जलवायु परिवर्तन व स्वास्थ्य जोखिम: देशों के पास समर्थन व धनराशि का अभाव

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि जलवायु प्रभावों से आमजन के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिये, देशों की सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों को प्राथमिकता दे रही हैं, मगर कारगर कार्रवाई के लिये अनेक देशों के पास पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के विषय पर, सोमवार को 'The 2021 WHO health and climate change global survey report' नामक एक रिपोर्ट जारी की है.

इसमें 95 देशों में हालात की पड़ताल के लिये सर्वेक्षण किया गया है. रिपोर्ट बताती है कि महज़ एक चौथाई देश ही, पूर्ण रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य व जलवायु परिवर्तन योजनाएँ या रणनीतियाँ लागू कर पाए हैं. 

अन्य प्रमुख अवरोधो में वैश्विक महामारी कोविड-19 से उपजी चुनौतियाँ और अपर्याप्त मानवीय संसाधन बताए गए हैं.

यूएन एजेंसी में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य मामलों की निदेशक डॉक्टर मारिया नेयरा ने कहा कि यह सर्वेक्षण दर्शाता है कि अनेक देश, जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों से निपटने के लिये ना तो तैयार हैं, और ना ही उन्हें इसके लिये समर्थन प्राप्त है. 

यह रिपोर्ट पहली बार वर्ष 2019 में प्रकाशित की गई थी, और इसके दूसरे संस्करण में अब तक इस विषय में सरकारों द्वारा दर्ज की गई प्रगति की समीक्षा की गई है.

डॉक्टर नेयरा ने बताया कि समाज में निर्बल समुदायों पर जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य दुष्प्रभावों का शिकार होने का सबसे अधिक ख़तरा है - इनमें जातीय अल्पसंख्यक, निर्धन समुदाय, विस्थापित, बुज़ुर्ग और महिलाएँ व बच्चे हैं. 

उन्होंने कहा कि कारगर उपायों के ज़रिये आमजन की रक्षा सुनिश्चित की जा सकती है.

“उदाहरणस्वरूप, अगर वायु के मौजूदा प्रदूषण स्तर को, WHO की वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों के अनुरूप कम कर दिया जाए, तो वायु प्रदूषण के कारण होने वाली क़रीब 80 फ़ीसदी मौतों को टाला जा सकता है.”

प्रगति पथ पर चुनौतियाँ

रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त धनराशि का अभाव, देशों के लिये सबसे बड़ी चुनौती है. सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 70 फ़ीसदी देशों ने इसे एक बड़ा अवरोध बताया है, जबकि दो वर्ष पहले 56 प्रतिशत देशों ने इसे एक बड़ी बाधा क़रार दिया था.

मानवीय संसाधन सम्बन्धी बाध्यताएँ दूसरे स्थान पर हैं और एक तिहाई देशों ने अन्तर-क्षेत्र रचनात्मक सहयोग की कमी को एक मुख्य रुकावट माना है.

कोविड-19 की वजह से जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई की गति धीमी हुई है, चूँकि स्वास्थ्यकर्मियों व अन्य संसाधनों को, महामारी पर जवाबी कार्रवाई के लिये तैनात करना पड़ा है.

रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक रुझानों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया गया है. जैसेकि सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले तीन-चौथाई देश, राष्ट्रीय स्वास्थ्य व जलवायु परिवर्तन योजनाएँ व रणनीतियाँ तैयार करने के काम में जुटे हैं या ऐसा कर चुके हैं.   

रुकावटें हटाने पर बल

यूएन एजेंसी का मानना है कि अगली चुनौती अब उन अड़चनों को दूर करना है, जिनकी वजह से देश अपनी योजनाओं को अन्तिम रूप नहीं दे पा रहे हैं, या उन्हें लागू नहीं कर पा रहे हैं.  

85 फ़ीसदी देशों के स्वास्थ्य मंत्रालयों में अब स्वास्थ्य व जलवायु परिवर्तन के लिये, अब एक चिन्हित सम्पर्क बिन्दु है. इसके अतिरिक्त, 54 प्रतिशत देशों में स्वास्थ्य मंत्रालयों ने सम्बन्धित टास्क फ़ोर्स या अन्य समितियाँ गठित की हैं. 

दो-तिहाई देशों में जलवायु परिवर्तन व स्वास्थ्य के मोर्चे पर सम्वेनशीलता व अनुकूलन की समीक्षा या तो पूरी हो गई है या फिर यह प्रक्रिया में है. 

क़रीब 94 प्रतिशत देशों में, पेरिस जलवायु समझौते के अनुरूप, जलवायु कार्रवाई संकल्पों में स्वास्थ्य ज़रूरतों को भी समाहित किया गया है. 

रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि अन्य सैक्टरों में अनुकूलन व कार्बन उत्सर्जन कटौती प्रयासों के स्वास्थ्य लाभों की पहचान किये जाने, या उन्हें बेहतर बनाे जाने का अवसर भुनाया नहीं जा सका है. 

इसकी मदद से कोविड-19 से स्वच्छ और बेहतर पुनर्बहाली की प्रक्रिया में मदद मिल सकती थी. 

इन सैक्टरों में स्वास्थ्य के ढाँचागत और सामाजिक निर्धारक है: जैसेकि शिक्षा, समता, लिंग, शहरी नियोजन, आवास, ऊर्जा और परिवहन प्रणालियाँ. 

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