार भी टीकाकरण के लिये आगे आने लगे.

नवली कहती हैं, "मुझे पता है कि जागरूक होना कितना महत्वपूर्ण है, ख़ासतौर पर लड़कियों और महिलाओं के लिये.”

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ. 

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