बालू है पर्यावरण के लिये अहम, नई UNEP रिपोर्ट में बुद्धिमतापूर्ण इस्तेमाल पर बल

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई रिपोर्ट में, बुनियादी ढाँचे, आर्थिक विकास और पर्यावरण सेवाओं के लिये महत्वपूर्ण, रेत (sand) की एक रणनैतिक संसाधन के रूप में पहचान किये जाने और उसके बुद्धिमतापूर्ण प्रबन्धन की आवश्यकता पर बल दिया गया है. रेत या बालू, विश्व में जल के बाद सबसे अधिक दोहन किये जाने वाले संसाधनों की सूची में दूसरे स्थान पर है.

हर वर्ष, 50 अरब टन बालू और बजरी का इस्तेमाल किया जाता है, जोकि पृथ्वी के इर्दगिर्द 27 मीटर चौड़ी और 27 मीटर ऊँची दीवार बनाने के लिये पर्याप्त है. 

दुनिया में जितनी तेज़ी से रेत का इस्तेमाल किया जा रहा है, उस रफ़्तार से यह प्राकृतिक संसाधन फिर से नहीं पनप पा रहा है, जिसके मद्देनज़र इसका ज़िम्मेदार ढँग से प्रबन्धन आवश्यक है.

सोमवार को जारी की गई ‘Sand and Sustainability: 10 strategic recommendations to avert a crisis’, शीर्षक वाली रिपोर्ट में बालू के निष्कर्षण (extraction) और प्रबन्धन के बेहतर तौर-तरीक़ों को अपनाये जाने के सम्बन्ध में विशेषज्ञों के दिशानिर्देशों को साझा किया गया है. 

नदियों, तटीय व समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों में रेत की अहम भूमिका है और इसके अत्यधिक निष्कर्षण से भूमि क्षरण और धरातल की सतह के नीचे एकत्र व चट्टानों में से प्रवाहित जल (aquifers) का खारापन बढ़ सकता है.

साथ ही, तूफ़ानों से होने वाली रक्षा और जैवविविधता पर भी असर होता है, जिससे आजीविकाओं के लिये जोखिम उत्पन्न होता है और जल आपूर्ति, खाद्य उत्पादन, मत्स्य पालन और पर्यटन उद्योग के लिये चुनौती पनपती है.  

रिपोर्ट के लिये कार्यक्रम समन्वयक की भूमिका निभाने वाले और यूएन पर्यावरण एजेंसी में निदेशक पास्कल पेडुज़्ज़ी ने बताया कि टिकाऊ विकास हासिल करने के लिये, उत्पादन, निर्माण व खपत के तौर-तरीक़ों में बदलाव लाये जाने की आवश्यकता है.

“हमारे बालू संसाधन अनन्त नहीं है और हमें उन्हें बुद्धिमता से इस्तेमाल में लाना होगा. अगर हम विश्व में सर्वाधिक निष्कर्षित ठोस सामग्री का समुचित प्रबन्धन कर सके, तो हम एक संकट को टाल सकते हैं और एक चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.”

रणनैतिक संसाधन

रेत, आर्थिक विकास के लिये एक बेहद महत्वपूर्ण संसाधन है – घरों, सड़कों अस्पतालों समेत अन्य अहम बुनियादी ढाँचों को बनाने में इसकी आवश्यकता होती है.

यह वनस्पति व जीवों के पनपने के लिये पर्यावास प्रदान करती है और जैवविविधता को पोषित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है. 

टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल करने और पृथ्वी पर मंडराते तिहरे संकटों – जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैवविविधता हानि – से निपटने के लिये रेत को ज़रूरी माना गया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि बालू को एक रणनैतिक संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिये, ना कि सिर्फ़ निर्माण सामग्री के तौर पर. पर्यावरण में इसकी विविध भूमिकाएँ हैं.

उनके मुताबिक़, सरकारों, उद्योगों और उपभोक्ताओं को रेत की क़ीमत एक ऐसे रूप में तय करनी होगी, जिसमें इसके वास्तविक सामाजिक व पर्यावरण मूल्य की पहचान हो सके. 

उदाहरणस्वरूप, बालू की तटीय इलाक़ों में मौजूदगी बनाये रखना, कम लागत में एक बेहद प्रभावी जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीति हो सकती है.

मुख्य सिफ़ारिशें

इसके ज़रिये, उफ़तने तूफ़ानों से और समुद्री जलस्तर में वृद्धि के प्रभावों से बचाव किया जा सकता है, और इसलिये इन सेवाओं को भी बालू के मूल्य में शामिल किये जाने पर ज़ोर दिया गया है.

रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि समुद्री पर्यावरण से बालू निष्कर्षण के तरीक़ों पर एक अन्तरराष्ट्रीय मानक विकसित किये जाने की आवश्यकता है.

समुद्री तटों से रेत के निष्कर्षण पर पाबन्दी लगाये जाने की भी सिफ़ारिश की गई है, और तटीय सहनक्षमता, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में इसे महत्वपूर्ण माना गया है.

विशेषज्ञों ने कहा है कि रेत के कागर प्रबन्धन के लिये संस्थागत व क़ानूनी ढाँचों की ज़रूरत है और सर्वोत्तम उपायों को साझा व लागू किया जाना होगा. 

इसके लिये बालू संसाधनों का मापन, निगरानी व उनसे सम्बन्धित जानकारी प्रदान की जानी ज़रूरी है. 

बालू प्रबन्धन से जुड़े निर्णयों में सभी पक्षकारों को शामिल किया जाना होगा, ताकि सन्दर्भ व आवश्यकताओं के अनुरूप तौर-तरीक़ों को अपनाया जा सके.

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