जैव विविधता के संरक्षण की ख़ातिर, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की अनदेखी ना हो

संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ मानवाधिकार विशेषज्ञ डेविड बोयड ने गुरूवार को कहा है कि पृथ्वी ग्रह की ज़मीन पर जैव विविधता और पानी की बचत करने के लिये चलाए जाने वाले वैश्विक कार्यक्रम को, दुनिया के निर्बल लोगों के लिये जोखिम उत्पन्न करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित एक वैश्विक जैव विविधता ढाँचा समझौते के प्रारूप के तहत, देशों के बीच, वर्ष 2030 तक, कम से कम 30 प्रतिशत ग्रह के संरक्षण और लगभग 20 प्रतिशत बहाली पर सहमति हुई है.

मानवाधिकर और पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर डेविड बोयड ने अलबत्ता ये भी माना है कि ये योजना, जैव विविधता के संरक्षण के लिये आवश्यक है. मगर उन्होंने साथ ही आगाह भी किया है कि इस योजना का क्रियान्वयन और लक्ष्य प्राप्ति, आदिवासी व अन्य ग्रामीण आबादी के, मानवाधिकारों के और ज़्यादा हनन की क़ीमत पर नहीं होने चाहिये. 

उन्होंने कहा कि आदिवासी लोगों, अफ़्रीकी मूल के लोगों, स्थानीय समुदायों, किसानों, ग्रामीण महिलाओं और ग्रामीण युवजन की ज़रूरतों पर विशेष ध्यान देना होगा. समझौते के मौजूदा प्रारूप में हाल में किये गए सुधारों के बावजूद, इनमें से किसी भी समूह को समुचित प्राथमिकता नहीं दी गई है.

क़ुदरती साझीदार

डेविड बोयड ने कहा है कि इन व्यक्तियों और समूहों को, प्रकृति के संरक्षण और बहाली के प्रयासों में, महत्वपूर्ण साझीदार माना जाना होगा.

“उनके मानवाधिकार, भूमि और उस पर स्वामित्व के अधिकार, उनका ज्ञान व समझ, और संरक्षण में उनके योगदान को पहचान देने के साथ-साथ, उन्हें सम्मान व समर्थन भी देना होगा.”

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ डेविड बोयड ने तथाकथित क़िलेबन्दी वाले संरक्षण के रुख़ के ख़िलाफ़ आगाह किया जिसका उद्देश्य ऐसे प्राकृतिक और जैव विविधता वाले इलाक़ों को बहाल करना है जहाँ कोई इनसान नहीं बसते हैं.

उन्होंने कहा कि इस रुख़ वाले कार्यक्रम के लक्षित इलाक़ों में, स्थानीय समुदायों के मानवाधिकारों पर, विनाशकारी प्रभाव हुए हैं, जिनमें आदिवासी और अन्य ग्रामीण आबादी शामिल है.

मानवाधिकार विशेषज्ञ ने कहा, “मानवाधिकारों को, अनदेखी के दायरे में छोड़ दिया जाना, कोई विकल्प हो ही नहीं सकता, क्योंकि मानवाधिकारों पर आधारित संरक्षण ही, पृथ्वी ग्रह की हिफ़ाज़त करने के लिये, सर्वाधिक प्रभावी, कुशल, और समतामूलक रास्ता है.”

उन्होंने सदस्य देशों से, मानवाधिकारों को, नए वैश्विक जैव विविधता ढाँचे के केन्द्र में रखे जाने का आग्रह किया.

जैव विविधता फ़्रेमवर्क

विशेष रैपोर्टेयर डेविड बोयड की ये पुकार, संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता सम्मेलन से पहले आई है जिसे कॉप15 के नाम से भी जाना जाता है. ये सम्मेलन अक्टूबर में वर्चुअल माध्यमों और उसके बाद अप्रैल 2022 में, चीन के कुनमिंग में, निजी शिरकत के साथ आयोजित होना प्रस्तावित है.

कॉप15 के इन सत्रों के दौरान, 190 देशों के प्रतिनिधि, संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2020 के बाद के वैश्विक जैव विविधता फ़्रेमवर्क को अन्तिम रूप देना चाहेंगे.

जुलाई में जारी, समझौता प्रारूप में, जैव विविधता, इनसानों के रहन-सहन और पृथ्वी पर जीवन के भविष्य के लिये मौजूद जोखिमों से निपटने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है. 

साथ ही, वर्ष 2050 तक एक ऐसी दुनिया बनाने की इच्छा भी ज़ाहिर की गई है जो प्रकृति के साथ सदभाव बनाकर मौजूद रह सके.

विशेष रैपोर्टेयर डेविड बोयड ने अक्टूबर 2020 में, , “Human Rights Depend on a Healthy Biosphere” नामक अपनी रिपोर्ट, संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश करते हुए, एक पॉलिसी पत्र भी जारी किया था. इसमें जैव विविधता की संरक्षा और बहाली के लिये, एक ज़्यादा समावेशी, न्यायपूर्ण और टिकाऊ रुख़ अपनाए जाने का आहवान किया गया था.

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