बुज़ुर्गों की तुलना में, युवजन में ज़्यादा नज़र आती है 21वीं सदी की भावना

एक पीढ़ीगत सर्वेक्षण में सामने आया है कि कोविड-19 महामारी, जलवायु परिवर्तन और अन्य वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, उम्र दराज़ लोगों की तुलना में, ऐसे बच्चों और युवाओं की संख्या 50 प्रतिशत ज़्यादा है जो आज भी मानते हैं कि दुनिया एक बेहतर जगह बन रही है. इस महत्वपूर्ण सर्वेक्षण के नतीजे गुरूवार को प्रकाशित हुए हैं.

ये सर्वेक्षण संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ और वैश्विक विश्लेषण व परामर्शकारी संस्था गैलप (Gallup) ने संयुक्त रूप से कराया है और इसके नतीजे, 20 नवम्बर को मनाए जाने वाले विश्व बाल दिवस के अवसर पर जारी किये गए हैं.

बदलता बचपन परियोजना, अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण है और इसमें अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों से दुनिया की स्थिति व आज के दौर में एक बचपन होने का क्या अर्थ है, विषयों पर उनकी राय पूछी गई.

समाधान का हिस्सा

यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशक हैनरीएटा फ़ोर का कहना है कि निराशावादी महसूस करने के बहुत से कारण मौजूद होने के बावजूद, बच्चे और युवजन - वयस्कों और उम्रदराज़ लोगों के संकीर्ण चश्मे से इस दुनिया को नहीं देखना चाहते. 

उन्होंने कहा, “दुनिया की बुज़ुर्ग पीढ़ी की तुलना में, युवजन में आशावादी रुख़ देखा गया है, युवजन का नज़रिया ज़्यादा वैश्विक है, और वो दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने के लिये दृढ़संकल्प हैं.”

“आज के युवजन में भविष्य को लेकर दिलचस्पी और चिन्ताएँ हैं मगर वो ख़ुद को समाधान के एक हिस्से के रूप में देखते हैं.”

इस सर्वेक्षण में, 21 देशों में 21 हज़ार से भी ज़्यादा लोगों ने शिरकत की, जो दो आयु वर्गों के लोगों में आयोजित किया गया – 15 से 24 वर्ष के युवजन में और 40 वर्ष से ज़्यादा उम्र के लोगों में. ये भी अहम है कि ये सर्वेक्षण कोविड-19 महामारी के दौरान कराया गया.

आशान्वित, नासमझ नहीं

राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व की नब्ज़ देने वाले सर्वेक्षण, सभी क्षेत्रों – अफ़्रीका, एशिया, योरोप, और उत्तर व दक्षिण अमेरिका के देशों में – और आमदनी के सभी स्तरों पर कराए गए.

सर्वेक्षण के नतीजों में नज़र आता है कि युवजन के, ये मानने की ज़्यादा सम्भावना है कि बचपन बेहतर हुआ है, और ये भी कि अगर उनके बुज़ुर्गों की पीढ़ी के समय की तुलना में देखा जाए तो, आज के समय में, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और शारीरिक सुरक्षा बेहतर हैं. 

मगर, इस आशावाद के बावजूद, युवजन नासमझ या अनाड़ी नज़र नहीं आते हैं. 

सर्वेक्षण के लिये हुए मतदान के नतीजे दिखाते हैं कि युवजन चाहते हैं कि जलवायु आपदा का सामना करने के लिये कार्रवाई की जाए. 

इसके साथ ही वो, सोशल मीडिया मंचों के ज़रिये मिलने वाली सूचनाओं और जानकारी के बारे में भी सशंकित हैं, और अवसाद व निन्ता की भावनाओं से भी जूझते हैं.

ये पीढ़ी, ख़ुद को वैश्विक नागरिकों के रूप में ज़्यादा देखती है, और ये पीढ़ी महामारी जैसी चुनौतियों व जोखिमों का सामना करने में, अन्तरराष्ट्रीय सहयोग को अपनाने के लिये ज़्यादा इच्छुक नज़र आती है.

जोखिमों से अवगत हैं 

कॉप26 सम्मेलन के दौरान, युवा जलवायु कार्यकर्ता, ग्लासगो की सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए.
UN News/Laura Quinones
कॉप26 सम्मेलन के दौरान, युवा जलवायु कार्यकर्ता, ग्लासगो की सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए.

इस सर्वेक्षण ये भी सामने आया है कि बच्चे और युवजन, सटीक सूचनाओं व जानकारी के स्रोत के रूप में, देशों की सरकारों, वैज्ञानिकों और अन्तरराष्ट्रीय समाचार मीडिया पर ज़्यादा भरोसा करते हैं.

वो आज के दौर में, दुनिया के सामने दरपेश समस्याओं से भी अवगत हैं. 

सर्वेक्षण में शिरकत करने वालों में से 80 प्रतिशत प्रतिभागियों की नज़र में, बच्चों के लिये ऑनलाइन मंचों के ज़रिये गम्भीर ख़तरा मौजूद है. इनमें हिंसक या यौन गतिविधियों से सम्बन्धित सामग्री, या फिर उन्हें डराने-धमकाने व उनका हौसला तोड़ने और उन्हें नीचा दिखाने की गतिविधियाँ भी शामिल हैं.

युवजन, भेदभाव के ख़िलाफ़ लड़ाई में त्वरित प्रगति, देशों के दरम्यान निकट सहयोग, और निर्णय लेने वाली हस्तियों द्वारा उनकी राय को अहमियत देने में बढ़ोत्तरी होते देखना चाहते हैं.

21 वीं सदी के नागरिक

आमतौर पर हर देश में ही, ज़्यादातर युवाओं ने कहा कि सरकारें, अगर ख़ुद के बजाय, अन्य सरकारों एक साथ मिलकर काम करें तो, उनके देश कोविड-19 से सुरक्षित होंगे.

युवाओं की बड़ी संख्या ने, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के अधिकारों के प्रति भी ज़्यादा समर्थन व्यक्त किया है, जिनमें विशेष रूप से, युवा महिलाएँ, समानता के लिये ज़्यादा मुखर आवाज़ बुलन्द कर रही हैं.

सर्वेक्षण में, दो पीढ़ियों के दरम्यान, जलवायु, शिक्षा, वैश्विक सहयोग जैसे मुद्दों पर, मज़बूत एकरूपता भी सामने आई है, मगर आशावाद, वैश्विक परिप्रेक्ष्य और ऐतिहासिक प्रगति को पहचान देने के मुद्दों पर, गहन विभाजन भी नज़र आते हैं.

यूनीसेफ़ प्रमुख हैनरीएटा फ़ोर का कहना है कि वैसे तो ये सर्वेक्षण पीढ़ीगत विभाजन का एक औसत विभाजन दर्शाता है, मगर एक स्पष्ट तस्वीर भी उभरती है: बच्चों और युवजन में, अपने माता-पिता वाली पीढ़ी की तुलना में, 21वीं सदी की भावना ज़्यादा आसानी से नज़र आती है.  

उन्होंने कहा, “ऐसे में, जबकि यूनीसेफ़ दिसम्बर में अपनी 75वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारी कर रहा है और विश्व बाल दिवस के मौक़े पर भी, ये बहुत अहम व ज़रूरी है कि हम युवजन की बात सीधे रूप में सुनें – उनके रहन-सहन और चौतरफ़ा स्वास्थ्य के बारे में, और इस बारे में भी उनकी ज़िन्दगियाँ किस तरह बदल रही हैं.”

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