जलवायु अनुकूलन में जान फूँकने के लिये तेज़ प्रयासों की ज़रूरत, यूनेप

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने गुरूवार को प्रकाशित अपनी एक नई रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के लिये नीतियाँ व योजनाएँ बढ़ तो रही हैं, मगर वित्त और क्रियान्वयन अब भी पीछे है.

अनुकूलन अन्तर रिपोर्ट 2021 में जलवायु वित्त तेज़ी से बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से निपटने के लिये त्वरित कार्रवाई करने की पुकार भी लगाई गई है.

यूनेप की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐण्डर्सन का कहना है, “दुनिया, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिये प्रयास बढ़ाती तो नज़र आ रही है, मगर ये प्रयास कहीं से भी बहुत मज़बूत नज़र नहीं आ रहे हैं – दुनिया को ख़ुद को जलवायु परिवर्तन के लिये ढालने की ख़ातिर, नाटकीय गति से बदलाव करने होंगे.”

महत्वाकांक्षा में त्वरित बदलाव की ज़रूरत

इन्गेर एण्डर्सन ने कहा कि अगर देश, कार्बन उत्सर्जन को आज ही बिल्कुल बन्द कर दें तो भी जलवायु प्रभाव, आने वाले कई दशकों तक जारी रहेंगे.

उन्होंने कहा, “हमें, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुक़सान, महत्वपूर्ण रूप से कम करने की ख़ातिर, अनुकूलन महत्वकांक्षा और वित्त व क्रियान्वयन में बहुत तेज़ बदलाव करने होंगे. और हमें ये अभी करना होगा.”

यूनेप रिपोर्ट ऐसे समय जारी की गई है जब, यूएन जलवायु सम्मेलन कॉप26, स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो में आयोजित हो रहा है. 

यह रिपोर्ट, पेरिस जलवायु समझौते के प्रावधानों के अनुरूप, वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के सामूहिक प्रयासों का एक हिस्सा है.

मौजूदा आँकड़ों के अनुसार, अभी दुनिया इस सदी के अन्त तक तापमान वृद्धि 2.7 डिग्री सेल्सियस रहने के रास्ते पर चल रही है.

यहाँ तक कि अगर पेरिस जलवायु समझौते के अनुरूप, तापमान वृद्धि को 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर लिया जाता है, तो भी जलवायु परिवर्तन के बहुत से जोखिम रहेंगे.

खाई को पाटना होगा

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम का कहना है कि अगर कार्बन उत्सर्जन की मात्रा और उसमें कमी लाने के लिये की जा रही कार्रवाई के बीच, बहुत बड़े अन्तर की खाई को और ज़्यादा फैलने से रोकना है तो, विशेष रूप में जलवायु वित्त व अनुकूलन के लिये ज़्यादा महत्वाकांक्षाएँ अपने की ज़रूरत है.

रिपोर्ट में पाया गया है कि जलवायु अनुकूलन की लागत, इस दशक के अन्त तक प्रतिवर्ष, 140 से 300 अरब डॉलर के आसपास रहने का अनुमान है और उसके बाद, 2050 तक, 280 से 500 अरब डॉलर प्रतिवर्ष.

कोविड-19 से निकलते अवसर

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि देश कोविड-19 महामारी से उबरने के आर्थिक प्रयासों में, हरित आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने का अवसर, किस तरह गँवा रहे हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, हरित आर्थिक प्रगति, सूखा, जंगली आग और बाढ़ जैसे जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी प्रभावों के लिये अनुकूलन करने में भी मदद करती है.

जून तक, जिन 66 देशों के हालात का अध्ययन किया गया, उनमें से एक तिहाई से भी कम देशों ने, कोविड-19 का सामना करने के उपायों में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को शामिल किया.

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