फ़लस्तीनी इलाक़ों में इसराइली यहूदी बस्तियों को युद्धापराध क़रार देने का आहवान

इसराइल द्वारा 1967 से क़ब्ज़ा किये हुए फ़लस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकार स्थिति के लिये संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर माइकल लिन्क ने अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से, फ़लस्तीनी इलाक़ों में बसाई जा रही इसराइली यहूदी बस्तियों को, अन्तरारष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की रोम संविधि के तहत युद्धापराध क़रार देने की पुकार लगाई है.

माइकल लिन्क ने शुक्रवार को कहा कि इसराइल द्वारा फ़लस्तीनी क्षेत्रों में बसाई जा रही यहूदी बस्तियाँ, इन निषेधात्मक व्यवस्थाओं का खुला उल्लंघन करती हैं कि कोई क़ाबिज़ ताक़त या पक्ष अपनी नागरिक आबादी के किसी हिस्से को, अपने क़ब्ज़े वाले इलाक़े में बसाने के लिये स्थानान्तरित नहीं कर सकता. अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने इस चलन को, 1998 में रोम संविधि पारित करते समय, युद्धापराध क़रार दिया था.  

माइकल लिन्क ने जिनीवा में मानवाधिकार परिषद को बताया, “इसराइल के लिये ये यहूदी बस्तियाँ दोहरे इरादे पूरी करती हैं. इससे एक ये गारंटी मिलती है कि क़ाबिज़ इलाक़ों पर अनन्त काल तक इसराइल का नियंत्रण क़ायम रहेगा. दूसरा मक़सद ये सुनिश्चित करने के लिये है कि कभी एक वास्तविक फ़लस्तीनी देश बन ही ना सके.”

“बिल्कुल इसी तरह के कारणों से, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने, 1949 में चौथा जिनीवा कन्वेन्शन और 1998 में रोम संविधि बनाते समय, क़ाबिज़ ताक़त की आबादी को, उसके क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में बसाने को निषिद्ध ठहराने पर सहमति व्यक्त की थी.”

उन्होंने कहा कि इसराइली यहूदी बस्तियाँ, फ़लस्तीनी इलाक़ों पर इसराइल के 54 वर्षों से चले आ रहे क़ब्ज़े का इंजिन साबित हुई हैं. ध्यान रहे कि आधुनिक विश्व में ये सबसे लम्बी अवधि तक चला क़ब्ज़ा है.

अधिकृत पश्चिमी येरूशेलम और पश्चिमी तट में अब लगभग 300 से भी ज़्यादा यहूदी बस्तियाँ हैं जिनमें लगभग 6 लाख 80 हज़ार इसराइली यहूदी बसते हैं.

माइकल लिन्क ने कहा कि इसराइली यहूदी बस्तियों की अवैधता, आधुनिक अन्तरराष्ट्रीय क़ानून और कूटनीति में सबसे ज़्यादा सहमत और निर्विवादित मुद्दा है.

इसराइली यहूदी बस्तियों की अवैधता संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, यूएन महासभा, मानवाधिकार परिषद, अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय, अन्तरराष्ट्रीय रैडक्रॉस कमेटी, चौथे जिनीवा कन्वेन्शन को स्वीकार करने वाले पक्ष और अन्य अनेक अन्तरराष्ट्रीय मानविधिकर संगठन, इस मुद्दे की पुष्टि कर चुके हैं.

उन्होंने कहा, “ये एक दुखद विरोधाभास है कि इसराइली यहूदी बस्तियाँ अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत निषिद्ध हैं, फिर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय, अपने ही क़ानूनों को लागू करवाने में अनिच्छुक रहा है.”

विशेष रैपोर्टेयर ने अपनी रिपोर्ट में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से ये कार्रवाई योजना अपनाने का आहवान किया है:

1.    आईसीसी के अभियोजक कार्यालय को यह जाँच करने में पूरा सहयोग दिया जाए कि इसराइली यहूदी बस्तियाँ, क्या रोम  संविधि के प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं;

2.    इसराइल से, फ़लस्तीनी इलाक़ों में बसाई गईं अपनी यहूदी बस्तियाँ पूरी तरह हटाने के लिये कहा जाए;

3.    इसराइल अगर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को नज़रअन्दाज़ करना जारी रखे तो उसे अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का पालन करवाने के लिये व्यापक जवाबदेही उपाय तैयार किये जाएँ;

4.    इसराइल की जो राजनैतिक, सैन्य और प्रशासनिक हस्तियाँ, क़ब्ज़ा किये हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों में अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनों के गम्भीर उल्लंघन करने के लिये ज़िम्मेदार रही हैं, उनकी पूर्ण जवाबदेही निर्धारित की जाए; और

5.    संयुक्त राष्ट्र के तमाम सदस्य देशों से सुरक्षा परिषद द्वारा 1980 में, प्रस्ताव 465 के तहत दिये गए उस आदेश को लागू करने की पुकार लगाई जाए जिसमें इसराइल को ऐसी कोई मदद नहीं दी जाएगी जिसका इस्तेमाल फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियाँ बसाने में किया जा सके.

माइकल लिन्क ने कहा, “इसराइल की आलोचना भर करने का समय गुज़र चुका है. पूर्व यूएन महासचिव बान की मून ने पिछले सप्ताह ही कहा था कि किसी अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी जवाबदेही के अभाव में, इसराइल संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लगातार नज़रअन्दाज़ करता रहा है.”

“अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की बुनियाद पर बिल्कुल नया तरीक़ा अपनाया जाना ही, इस अन्तहीन क़ब्ज़े को ख़त्म करने का एक मात्र रास्ता है.”

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