बढ़ता पारा और गम्भीर ताप लहरें – भावी संकट का संकेत!

इस वर्ष जून महीने में गर्मियों के दौरान चरम मौसम की घटनाओं और बढ़ती ताप लहरों ने, जलवायु परिवर्तन की विकराल होती चुनौती के प्रति एक नई चेतावनी जारी की है. 

यह कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में जून एक ख़राब महीना था. अमेरिका के पोर्टलैण्ड शहर में सार्वजनिक परिवहन (Street cars) को संचालित करने वाली बिजली की तारें पिघल गईं. 

न्यूयॉर्क में स्थानीय निवासियों से कपड़े धोने की मशीनों या एयर कण्डीशनर जैसे उपकरण इस्तेमाल नहीं करने के लिये कहा गया ताकि पावर ग्रिड की रक्षा की जा सके. 

कैनेडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रान्त में एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक़ जून महीने में, पाँच दिनों की अवधि के दौरान अचानक और अनपेक्षित मौतों के कम से कम 486 मामले दर्ज किये गए. 

आमतौर पर पाँच दिनों में हुई मौतों की संख्या 165 होती है. 

कैनेडा के इसी प्रान्त के लिटन नामक एक गाँव में देश का अब तक का सबसे गर्म दिन दर्ज किया गया, जब एक दिन का तापमान 49.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया जो कि पिछले रिकॉर्ड 45 डिग्री से कहीं अधिक है.

यही वो सप्ताह था जब जंगलों में फैली आग के कारण लिटन पूरी तरह बर्बाद होने से किसी तरह बच पाया.  

साइबेरिया के वर्कहोयन्स्क में एक मौसम निगरानी केन्द्र में 38 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया. तापमान सम्बन्धी आँकड़ों की शुरुआत किये जाने के बाद यह पहली बार है जब आर्कटिक क्षेत्र में इतना ज़्यादा तापमान देखा गया है. 

वहीं इराक़ की राजधानी बग़दाद में पारा 50 डिग्री सेल्सियस के स्तर को छू गया, जिसके कारण सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पड़ा – विद्युत प्रणाली ध्वस्त हो गई थी और इन हालात में कामकाज जारी रख पाना मुश्किल था. 

जून 2021 में दुनिया भर में अनेक ताप लहरें देखी गईं और कैनेडा व अमेरिका के प्रशान्त पश्चिमोत्तर क्षेत्र में हालात की तरह, उनमें से कुछ अभूतपूर्व थीं.

चरम मौसम की बढ़ती घटनाएँ 

दुर्भाग्यवश, यह पहली बार नहीं है जब गर्मी के दौरान चरम मौसम की ये घटनाएँ सामने आई हैं – वर्ष 2019 में पश्चिमी योरोप के ताप लहर की चपेट में आने से लगभग ढाई हज़ार लोगों की मौत हुई थी.  

तो क्या ये मौसमी घटनाएँ जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं?

ग्लेशियर (हिमनद) की एक प्रतीकात्मक तस्वीर
UN Photo/Eskinder Debebe
ग्लेशियर (हिमनद) की एक प्रतीकात्मक तस्वीर

World Weather Attribution नामक एक पहल में शामिल वैज्ञानिकों के एक समूह ने हाल में देखी गईं ताप लहरों पर एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने इस सम्बन्ध को माना है. 

उन्होंने 21 जलवायु मॉडलों का इस्तेमाल करके अनुमान लगाया है कि सियेटल, पोर्टलैण्ड और वैन्कूवर में जून महीने में दर्ज चरम तापमान को, जलवायु परिवर्तन ने किस हद तक प्रभावित किया है. 

नीदरलैण्ड्स के मौसम विज्ञान संस्थान में विशेषज्ञ और रिपोर्ट के सह-लेखक स्जाउके फ़िलिप ने बताया कि रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि एक हज़ार साल में एक बार होने वाली घटना [प्रशान्त पश्चिमोत्तर में ताप लहर] अतीत में 150 गुना अधिक दुर्लभ रही होती. 

रिपोर्ट के मुताबिक़ हाल के दिनों में देखी गईं ताप लहरें, वर्ष 2040 तक एक दशक में एक बार सामने आने वाली चरम मौसम की घटनाएँ बन जाने का अनुमान है.

रिपोर्ट की सह-लेखक व ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी में डॉक्टर फ्रेडरिके ओट्टो ने इस महीने रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि उनके मॉडल व पर्यवेक्षण दर्शाते हैं कि वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की अतिरिक्त मात्रा के बग़ैर, ऐसी घटनाएँ सम्भव नहीं हैं. 

“और अगर ऐसा होता है तो यह दस लाख बार में एक बार ही होता है, जो सांख्यिकीय अर्थों में, कभी नहीं होने के बराबर है.” 

इस अध्ययन की अभी अन्य वैज्ञानिकों ने समीक्षा नहीं की है, मगर इसके लिये उन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है जिनकी समीक्षा की जा चुकी है. 

साध ही कम्पयूटर सिम्युलेशन के ज़रिये कार्बन उत्सर्जन के बग़ैर हालात और वास्तविक दुनिया में परिस्थितियों की तुलना की गई.  

भावी चुनौतियाँ

बुरी ख़बर यह है कि अगर वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होती है, तो पिछले महीने जिन घटनाओं का अनुभव किया गया, वे उतनी दुर्लभ नहीं रह पाएंगी. 

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि किसी एक साल में इतनी गम्भीर ताप लहरों के आने की सम्भावना, 20 फ़ीसदी तक बढ़ जाने का अनुमान है. 

डॉक्टर ओट्टो के मुताबिक़ ताप लहरों के लिये, जलवायु परिवर्तन, हालात को पूरी तरह बदलने वाला है. 

इसकी एक कठोर वास्तविकता है. 

ताप लहरों से ना केवल मानव स्वास्थ्य पर भीषण असर होता है, बल्कि सूखे की समस्या और ज़्यादा गम्भीर हो जाती है, ओज़ोन का स्तर बढ़ता है, बिजली की खपत ज़्यादा होती है और कार्बन उत्सर्जन का स्तर बढ़ता है. 

बढ़ते तापमान की वजह से दुनिया के कुछ हिस्सों में लोगों के लिये रह पाना कठिन हो जाने की आशंका है, विशेष रूप से साल के बेहद गर्म दिनों के दौरान.     

ये सभी अनुमान व निष्कर्ष, कार्बन उत्सर्जनों में तेज़ी से कटौती किये जाने की अहमियत को रेखांकित करते हैं

अगर ऐसा नहीं हुआ तो विश्व के अनेक हिस्सों में देखी गई ताप लहरें, पहले से कहीं ज़्यादा गम्भीर होगी और उनकी आवृत्ति भी बढ़ जाएगी. 

मोज़ाम्बीक़ के बेइरा इलाक़े में इडाई तूफ़ान द्वारा हुई तबाही. (25 जून 2019)
UN Photo/Eskinder Debebe
मोज़ाम्बीक़ के बेइरा इलाक़े में इडाई तूफ़ान द्वारा हुई तबाही. (25 जून 2019)

तो इन बढ़ती ताप लहरों से निपटने के लिये कौन से क़दम उठाए जा सकते हैं? 

कार्बन उत्सर्जन घटाने और ताप लहरों के असर को कम करने के लिये जलवायु कार्रवाई से इतर, सामुदायिक व घरेलू स्तर पर अनेक उपाय किये जा सकते हैं.

आप अपने स्थानीय निकायों को निम्नलिखित सुझाव प्रदान कर सकते हैं: 

- शीतलन केन्द्रों के लिये प्रावधान (अगर पहले से ऐसी व्यवस्था ना हो),

- हरित स्थलों की सतह में इज़ाफ़ा किया जाए और पार्कों में ताप से निपटने की बेहतर व्यवस्था हो,

- शहरी योजनाओं में जल के इस्तेमाल के ज़रिये ताप को सोखने की क्षमता विकसित की जाए (उदाहरणस्वरूप, फ़व्वारा, कृत्रिम झील, जल छिड़काव, सड़कों पर छिड़काव, सिंचाई नहर इत्यादि),

- बदली जलवायु को ध्यान में रखते हुए पारिस्थतिकी तंत्रों की बहाली और संरक्षण परियोजनाओं को समर्थन दिया जाए,

- हरित छतों या छतों पर सफ़ेद पेण्ट किये जाने को प्रोत्साहन दिया जाए,

- ताप लहर के दौरान व्यवसायों व दुकानों में कामकाजी घण्टों को बदलने की अनुमति दी जाए ताकि गर्मी के दौरान लोगों को बाहर ना निकलना पड़े,

- सार्वजनिक तरणतालों के खुले रहने के घण्टों की अवधि बढ़ाई जाए,

- सार्वजनिक परिवहन को सस्ता बनाया जाए या ताप लहर के दौरान कारों के इस्तेमाल को रोकने के लिये यह व्यवस्था निशुल्क की जाए.   

निजी बचाव के लिये ये उपाय भी सम्भव हैं:

- ठण्डे पानी से नहाना,

- ग़ैरज़रूरी होने पर इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल से परहेज़ करना ,

- परदों या शटर के ज़रिये सूरज की तेज़ रौशनी और तापमान से बचना ,

- दिन के बेहद गर्म घण्टों के दौरान बाहर जाने से बचना,

- घर से बाहर शारीरिक गतिविधियों से बचना,

- आवश्यक मात्रा में पानी पीना,

- ढीले-ढाले कपड़े पहनना,

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ. 

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