पारम्परिक चिकित्सा के लिये वैश्विक केंद्र - कारगर उपचार सुलभता का लक्ष्य

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने भरोसा जताया है कि पारम्परिक औषधि के लिये WHO वैश्विक केन्द्र की स्थापना के ज़रिये, पारम्परिक चिकित्सा के लिये तथ्यात्मक आधार को मज़बूती प्रदान करने में मदद मिलेगी और सर्वजन के लिये सुरक्षित व कारगर उपचार सुनिश्चित किया जा सकेगा.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के शीर्ष अधिकारी ने भारत के गुजरात प्रदेश के जामनगर शहर में मंगलवार को इस केन्द्र की आधारशिला रखे जाने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार ने आधुनिक विज्ञान एवं टैक्नॉलॉजी के ज़रिये, पारम्परिक औषधि में निहित सम्भावनाओं को साकार करने के इरादे से एक वैश्विक केन्द्र स्थापित किये जाने के समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं. 

एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 80 फ़ीसदी आबादी, पारम्परिक औषधि व चिकित्सा पद्धति का इस्तेमाल करती है. 

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी प्रमुख ने इस “महत्वपूर्ण पहल” को समर्थन देने और औषधि केन्द्र की स्थापना के लिये 25 करोड़ डॉलर का निवेश करने के लिये भारत सरकार की सराहना की. 

महानिदेशक घेबरेयेसस ने कहा कि यह वास्तव में एक वैश्विक परियोजना है. “WHO के 107 सदस्य देशों में पारम्परिक व पूरक औषधि के लिये राष्ट्रीय सरकारी कार्यालय हैं.”

“विश्व भर में लाखों लोगों के लिये, पारम्परिक चिकित्सा, अनेक बीमारियों के इलाज के लिये पहला उपाय है.”

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस अवसर पर कहा कि एक ऐसे काल में जब पारम्परिक औषधि की लोकप्रियता बढ़ रही है, इस केन्द्र के ज़रिये पारम्परिक व आधुनिक चिकित्सा को जोड़ने और एक स्वस्थ पृथ्वी की दिशा में आगे बढ़ने के प्रयासों में मदद मिलेगी. 

यूएन एजेंसी प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि पारम्परिक औषधि को आधुनिक दवाओं में बदले जाने के उदाहरण विश्व भर में मिलते हैं.

भारत में हल्दी, नीम और जामुन जैसे उत्पादों के इस्तेमाल, ब्राज़ील और कालाहारी मरुस्थल में आदिवासी समुदायों तक.

पारम्परिक चिकित्सा पद्धति

पारम्परिक औषधि व चिकित्सा से तात्पर्य आदिवासी समुदायों व अन्य संस्कृतियों द्वारा सहेजे गए ज्ञान, कौशल व प्रथाओं के उन भण्डार से है, जिनका उपयोग तन्दरुस्ती बनाए रखने और शारीरिक व मानसिक बीमारी की रोकथाम, निदान व उपचार में किया जाता है.  

पारम्परिक औषधि के अन्तर्गत एक्यूपंचर, आयुर्वेदिक औषधि व जड़ी-बूटी के मिश्रण और आधुनिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है.

मगर, फ़िलहाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों और रणनीतियों में पारम्परिक औषधि के लाखों स्वास्थ्यकर्मियों, मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों, स्वास्थ्य केन्द्रों और स्वास्थ्य व्यय को एकीकृत नहीं किया गया है. 

जिस तरह से इन उत्पादों की पहचान, परीक्षण व उन्हें विकसित किया जाता है, या फिर उन्हें पोषित करने वाले समुदायों के साथ उनका लाभ साझा किया जाता है, उस प्रक्रिया को संवारा जाना अभी बाक़ी है.   

मौजूदा चुनौतियाँ

यूएन एजेंसी प्रमुख ने कहा कि पारम्परिक चिकित्सा को नियामन सम्बन्धी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें व्यवस्थागत डेटा व साक्ष्यों का अभाव, शोध के लिये अपर्याप्त वित्त पोषण और पारम्परिक तौर-तरीक़ों में सुरक्षा की निगरानी उपायों का अभाव है. 

उनके अनुसार “दुनिया भर में लोगों के लाभ के लिये, पारम्परिक औषधि के वादे को साकार करने में मदद के लिये आज एक महत्वपूर्ण क़दम उठाया गया है.”

बताया गया है कि नए वैश्विक केन्द्र के ज़रिये, WHO मुख्यालय, क्षेत्रीय व देशीय कार्यालयों में पारम्परिक औषधि पर कामकाज को मज़बूती दी जाएगी.

घाना की एक प्रयोगशाला में एक शोधकर्ता, पौधों से प्राप्त अर्क़ की जाँच करते हुए.
WHO/Ernest Ankomah
घाना की एक प्रयोगशाला में एक शोधकर्ता, पौधों से प्राप्त अर्क़ की जाँच करते हुए.

इस क्रम में, राष्ट्रीय नीतियों को समर्थन देने और स्वास्थ्य-कल्याण के लिये पारम्परिक औषधि के इस्तेमाल को बढ़ाने के इरादे से तथ्य, डेटा, सततता और नवाचार पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा. 

यूएन एजेंसी के मुताबिक़ आधुनिक विज्ञान जगत में पारम्परिक औषधि की अहमियत बढ़ रही है.

फ़िलहाल इस्तेमाल में लाए जा रहे 40 फ़ीसदी स्वीकृति प्राप्त औषधि उत्पाद, प्राकृतिक पदार्थों के ज़रिये तैयार किये जाते हैं, जिसमें जैवविविधता संरक्षण व सततता का महत्व भी रेखांकित होता है.

उदाहरणस्वरूप, ऐस्प्रिन की खोज के लिये पारम्परिक औषधि के एक ख़ास पेड़ की छाल जैसे नुस्ख़ों, गर्भनिरोधक गोली के लिये जंगली रतालू (yam) पौधे के तने, और बच्चों में कैंसर के उपचार के लिये एक प्रकार की गुलाबी वनस्पति का इस्तेमाल किया गया है.  

मलेरिया नियंत्रण के लिये artemisinin दवा पर नोबेल पुरस्कार विजेता शोध, प्राचीन चीनी औषधि सम्बन्धी ज्ञान की समीक्षा से ही शुरू किया गया.

पाँच अहम क्षेत्र

पारम्परिक औषधि के लिये वैश्विक केन्द्र के पाँच अहम कार्य क्षेत्र बताए गए हैं:

पहला: नेतृत्व एवं साझेदारी, जिसके अन्तर्गत पारम्परिक औषधि के लिये देशों की शोध प्राथमिकताओं को समर्थन देने के लिये वैश्विक नैटवर्क के साथ मिलकर काम किया जाएगा.

दूसरा: साक्ष्य एवं सीखना, जिसके लिये पारम्परिक औषधि ज्ञान में परीक्षणों और समग्र शोध तौर-तरीक़ों समेत अन्य उपायों से विस्तार किया जाना होगा.

तीसरा: डेटा एवं वैश्लेषिकी, जिसके ज़रिये पारम्परिक औषधि के इस्तेमाल के सम्बन्ध में विश्वसनीय डेटा प्राप्त करने में मदद मिलेगी.

चौथा: सततता एवं समता, जैवविविधता, सामाजिक-सांस्कृतिक संसाधनों, बौद्धिक सम्पदा व अन्य मुद्दों के लिये.

पाँचवा: नवाचार एवं टैक्नॉलॉजी, जिसमें आर्टिफ़िशियल इंटैलीजेंस परियोजना के तहत पेटेण्ट व शोध पर जानकारी जुटाने समेत अन्य प्रयास किये जाएंगे.

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