खेतीबाड़ी के अस्तित्व के लिये अति अहम पानी पर मंडराते कुछ जोखिम

1950 के दशक से, सिन्थेटिक उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों और उच्च उपज वाले अनाज जैसे नवाचारों ने मानवता को अनाज उत्पादन की मात्रा में नाटकीय रूप से वृद्धि करने में मदद की है. लेकिन ये आविष्कार, कृषि की सबसे क़ीमती वस्तु - ताज़े पानी के बिना बेकार होंगे. और शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अब ख़तरे में है.

प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अति-अमूर्तता ने झीलों, नदियों और जलभृतों से समझौता करना शुरू कर दिया है, जिससे विश्व स्तर पर खेती प्रभावित हो रही है. इससे भोजन की व्यापक कमी का ख़तरा बढ़ रहा है – और यूक्रेन संकट से स्थिति और ज़्यादा ख़राब हो गई है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) में समुद्र और मीठे पानी विभाग की प्रमुख, लेटिसिया कार्वाल्हो कहती हैं, "मानवता की दो से अधिक पीढ़ियाँ प्रचुरता में रही हैं. लेकिन हम उस मीठे पानी के संसाधनों की उपेक्षा कर रहे हैं, जो हमारे लिये फ़सल उगाना सम्भव बनाते हैं. और अगर हम ऐसा करते रहे तो इसके परिणाम गम्भीर हो सकते हैं."
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का कहना है कि पिछले दो दशकों में ताज़े पानी की मात्रा में प्रति व्यक्ति 20 प्रतिशत की गिरावट आई है, और लगभग 60 प्रतिशत सिंचित फ़सल योग्भू मि में पानी की कमी है. इस कमी के नतीजे दूरगामी हैं: सिंचित कृषि से, दुनिया भर में उत्पादित कुल भोजन का 40 प्रतिशत हिस्सा आता है.

दुनिया के प्रति व्यक्ति मीठे पानी के भण्डार में गिरावट के पीछे क्या कारण हैं और उन चुनौतियों का किसानों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, इस पर एक नज़दीकी क़रीब...

दुनिया भर में चरम मौसम की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है.
NOAA
दुनिया भर में चरम मौसम की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है.

सूखा और शुष्कीकरण

अनुसन्धान बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से लम्बे समय तक सूखा पड़ रहा है, और अफ़्रीका व पश्चिमी अमेरिका जैसे कई स्थानों पर लम्बे समय तक सूखा पड़ने के रिकॉर्ड बन रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख उदाहरण है.

मरुस्थलीकरण का मुक़ाबला करने के लिये संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की एक रिपोर्ट, Global Land Outlook के अनुसार, दुनिया की एक तिहाई से अधिक आबादी, वर्तमान में पानी की कमी वाले क्षेत्रों में रहती है.

साथ ही, तेज़ी से बढ़ती गम्भीर बाढ़ की घटनाओं के लिये भी ग्लोबल वार्मिंग को ज़िम्मेदार माना जा रहा है, जैसाकि हाल ही में भारत और बांग्लादेश में देखा गया है, जिसका किसानों पर गम्भीर असर पड़ा.

माली में, लगातार बाढ़ और सूखे के क़हर से किसानों का जीवनयापन मुश्किल हो गया है.
WFP/Simon Pierre Diouf
माली में, लगातार बाढ़ और सूखे के क़हर से किसानों का जीवनयापन मुश्किल हो गया है.

भूजल का कुप्रबन्धन

भूजल से, सिंचाई के लिये उपयोग किए जाने वाले 43 प्रतिशत पानी की आपूर्ति होती है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में खुदाई तकनीक बेहतर होने के कारण, भारत जैसे दुनिया के कुछ देशों में इसका असतत तरीक़े से दोहन किया जा रहा है.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन का अनुमान है कि वैश्विक अनाज फ़सल के 10 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन, भूजल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से किया जा रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ठोस प्रबन्धन प्रथाओं और ड्रिप सिंचाई जैसी नई तकनीकें, भूजल भण्डार पर दबाव को कम कर सकती है.

खारे पानी का रिसाव

गहन सिंचाई से जल स्तर में वृद्धि हो सकती है, जिससे मिट्टी और पौधों की जड़ों में नमक रिसकर, फ़सल को नुकसान पहुँचा सकता है.

साथ ही, भूजल का अत्यधिक उपयोग व जलवायु-परिवर्तन-प्रेरित समुद्र-स्तर की वृद्धि के दोहरे प्रभाव से, खारा पानी तटीय भूजल जलभृतों में प्रवेश कर सकता है. इससे फ़सलों और पैदावार को नुक़सान पहुँच सकता है एवं पेयजल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.

यूनेप का अनुमान है कि दुनिया भर की लगभग दस प्रतिशत नदियाँ, खारे पानी के प्रदूषण से प्रभावित हैं.

प्रदूषण

कुछ शुष्क क्षेत्रों में फ़सलें उगाने के लिये उपयोग किये जाने वाले अपशिष्ट जल की मात्रा में वृद्धि हुई है. उस पानी में मौजूद रोगजनक, हैज़ा या दस्त का कारण बन सकते हैं, लेकिन ज़्यादातर किसान इस सम्भावित परिणाम से बेख़बर होते हैं. (इन सब्ज़ियों को धोने या उबालने से बीमारी का ख़तरा काफ़ी कम हो जाता है.)

सीवेज सिस्टम या उर्वरक के भण्डारण पानी में डूबने की सम्भावना के कारण, बाढ़ से समस्या और बढ़ सकती है व इससे सतही जल एवं भूजल दोनों प्रदूषित हो सकते हैं. उर्वरक के पानी में बह जाने से झीलों में शैवाल खिल सकते हैं, जिससे मछलियाँ मर सकती हैं. इसके अलावा, आन्धी-तूफ़ान और जंगल की आग, खेती व खाद्य सुरक्षा के लिये अतिरिक्त जोखिम हैं.

दुनिया भर के कुछ स्थानों में, प्रदूषक भी भूजल में रिसकर फ़सलों पर सम्भावित दीर्घकालिक प्रभाव डाल रहे हैं. हालाँकि, पौधों और मानव स्वास्थ्य पर सटीक असर स्थापित करने के लिये अभी अधिक शोध की आवश्यकता है.

भूमि क्षरण

मानवता ने पृथ्वी के 70 प्रतिशत से अधिक भूमि क्षेत्र को बदल दिया है, जिसे ‘ग्लोबल लैण्ड आउटलुक’ ने "अद्वितीय पर्यावरणीय गिरावट" क़रार दिया है. कई जगहों पर, मिट्टी की, पानी को रोकने और छानने की क्षमता कम हो रही है, जिससे फ़सल उगाना और पशु-पालन में मुश्किलें आ रही हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस सदी में मौजूदा भूमि क्षरण की प्रवृत्ति जारी रहती है, तो वैज्ञानिकों का अनुमान है कि खाद्य आपूर्ति में बाधा पैदा हो सकती है.

जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम घटनाएँ, जैसेकि भारी बारिश के बाद सूखे का क़हर, भूमि क्षरण में तेज़ी ला सकता है.

कैमरून में भूमि का इस्तेमाल टिकाऊ ढंग से न होने के चलते मरुस्थलीकरण की समस्या पैदा हुई है.
UN News/Daniel Dickinson
कैमरून में भूमि का इस्तेमाल टिकाऊ ढंग से न होने के चलते मरुस्थलीकरण की समस्या पैदा हुई है.

समाधान

ड्रिप सिंचाई और जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के अन्य साधन अपनाने के सतत विकास के लिये 2030 एजेण्डा को अपनाने से, दुनिया भर में मीठे पानी की आपूर्ति की मांग कम करने में मदद मिलेगी. एक अन्य दृष्टिकोण जो मदद कर सकता है - और जिसे यूनेप और अन्य संस्थाएँ बढ़ावा दे रही हैं – वो है जल संसाधनों का बेहतर प्रबन्धन.

जल, भूमि और सम्बन्धित संसाधनों का समन्वित विकास एवं प्रबन्धन, महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता से समझौता किये बिना, न्यायसंगत तरीक़े से आर्थिक और सामाजिक कल्याण में वृद्धि कर सकता है.

यह जल प्रणालियों के प्रबन्धन में स्थानीय समुदायों, व्यक्तियों और संस्थानों को शामिल करने वाली एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया है.

उत्तरी मैसीडोनिया और ग्रीस की साझा झील, डोजरान इसका एक उत्तम उदाहरण है, जहाँ इस तरह के दृष्टिकोण, संरक्षण और बहाली को बढ़ावा दे रहे हैं.

एक अन्य उदाहरण सूडान है: 2020 में, यूनेप ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें यह पता बताया गया कि वहाँ के समुदाय, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल जल प्रबन्धन तकनीकों का किस तरह उपयोग कर रहे थे.

सतत जल प्रबन्धन से आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ प्राप्त होता है.
UNEP
सतत जल प्रबन्धन से आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ प्राप्त होता है.

पृष्ठभूमि

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा ने मार्च 2022 में झीलों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विकास योजनाओं में एकीकृत करते हुए झीलों की रक्षा, पुनर्बहाली व टिकाऊ उपयोग के लिये, देशों का आहवान करते हुए, स्थाई झील प्रबन्धन पर एक प्रस्ताव अपनाया.

वहीं नाइट्रोजन पर एक अलग प्रस्ताव के तहत, यूनेप से स्थाई नाइट्रोजन प्रबन्धन के लिये राष्ट्रीय कार्य योजनाओं के विकास में सदस्य देशों का समर्थन करने का अनुरोध किया गया है.

मीठे पानी पर यूनेप की गतिविधियाँ, एसडीजी 6 के अलावा जल-सम्बन्धित अनेक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्राप्ति और उनकी निगरानी में योगदान देती हैं.

उदाहरण के लिये: कृषि उत्पादन प्रणालियों पर एसडीजी 2.4 जो पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिये क्षमता मज़बूत करने में मदद करती है; पानी से सम्बन्धित आपदाओं के प्रभावों को कम करने पर एसडीजी 11.5; रसायनों और कचरे के ठोस प्रबन्धन पर एसडीजी 12.4; और स्थलीय और अन्तर्देशीय मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र और उनकी सेवाओं के संरक्षण, बहाली और सतत उपयोग पर एसडीजी 15.1.

एसडीजी 6 यानि एकीकृत जल संसाधन प्रबन्धन सहायता कार्यक्रम, एसडीजी संकेतक 6.5.1 के आधार पर, देशों में जल संसाधन प्रबन्धन कार्रवाई करने में सरकारों की मदद करता है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हो चुका है.

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