जलवायु परिवर्तन: इन पाँच रूपों में प्रभावित होती हैं महिलाएँ

वर्ष 2021 में, विश्व भर में जंगलों में विनाशकारी आग, झुलसा देने वाली ताप लहरों, भीषण बाढ़ व सूखे की घटनाओं के बीच, अन्तर-सरकारी आयोग की नई रिपोर्ट दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में, दुनिया एक बेहद नाज़ुक मोड़ पर पहुँच रही है. जलवायु परिवर्तन से महिलाओं पर होने वाले असर पर एक नज़र...

जलवायु परिवर्तन के भीषण, हृदय-विदारक परिणामों से कोई भी अछूता नहीं है. मानवीय राहत मामलों में समन्वय के लिये यूएन कार्यालय के मुताबिक इस वर्ष 23 करोड़ 50 लाख लोगों को मदद की आवश्यकता थी.

एक अनुमान के अनुसार, जलवायु कारणों से वर्ष 2030 तक मानवीय सहायता के ज़रूरतमन्दों की संख्या दोगुनी हो जाने की सम्भावना है. 

मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों और प्राकृतिक आपदाओं के पीड़ितों को श्रेणीबद्झ करना कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है. 

मगर, निर्बल और हाशिए पर रहने वाले समुदायों, जैसे कि महिलाओं को, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन से ख़तरा है. 

इनमें से अधिकाँश निर्धन समुदाय हैं, मुख्यत: प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं और आपदाओं का शिकार बनने का जोखिम उनके लिये अधिक है.  

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के मुताबिक पुरुषों की तुलना में, महिलाओं व बच्चों के किसी आपदा में मौत होने की सम्भावना 14 गुना अधिक होती है.

जलवायु परिवर्तन से महिलाओं व लड़कियों के लिये पाँच प्रकार की चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं: 

1…. लिंग-आधारित हिंसा में बढ़ोत्तरी

जल, ईंधन के लिये लकड़ी इत्यादि का प्रबन्ध करने की ज़िम्मेदारी आमतौर पर महिलाओं की ही होती है, और अक्सर इनकी तलाश में उन्हें दूर तक पैदल चलना पड़ता है. 

भारत के औरंगाबाद शहर में, कुछ महिलाएँ. आँकड़ों के अनुसार, बहुत बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जो अपने शरीर, सैक्स व स्वास्थ्य के बारे में ख़ुद फ़ैसले नहीं ले सकतीं.
World Bank/Simone D. McCourtie
भारत के औरंगाबाद शहर में, कुछ महिलाएँ. आँकड़ों के अनुसार, बहुत बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जो अपने शरीर, सैक्स व स्वास्थ्य के बारे में ख़ुद फ़ैसले नहीं ले सकतीं.

जलवायु परिवर्तन के कारण आबादियों का विस्थापन होने (उदाहरणस्वरूप, सोमालिया और अंगोला में सूखा पड़ना) से महिलाओं व लड़कियों के लिये शरणार्थी या घरेलू विस्थापितों के लिये बनाए गए शिविरों में लिंग आधारित हिंसा का शिकार होने का जोखिम बढ़ जाता है. 

घर-परिवार चलाने के लिये संसाधनों का इन्तज़ाम करने में, उन्हें अनजान इलाक़ों में जाना पड़ता है, जहाँ उनके लिये मुश्किलें बढ़ जाती हैं.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के मुताबिक एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में चक्रवाती तूफ़ानों के बाद, यौन तस्करी के मामलों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. 

पूर्वी अफ़्रीका में सूखे, लातिन अमेरिका में चक्रवाती तूफ़ान और अरब देशों में चरम मौमस की घटनाओं के दौरान, अंतरंग संगी द्वारा की जाने वाली हिंसा में वृद्धि देखी गई.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार, युगाण्डा में लम्बे समय तक सूखाग्रस्त रहने वाले इलाक़ों में घरेलू हिंसा की दरों, यौन दुर्व्यवहार और महिला जननांग विकृति में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई.

पाकिस्तान में बाढ़ और बांग्लादेश में चक्रवाती तूफ़ानों के बाद महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में तेज़ी देखी गई. इन रूझानों से विकसित देश भी अलग नहीं है. 

2.... बाल विवाह के मामलों में वृद्धि

चरम मौसम की घटनाओं की वजह से आजीविका बर्बाद हो जाती है और निर्धनता विकराल रूप धारण कर लेती है.

इन हालात में परिवार, भोजन की क़िल्लत के कारण अक्सर युवा बेटियों की जल्द शादी कराने का विकल्प चुनते हैं.

तिमोर लेस्ते में एक महिला किसान.
UNDP/Yuichi Ishida
तिमोर लेस्ते में एक महिला किसान.

इन शादियों के बदले, उन्हें अक्सर धन भी मिलता है और वे यह मानते हैं कि इसके ज़रिये लड़कियों के लिये भविष्य बेहतर हो रहा है.

चाहे यह जिस वजह से भी हो, कम उम्र में शादियों में वृद्धि, उन देशों में दिखाई दी हैं जो जलवायु आपदाओं से प्रभावित हुए हैं. 

इनमें मलावी, भारत, फ़िलिपींस, इण्डोनेशिया, लाओ पीडीआर और मोज़ाम्बीक़ सहित अन्य देश हैं. 

3…. मृत बच्चे को जन्म...

शोध के अनुसार, प्रसव से पहले वाले एक हफ़्ते के दौरान, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी को गर्मी के मौसम (मई – सितम्बर) में जोखिम में छह प्रतिशत की बढ़ोत्तरी से जोड़ कर देखा जाता है. 

इस अनुमान से, प्रति 10 हज़ार बच्चों के जन्म में चार अतिरिक्त मृत बच्चे पैदा होते हैं.   

इस विषय में अभी और अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है, मगर तथ्यों से मिलने वाले संकेत दर्शाते हैं कि चरम गर्मी और नकारात्मक प्रसव नतीजों में सम्बन्ध है.

4....मातृत्व और नवजात शिशु सम्बन्धी ख़राब परिणाम 

मलेरिया व डेन्गू बुखार या अन्य बीमारियों को अक्सर गर्भपात, समय से पहले जन्म होने और एनीमिया के मामलों से जोड़ कर देखा जाता है.

तापमान में बढ़ोत्तरी होने की वजह से उन मौसमों की अवधि लम्बी हो रही है, जब ऐसी बीमारियों को फैलाने वाले मच्छर सक्रिय रहते हैं और नमी भरे पर्यावरण में उनकी संख्या भी बढ़ती है.

जलवायु परिवर्तन के कारण ज़ीका वायरस जैसी बीमारियों का फैलाव भी बढ़ सकता है. इस बीमारी से बच्चे जन्म से ही विकार का शिकार होते हैं, उनका सिर छोटा होता है.

तिमोर लैस्ते को सुआई क्षेत्र में, एक महिला अपने नवजात शिशु के साथ.
UN Photo/Martine Perret
तिमोर लैस्ते को सुआई क्षेत्र में, एक महिला अपने नवजात शिशु के साथ.

5… यौन व प्रजनन स्वास्थ्य में व्यवधान और गर्भनिरोधक उपायों की सीमित सुलभता 

जैसा कि कोविड-19 महामारी ने दर्शाया है, आपात परिस्थितियों में स्वास्थ्य-देखभाल संसाधनों को नए ख़तरों से लड़ने और कम महत्वपूर्ण समझी जाने वाली सेवाओं के लिये इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

जलवायु परिवर्तन के कारण आपात परिस्थितियों की आवृत्ति बढ़ती है, यानि यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार सेवाओं में कटौती की जा सकती है.

मगर, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकार सेवाएँ अगर जारी रह भी पाएँ, तो भी विस्थापित महिलाएँ व लड़कियों के लिये वे अक्सर सुलभ नहीं होती हैं. 

इसकी वजह से अनचाहे गर्भधारण और यौन संचारित संक्रमणों के मामलों में वृद्धि देखी जा सकती है.  

मोज़ाम्बीक़ में चक्रवाती तूफ़ान इलोयस के बाद, गर्भनिरोधक उपायों तक पहुँच ना होने की वजह से प्रजनन आयु की 20 हज़ार से अधिक महिलाओं को अनचाहा गर्भधारण का जोखिम झेलना पड़ा.

वहीं, होण्डुरस में वर्ष 2020 में चक्रवाती तूफ़ान ईटा और आयोटा के बाद, प्रजनन उम्र की एक लाख 80 हज़ार महिलाओं के लिये परिवार नियोजन सेवाएँ सुलभ नहीं थीं.  

जलवायु परिवर्तन के कारण फ़सलें बर्बाद होने से भी यौन व प्रजनन स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

एक अध्ययन के मुताबिक खाद्य असुरक्षा की चुनौतियों के बाद, कृषि क्षेत्र में काम करने वाली तन्ज़ानियाई महिलाओं को कमाई के लिये सैक्स का रास्ता अपनाना पड़ा.

इससे एचआईवी/एड्स संक्रमणों की दर में तेज़ी देखने को मिली है. 

यह पहले यहाँ प्रकाशित हो चुके लेख का संक्षिप्त रूप है. 

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