कॉप26: जीवाश्म ईंधन से मुक्त वाहनों के युग पर चर्चा; जलवायु सम्मेलन के निष्कर्ष का मसौदा पेश

एक ऐसी दुनिया जहाँ बेचे जाने वाली हर कार, बस और ट्रक, बिजली-चालित व किफ़ायती हो, जहाँ जहाज़ केवल टिकाऊ ईंधन का इस्तेमाल करें, और जहाँ विमान हरित हाइड्रोजन के सहारे उड़ान भर सकें, ये विज्ञान की एक कल्पना सी प्रतीत होती है, मगर ग्लासगो में हो रहे कॉप26 सम्मेलन के दौरान, अनेक देशों की सरकारों व व्यवसायों ने कहा है कि उन्होंने इसे वास्तविकता में बदलने के लिये काम शुरू कर दिया है. 

कॉप26 सम्मेलन में बुधवार, घोषणाओं, वक्तव्यों और गठबन्धनों से भरा एक और दिन था. इस बार ध्यान परिवहन सैक्टर पर केन्द्रित था, जोकि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों के क़रीब एक-चौथाई हिस्से के लिये ज़िम्मेदार है. 

परिवहन सैक्टर से उत्सर्जन, वर्ष 1970 के बाद से अब तक दोगुना हो गया है और इसमें 80 प्रतिशत वृद्धि की वजह, सड़कों पर दौड़ने वाले वाहन हैं. 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के एक अनुमान के मुताबिक़, विश्व में परिवहन सैक्टर लगभग पूरी तरह जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर निर्भर है.

मगर, आने वाले दशकों में यह तस्वीर बदल सकती है.

ग्लासगो सम्मेलन में 100 से ज़्यादा देशों की सरकारों, शहरों, राज्यों और प्रमुख व्यवसायों ने ‘Glasgow Declaration on Zero-Emission Cars and Vans’ पर हस्ताक्षर किये हैं. 

इस घोषणापत्र का उद्देश्य, आन्तरिक दहन इंजन की बिक्री पर, अग्रणी बाज़ारों में वर्ष 2035 तक और दुनिया भर में 2040 तक रोक लगाना है.   

कम से कम 13 देशों ने जीवाश्म ईंधन से चलने वाले भारी वाहनों की बिक्री पर वर्ष 2040 तक रोक लगाने का संकल्प लिया है.

इसके समानान्तर, स्थानीय स्तर पर भी प्रयास जारी हैं. बोगोटा, क्वेन्का और सैल्वाडोर सहित अन्य लातिन अमेरिकी शहरों ने, वर्ष 2035 तक अपने सार्वजनिक परिवहन बेड़े के लिये शून्य-उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है. 

हरित जहाज़रानी उद्योग

200 से अधिक व्यवसायों ने, वर्ष 2030 तक जहाज़रानी मूल्य श्रृंखला में व्यवसायिक तौर पर शून्य-उत्सर्जन जहाज़ों और ईंधन को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है.

साथ ही उन्होंने देशों की सरकारों से उचित नियामक और बुनियादी ढाँचे सुनिश्चित करने का आग्रह किया है ताकि वर्ष 2050 तक न्यायोचित ढंग से लक्ष्यों तक पहुँचा जा सके.

अमेरिका के न्यू ओरलीन्स में एक मालवाहक जहाज़.
UN News/Daniel Dickinson
अमेरिका के न्यू ओरलीन्स में एक मालवाहक जहाज़.

इस बीच, 19 देशों ने ‘Clydebank Declaration’ घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसका उद्देश्य शून्य-उत्सर्जन वाले जहाज़ मार्गों की स्थापना को समर्थन देना है.

इसके तहत, इस दशक के मध्य तक कम से कम छह शून्य-उत्सर्जन समुद्री गलियारे (maritime corridors) सृजित किये जाएंगे, और 2030 तक इस संख्या को बढ़ाए जाने की योजना है. 

इन हरित गलियारों का अर्थ है कि दुनिया भर में सामानों की ढुलाई करने वाले जहाज़, हाइड्रोकार्बन ईंधन के बजाय, हरित हाइड्रोजन (green hydrogen) से प्राप्त ईंधन का इस्तेमाल करेंगे. इस हाइड्रोजन ईंधन का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा के ज़रिये किया जाएगा.

इसके अलावा, ऐमेज़ोन, यूनीलीवर आइकिया (IKEA) सहित नौ विशाल कम्पनियों ने, वर्ष 2040 तक समुद्री मार्ग से मालढुलाई को 100 फ़ीसदी शून्य-कार्बन से चालित किये जाने की घोषणा की है.

विमानन की चुनौती

विमानन उद्योग में व्यवसायों और कॉरपोरेट जगत के बड़े ग्राहकों ने स्वच्छ आकाश के लिये अपने गठबन्धन, ‘Clean Skies for Tomorrow Coalition’, में संशोधन करने की घोषणा की है. 

इस गठबन्धन का मिशन विमान-चालन के लिये टिकाऊ ईंधन के इस्तेमाल को रफ़्तार प्रदान करना है. 

80 हस्ताक्षरकर्ताओं ने वर्ष 2030 तक, वैश्विक स्तर पर विमान ईंधन की मांग को, 10 फ़ीसदी को हरित बनाए जाने का संकल्प लिया है. 

इन ‘हरित ईंधनों’ का उत्पादन, खाना पकाने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले तेल, घरों व व्यवसायों से निकलने वाले ठोस कचरे सहित अन्य साधनों से किया जाएगा. 

इस लक्ष्य की प्राप्ति से, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में एक वर्ष में छह करोड़ टन की कमी लाई जा सकेगी, और तीन लाख हरित रोज़गार सृजित होंगे. 

विश्व आर्थिक मंच में विमानन मामलों के प्रमुख लॉरेन उप्पिंक ने बताया कि भविष्य में, कम दूरी के उड़ानों के लिये, सौर व विद्युत ऊर्जा का भी इस्तेमाल किया जाना सम्भव हो सकता है.

घाना में खड़ा एक विमान
The World Bank/Arne Hoel
घाना में खड़ा एक विमान

उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि ऊर्जा मांग का एक छोटा हिस्सा, हाइड्रोजन व बैटरी जैसी नई टैक्नॉलॉजी पर निर्भर करेगा, मगर लम्बी दूरी की उड़ानों के लिये यह सम्भव नहीं है.

इसलिये, कार्बन पर निर्भरता कम करने और नैट शून्य कार्बन उत्सर्जन के समाधान के लिये टिकाऊ विमानन ईंधन ही एकमात्र समाधान हैं. 

कॉप26 समझौते का मसौदा जारी

परिवहन से इतर, सम्मेलन में एक बड़ी ख़बर, कॉप26 के अध्यक्ष द्वारा समझौते का मसौदा जारी किया जाना था, जोकि अन्तिम निष्कर्ष दस्तावेज़ की एक झलक पेश करता है. कॉप26 सम्मेलन शुक्रवार को समाप्त हो रहा है.

इस दस्तावेज़ में देशों से अपने राष्ट्रीय संकल्पों को मज़बूत बनाने और वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर केन्द्रित अपनी नैट-शून्य कार्बन उत्सर्जन रणनीतियों को 2022 तक भेजने का आग्रह किया गया है.

इसमें पहली बार, एक कॉप सम्मेलन के नतीजे पर केन्द्रित पंक्तियाँ भी शामिल की गई हैं, ‘हानि व क्षति’ का उल्लेख है और जीवाश्म ईंधन को मिलने वाली सब्सिडी का अन्त करने की पुकार लगाई गई है. 

कॉप26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने वार्ताकारों को बताया, “दुनिया की आँखें हम पर लगी हुई हैं. इसलिये, मैं आपसे चुनौतियों का सामना करने के लिये कहूंगा.”

उन्होंने कहा कि सभी जलवायु वार्ता की गति को तेज़ करना चाहते हैं और उनकी मंशा कॉप26 सम्मेलन को शुक्रवार को ही समाप्त करना है. 

आमतौर पर, कॉप26 सम्मलेन के दौरान वार्ता, आधिकारिक रूप से घोषित अन्तिम दिन के बाद तक खिंचने के लिये जानी जाती हैं.  

इसके बाद, आलोक शर्मा ने पत्रकारों को बताया कि समझौते के मसौदे में देशों की ओर से आने वाले सुझावों के अनुरूप बदलाव होते रहेंगे, मगर जलवायु कार्रवाई में तेज़ी लाने के लिये संकल्प, अविचल होना चाहिये.

बांग्लादेश के एक पूर्वी इलाक़े में एक ईंट भट्टे की चिमनी से निकलता काला धुँआ. इस भट्टे में, ईंटें पकाने के लिये कोयले का इस्तेमाल होता है.
UNICEF/Shehzad Noorani
बांग्लादेश के एक पूर्वी इलाक़े में एक ईंट भट्टे की चिमनी से निकलता काला धुँआ. इस भट्टे में, ईंटें पकाने के लिये कोयले का इस्तेमाल होता है.

उन्होंने स्पष्ट किया कि पेरिस जलवायु समझौते को फिर से खोले जाने का प्रयास नहीं हो रहा है.

“पेरिस समझौते में, स्पष्टता से तापमान वृद्धि का लक्ष्य दो डिग्री से कम रखने और 1.5 डिग्री के लिये प्रयास करने की बात कही गई है.” 

उन्होंने कहा कि कॉप26 अध्यक्ष के रूप में, वह पेरिस के तीन मुख्य स्तम्भों पर आधारित रास्ता तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं: वित्त पोषण, अनुकूलन, कार्बन उत्सर्जन में कटौती.

आलोक शर्मा ने माना कि समझौते के अन्तिम मसौदे पर सहमति बना पाना, चुनौतियों भरा है, मगर एक महत्वाकांक्षी नतीजे के अभाव मे बड़े जोखिम निहित हैं. 

उन्होंने आगाह किया कि वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी अनेक देशों के लिये मृत्युदण्ड के समान है.

‘खोखले शब्द’

वहीं नागरिक समाज संगठन Climate Action Network के सदस्यों ने मसौदे में पहली बार ‘हानि व क्षति’ का उल्लेख किये जाने का स्वागत किया है, मगर महज़ शब्दों को अपर्याप्त बताया है. 

एक्शन एड इण्टरनेशनल की जलवायु नीति समन्वयक टेरेसा एण्डरसन ने कहा कि इनसे समुदायों, लघु किसानों, महिलाओं व लड़कियों के लिये कोई बदलाव नहीं आएगा.

इस मसौदे से उन लोगों को कुछ हासिल नहीं होगा जोकि घातक बाढ़, चक्रवाती तूफ़ानों, सूखे और बढ़ते समुद्री जलस्तर से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं. 

जलवायु आपदाओं के कारण भारी संख्या में लोगों के घर क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं.
IOM/Monica Chiriac
जलवायु आपदाओं के कारण भारी संख्या में लोगों के घर क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं.

उन्होंने क्षोभ व्यक्त करते हुए इस मसौदे को खोखला क़रार दिया और कहा कि हालात के मद्देनज़र तात्कालिकता की बात तो की जा रही है, मगर कार्रवाई के लिये वास्तविक संकल्प नज़र नहीं आता है.

बुधवार को, ग्रेटा थनबर्ग सहित अन्य युवा जलवायु कार्यकर्ताओं ने ट्विटर पर घोषणा की है कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को एक याचिका भेजकर, महासचिव से पूर्ण प्रणाली के स्तर पर जलवायु आपात हालात घोषित किये जाने का आग्रह किया है. 

उनके मुताबिक़ इस घोषणा के ज़रिये, संसाधन व कर्मचारी, को उन देशों के लिये रवाना किया जा सकेंगे, जो जलवायु आपदाओं का सबसे ज़्यादा जोखिम झेल रहे हैं. 

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