'डरबन घोषणापत्र व कार्रवाई कार्यक्रम' - ऐतिहासिक सम्मेलन की 20वीं वर्षगाँठ

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने, ऐतिहासिक डरबन सम्मेलन की 20वीं वर्षगाँठ के अवसर पर, बुधवार, 22 सितम्बर को एक उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन कर रही है. इस बैठक की थीम “मुआवज़ा, नस्लीय न्याय और अफ़्रीकी मूल के लोगों के लिये समानता” रखी गई है. एक नज़र ‘डरबन घोषणापत्र और कार्रवाई कार्यक्रम’ की पृष्ठभूमि पर... 

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर, और सम्बद्ध असहिष्णुता की गम्भीरता को ध्यान में रखते हुए, उनसे निपटने के प्रयासों के तहत वर्ष 1997 में एक विश्व सम्मेलन के आयोजन का निर्णय लिया था. 

इसके चार साल बाद, यह सम्मेलन दक्षिण अफ़्रीका के डरबन शहर में 31 अगस्त से 7 सितम्बर 2001 तक आयोजित किया गया. 

2001 सम्मेलन के परिणामस्वरूप ‘डरबन घोषणापत्र व कार्रवाई कार्यक्रम’ (Durban Declaration and Programme of Action/DDPA) नामक दस्तावेज़, आम सहमति से पारित किया गया. 

इस दस्तावेज़ को नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर और सम्बद्ध असहिष्णुता के विरुद्ध लड़ाई में एक व्यापक फ़्रेमवर्क के तौर पर देखा जाता है. 

कार्रवाई पर केन्द्रित इस घोषणापत्र में, नस्लवाद के सभी रूपों से लड़ाई में दूरगामी उपायों व सिफ़ारिशों का उल्लेख है और भेदभाव-विरोधी कड़े क़ानूनी व प्रशासनिक उपायों का आग्रह किया गया है.

इस मुद्दे की पहचान भी की गई है कि कोई भी देश नस्लवाद से मुक्त होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि नस्लवाद एक वैश्विक चिन्ता है जिससे निपटने के लिये सार्वभौमिक प्रयास किये जाने होंगे.

डरबन घोषणापत्र और कार्रवाई कार्यक्रम, पीड़ितों पर केन्द्रित एक दस्तावेज़ है, जिसमें नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर और सम्बन्धित असहिष्णुताओं के पीड़ितों की व्यथा पर ज़ोर दिया गया है.

ऐमेज़ोन क्षेत्र में आदिवासी समुदाय के बच्चे.
PAHO/WHO/Karen González Abril
ऐमेज़ोन क्षेत्र में आदिवासी समुदाय के बच्चे.

इनमें निम्न समूह हैं:

- अफ़्रीकी एवं अफ़्रीकी मूल के लोग
- एशियाई एवं एशियाई मूल के लोग
- आदिवासी लोग
- प्रवासी
- शरणार्थी
- विस्थापित
- मानव तस्करी के पीड़ित
- रोमा, ख़ानाबदोश/जिप्सी, सिन्ती सहित अल्पसंख्यक 

अहम बिन्दुओं की एक झलक

- घोषणापत्र में समानता और भेदभाव से इतर सिद्धान्तों को बुनियादी मानवाधिकारों के रूप में फिर से पुष्ट किया गया है. 

- नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर और सम्बद्ध असहिष्णुता से मुक़ाबला करने का प्राथमिक दायित्व सदस्य देशों पर है.

- नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अन्तरराष्ट्रीय सन्धि के सार्वभौमिक अनुसमर्थन (ratification) और सदस्य देशों द्वारा उसे कारगर ढंग से लागू किये जाने का आहवान किया गया है. 

- घोषणापत्र व कार्रवाई कार्यक्रम में नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर और सम्बद्ध असहिष्णुता से निपटने में पीड़ित-केन्द्रित उपायों पर बल दिया गया है.

- यह स्वीकार किया गया है कि पीड़ितों को अक्सर लिंग, भाषा, धर्म, राजनैतिक व अन्य विचारों, सामाजिक मूल स्थान, सम्पत्ति, जन्म व अन्य दर्जों के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है. 

- साथ ही नस्लीय भेदभाव के लैंगिक आयामों को भी रेखांकित किया गया है और नस्लवाद व असहिष्णुता का सामना करने के कार्यक्रम विकसित करते समय महिलाओं की अहम भूमिका पर बल दिया गया है. 

- घोषणापत्र में नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर और सम्बद्ध असहिष्णुता के उन्मूलन के लिये व्यापक राष्ट्रीय कार्रवाई योजनाओं की पुकार लगाई गई है. 

दास व्यापार के पीड़ितों की स्मृति में 'ऑर्क ऑफ़ रिटर्न' स्मारक.
UN Photo/Devra Berkowitz
दास व्यापार के पीड़ितों की स्मृति में 'ऑर्क ऑफ़ रिटर्न' स्मारक.

- रोज़गार, स्वास्थ्य, पुलिस कार्रवाई और शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले भेदभाव से निपटने के लिये उपायों का ख़ाका पेश किया गया है.

- सदस्य देशों से मीडिया व इण्टरनेट पर नस्लीय घृणा को उकसावा दिये जाने से रोकने के लिये, नीतियाँ व कार्यक्रम तैयार करने का आग्रह किया है. 

- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक निर्णय-निर्धारण प्रक्रियाओं में पीड़ितों के लिये समान अवसर सुनिश्चित किये जाने और सकारात्मक ढंग से सहायता मुहैया कराए जाने के उपाय अपनाने का आहवान किया गया है.

- देशों की सरकारों से पीड़ितों के लिये कारगर कष्ट-निवारण उपायों, सहारे व मुआवज़े हेतु समुचित उपायों का प्रबन्ध करने का आग्रह किया गया है ताकि पीड़ितों के लिये, क़ानूनी सहायता पाने का रास्ता हासिल हो सके.

- नस्लवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशियों के प्रति नापसन्दगी व डर और सम्बद्ध असहिष्णुता के आरोपों की पड़ताल के लिये सक्षम राष्ट्रीय संस्थाओं के गठन की सिफ़ारिश की गई है.

- घोषणापत्र में स्वीकार किया गया है कि दासता और दास व्यापार, मानवता के विरुद्ध एक अपराध है और इसे हमेशा इसी रूप में देखा जाना होगा. साथ ही खेद प्रकट किया गया है कि दास व्यापार और औपनिवेशवाद, दीर्घकालीन सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के पनपने की वजह बने हैं. 

- मध्य पूर्व में, फ़लस्तीनी लोगों की विदेशी क़ब्ज़े में व्यथा पर चिन्ता व्यक्त की गई है और उनके आत्म-निर्णय (स्व-निर्धारण) के अपरिहार्य अधिकार व एक स्वतंत्र देश के अधिकार की शिनाख़्त की गई है. 

- घोषणापत्र में ध्यान दिलाया गया है कि यहूदियों के जनसंहार – हॉलोकॉस्ट – को कभी नहीं भुलाया जाना होगा. 

- कार्रवाई कार्यक्रम में अनेक रणनीतियाँ पेश की गई हैं ताकि अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिये पूर्ण व कारगर समानता हासिल की जा सके. 

डरबन + 20 उच्चस्तरीय बैठक

डरबन घोषणापत्र व कार्रवाई कार्यक्रम, क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, मगर इसका एक ठोस नैतिक मूल्य है, और यह विश्व भर में हिमायत व पैरोकारी प्रयासों को एक मज़बूत आधार प्रदान करता है.

न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन इलाक़े में पुलिस हिंसा के विरोध में जुलूस निकालते प्रदर्शनकारी.
UN News/Shirin Yaseen
न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन इलाक़े में पुलिस हिंसा के विरोध में जुलूस निकालते प्रदर्शनकारी.

डरबन सम्मेलन की 20वीं वर्षगाँठ पर 22 सितम्बर को आयोजित हो रही बैठक को, नस्लवाद और नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध लड़ाई में एक सामयिक आयोजन क़रार दिया गया है. 

इसके ज़रिये दुनिया के पास नस्लीय भेदभाव के भिन्न-भिन्न और एक दूसरे में गुँथे हुए रूपों से निपटने का एक अवसर होगा.

साथ ही, इन प्रयासों के तहत विभिन्न समानता आन्दोलनों में एकजुटता की अहमयित पर बल दिया जाएगा.  इस आयोजन के ज़रिये निम्न मुद्दों पर मौजूदा प्रयासों को गति दी जाएगी: 

- अतीत के उपायों की प्रभावशीलता की समीक्षा
- चुनौतियों का फिर से आकलन 
- व्याप्त कमियों से निपटा जाना
- नस्लवाद व नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध त्वरित व असरदार उपायों के लिये संकल्प 

यूएन महासभा ने अपने प्रस्ताव 75/237 के तहत यह निर्णय लिया है कि बैठक में एक संक्षिप्त राजनैतिक घोषणापत्र पारित किया जाएगा.

इसका लक्ष्य डरबन घोषणापत्र व कार्रवाई कार्यक्रम व सम्बद्ध प्रक्रियाओं को पूर्ण व कारगर ढंग से लागू किये जाने के लिये राजनैतिक इच्छाशक्ति को संगठित करना है. 

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