'कोविड-19 ने दहला देने वाली विषमताओं की गहरी व चौड़ी खाई बना दी है'

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बाशेलेट ने मंगलवार को कहा है कि मौजूदा कोविड-19 महामारी ने ऐसी दिल दहला देने वाली विषमताएँ पैदा करके उन्हें जारी रखा हुआ है जिनसे, दुनिया भर में सबसे कमज़ोर हालात वाले लोग सर्वाधिक प्रभावित हैं.

उन्होंने कोरोनावायरस की वैक्सीन उपलब्धता में और ज़्यादा एकजुटता व महामारी के बाद के समय के लिये आर्थिक पुनर्बहाली में मानवाधिकार केन्द्रित रुख़ अपनाए जाने का आहवान भी किया है.

मिशेल बाशेलेट ने, जिनीवा में मानवाधिकार परिषद को सम्बोधित करते हुए कहा कि न्याय, गुणवत्ता वाली शिक्षा, अच्छे स्तर वाले आवास यानि घर और अच्छे हालात व आय वाले रोज़गार जैसी बुनियादी स्वतंत्रताओं की उपलब्धता में देशों की नाकामी के कारण, आम लोगों व देशों की सहनक्षमता पर नकारात्मक असर पड़ा है.

झटके पर झटके

उन्होंने कहा कि इस स्थिति ने देशों की कमज़ोरियाँ, चिकित्सीय, आर्थिक और सामाजिक झटकों के लिये उजागर कर दी हैं. 

उन्होंने ध्यान दिलाते हुए ये भी कहा कि वर्ष 2020 में, लगभग 12 करोड़ अतिरिक्त आबादी, गम्भीर निर्धनता की चपेट में आ गई है.

मिशेल बाशेलेट ने इस सन्दर्भ में, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन (FAO) के कुछ आँकड़ों का भी ज़िक्र किया, जिनमें कहा गया है कि लगभग दो अरब 38 करोड़ लोग, खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं जोकि एक रिकॉर्ड संख्या है.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा, “अतीत में अनेक क्षेत्रों में हासिल की गई ठोस प्रगति, उलट रही है, और इनमें महिलाओं की समानता व अनेक नस्लीय और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों व आदिवासी लोगों के अधिकार भी शामिल हैं.”

उन्होंने कहा कि, “हमारे समाजों के सामाजिक ताने-बाने में दरारों का दायरा और ज़्यादा फैल रहा है” और धनी व निर्धन देशों के बीच गहरी खाई और भी ज़्यादा चौड़ी हो रही है और इन हालात में ज़्यादा हताशा व क्रूरता भी देखने को मिल रही है.

यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने कहा, “हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि देशों की आर्थिक पुनर्बहाली की योजनाएँ, मानवाधिकारों की बुनियाद पर टिकी हों, और उनके लिये सिविल सोसायटी के साथ सार्थक विचार - विमर्श किया जाए.”

वैक्सीन विषमता का संकट

यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने अनेक विकासशील देशों में कोरोनावायरस वैक्सीन और उपचार की कमी के मुद्दे पर, देशों से, टीकाकरण के लिये, एक साथ, एकजुटता में कार्रवाई करने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा कि आज के समय में, कुछ देशों में अस्पताल निष्क्रिय हो गए हैं, और मरीज़ों को ज़रूरी चिकित्सा नहीं मिल पा रही है, ऑक्सीजन की उपलब्धता लगभग पूरी तरह ख़त्म हो गई है.

नोबेल पुरस्कार विजेता और अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसल जोसेफ़ स्टिगलिश्ज़ ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कोविड-19 ने, वैश्विक अर्थव्यवस्ता की शीर्ष पर बैठे वर्ग को बहुत कम प्रभावित किया है, जबकि निचले पायदान पर स्थित वर्ग को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है. इसमें उनक रोज़गारों, स्वास्थ्य और उनके बच्चों की शिक्षा पर गम्भीर प्रभाव शामिल हैं.

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