डिजिटल खाई को पाटते समय अवरोध-रूपी विषमताओं से निपटना ज़रूरी

विश्व भर में डिजिटल टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल अविश्वसनीय गति से बढ़ रहा है – मगर यह समतापूर्ण ढँग से नहीं हो रहा है. यूएन विकास कार्यक्रम में मुख्य डिजिटल अधिकारी रॉबर्ट ऑप्प ने अपने इस लेख में बताया है कि वंचित और निर्बल समुदायों को इण्टरनेट के दायरे में लाने और सार्वभौमिक जुड़ाव को सम्भव बनाने के लिये किन बातों का ख़याल रखा जाना होगा... 

विश्व की क़रीब 60 फ़ीसदी आबादी अब ऑनलाइन है, और इनमे से अधिकांश विकसित देशों में हैं. 

कम-विकसित देशों में, पाँच में से एक व्यक्ति ही इण्टरनेट का उपयोग कर पा रहे हैं. यह इसलिये भी महत्वपूर्ण है चूँकि शिक्षा, कामकाज और सामाजिक सेवाओं के लिये डिजिटल सुलभता पर निर्भरता बढ़ रही है.

इण्टरनेट के दायरे से बाहर रह जाना, मानव विकास के लिये एक बड़ा अवरोध बनता जा रहा है. भाग्यवश, ऐसे अनेक प्रकार के कार्यक्रम हैं जिनके ज़रिये इन विषमताओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है. 

निजी क्षेत्र में, गूगल कम्पनी की Next Billion Users  नामक एक पहल के तहत, पहली बार इण्टरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिये मदद मुहैया कराई जा रही है.

इसे सम्भव बनाने के लिये गूगल द्वारा शोध किया जाता है और आवश्यकता अनुरूप उत्पाद तैयार किये जाते हैं. 

ऐमेज़ोन (Amazon) की Kupier और स्पेस-एक्स (SpaceX) की Starlink परियोजना के अन्तर्गत, हज़ारों सैटेलाइट अन्तरिक्ष कक्षाओं में भेजे गए हैं ताकि दुनिया भर में इण्टरनेट से वंचित हिस्सों को दायरे में लाया जा सके. 

राष्ट्रीय सरकारें भी टैक्नॉलॉजी से जुड़ाव को बढ़ावा देने के लिये निवेश को प्राथमिकता दे रही हैं.  

डिजिटल भारत कार्यक्रम (Digital India programme) का उद्देश्य पूरे देश को ऑनलाइन पहुँच के दायरे में लाना है. साथ ही डिजिटल बैंकिंग, शासन व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सेवाएँ प्रदान की जा रही हैं.

विश्लेषकों का अनुमान है कि इसके ज़रिये भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में, वर्ष 2025 तक एक हज़ार अरब डॉलर की बढ़ोत्तरी की जा सकती है. 

इसके समानान्तर, ग्रामीण समुदायों में हाशिये पर रह रहे लोगों के लिये भी अवसर सृजित किये जा सकते हैं. 

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश डिजिटल तकनीक पर ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स की पहली बैठक में टिप्पणी करते हुए. (21 नवंबर 2019)।, यूएन फोटो/रिक बजोर्नस द्वारा
यूएन फोटो/रिक बजोर्नस द्वारा
यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश डिजिटल तकनीक पर ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स की पहली बैठक में टिप्पणी करते हुए. (21 नवंबर 2019)।, यूएन फोटो/रिक बजोर्नस द्वारा

यूएन एजेंसियों के प्रयास

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने वर्ष 2030 तक सार्वभौमिक जुड़ाव को सम्भव बनाने के लिये अपना समर्थन दिया है, जिसका ख़ाका डिजिटल सहयोग के लिये रोडमैप में पेश किया गया है. 

अन्तरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) और संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के नेतृत्व में ‘ब्रॉडबैण्ड आयोग’, एक दशक से भी ज़्यादा समय से सार्वभौमिक जुड़ाव (universal connectivity) को मूर्त रूप देने के लिये प्रयासरत है. 

हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष और यूएन दूरसंचार एजेंसी ने Giga Initiative नामक पहल पेश की है, जिसकी मदद से हर स्कूल को इण्टरनेट से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की नवाचार सेवा (Innovation Service) शरणार्थियों के लिये डिजिटल सुलभता को प्रोत्साहित करती है. 

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP), अनेक वर्षों से, दूरदराज़ के इलाक़ों और निर्बल समुदायों में डिजिटल सम्पर्क में मौजूद खाई को मापने के लिये संकेतक विकसित करने में जुटा है. 

हमें इस बात से प्रोत्साहन मिलना चाहिये कि इन व अन्य प्रयासों के परिणामस्वरूप, इण्टरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या का हर साल बढ़ना जारी है. 

वैसे तो हमें इन सफलताओं से प्रसन्न होना चाहिये, मगर हमें जुड़ाव की अपनी समझ से परे जाने की ज़रूरत है.  

किसी के पास इण्टरनेट की सुलभता है या नहीं, इसके बजाय, हमें ध्यानपूर्वक डिजिटल जगत में विषमताओं के पनपने और गहराने की वजहों को समझना होगा.   

विषमताओं से निपटना अहम

आइये, हम उन कुछ अवरोधों पर विचार करें, जो अब भी मौजूद हैं, वहाँ भी जहाँ बुनियादी कनेक्टिविटी है.

बांग्लादेश में लोग, नवाचार के लिये प्रोत्साहन (a2i) प्लैटफ़ॉर्म पर व्यापक दायरे वाली डिजिटल जानकारी हासिल कर सकते हैं.
a2i
बांग्लादेश में लोग, नवाचार के लिये प्रोत्साहन (a2i) प्लैटफ़ॉर्म पर व्यापक दायरे वाली डिजिटल जानकारी हासिल कर सकते हैं.

जो इलाक़े नैटवर्क कवरेज में आ गए हैं, वहाँ भी इन सुविधाओं का इस्तेमाल करने की क़ीमत, सामग्री की सुलभता और डिजिटल साक्षरता की कमी जैसे मुद्दों से डिजिटल खाई और भी गहरी हो सकती है. 

सरल शब्दों में कहें तो, अगर आपके पास डेटा ख़रीदने के लिये संसाधन नहीं हैं, तो ये बात मायने नहीं रखती कि आपके पास इण्टरनेट कवरेज है या नहीं. 

अगर सार्वजनिक सेवाएँ उन भाषाओं में नहीं हैं, जिन्हें आप समझ सकते हैं, तो ये बात मायने नहीं रखती कि आप ऑनलाइन हो सकते हैं. 

अगर आपको इण्टरनेट ब्राउज़र का इस्तेमाल करना नहीं आता, तो फिर आपके ऑनलाइन होने का कोई महत्व नहीं है. 

ये कुछ ऐसे वास्तविक अवरोध हैं जिनका सामना अनेक लोगों को करना पड़ रहा है. और इनमें सबसे ज़्यादा प्रभावित वे लोग हैं, जो पहले से ही समाज में हाशिये पर रह रहे हैं. 

मौजूदा विषमताओं को ऑनलाइन माध्यमों पर आगे फैलने से रोकने के लिये तत्काल उपाय किये जाने की आवश्यकता है.

हमें नागरिक समाज, निजी क्षेत्र और सरकारों के साथ मिल कर हमारे प्रयासों में समन्वय सुनिश्चित करना होगा. 

सरकारी साझीदारों के साथ मिलकर नीतियाँ विकसित करनी होंगी और उन कार्यक्रमों का दायरा बढ़ाना होगा जिनमें समावेशन को रफ़्तार प्रदान की जाए. 

हमें पीछे छूट गए लोगों के लिये पैरोकारी करनी होगी. 

यह अनिवार्य है कि हम ये सुनिश्चित करें कि जुड़ाव के ज़रिये कामकाज, शिक्षा, और सार्वजनिक सेवाओं के जो अवसर प्रदान किये जा सकते हैं, वे सभी के लिये उपलब्ध हों. 

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.

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