कॉप26: जलवायु संकट से सर्वाधिक प्रभावितों में महिलाएँ, चुकाती हैं एक बड़ी क़ीमत

स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में कॉप26 सम्मेलन के दौरान मंगलवार को, जलवायु परिवर्तन से महिलाओं पर होने वाले असर व जलवायु कार्रवाई में उनकी ज़रूरतों को समाहित किये जाने के मुद्दे पर चर्चा हुई. प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख में महिलाओं व लड़कियों के ज्ञान की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, और उनमें निवेश के ज़रिये, पूर्ण समुदायों तक लाभ पहुँचाया जा सकता है. इस बीच, एक नया विश्लेषण दर्शाता है कि कॉप26 में विश्व नेताओं की घोषणाओं के बावजूद, दुनिया विनाशकारी तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रही है.

अमाल नाम की एक विशालकाय कठपुतली, एक युवा सीरियाई शरणार्थी लड़की को दर्शाती है, जोकि योरोप में आठ हज़ार मील की लम्बी दूरी “पैदल चलकर” तय करने के बाद, कॉप26 में ‘महिला दिवस’ के लिये सही समय पर ग्लासगो पहुँची. 

साढ़े तीन मीटर लम्बी इस कलाकृति ने जब मंच पर पहुँच कर, समोआ की जलवायु कार्यकर्ता ब्रियेना फ्रुएन को गले लगाया और उपहारों का आदान-प्रदान किया, तो वहाँ मौजूद प्रतिनिधि हैरान रह गए.

ब्रियेना ने अमाल को, आशा व प्रकाश का परिचायक एक फूल भेंट किया, जबकि अमाल ने इसके बदले में बीजों से भरा एक थैला सौंपा. 

समोआ की जलवायु कार्यकर्ता ने अपने सम्बोधन में कहा कि उन दोनों ने अलग-अलग जगहों से यहाँ तक की यात्रा की है, मगर वे दोनों एक ऐसे विश्व में रहते हैं जहाँ व्यवस्थागत ढंग से महिलाओं और लड़कियों को हाशिये पर धकेला जाता है.  

युवा कार्यकर्ता ने प्रतिभागियों को ध्यान दिलाया कि जलवायु आपात स्थिति के कारण पहले से मौजूद विषमताएँ और बढ़ती हैं, और इसकी एक बड़ी क़ीमत, अक्सर महिलाओं को ही चुकानी पड़ती है.

ब्रियेना फ़्रुएन ने ज़ोर देकर कहा कि बीजों को पानी देने और उन्हें पोषित करने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें पुष्पित व फलदार बनाया जा सके. उन्होंने इस क्रम में, प्रतिनिधियों से, सम्मेलन समाप्त हो जाने के बाद भी अपना कार्य जारी रखने का आग्रह किया है. 

महिला समानता व जलवायु संकट

कॉप26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा, “आज लैंगिक दिवस है, चूँकि लैंगिकता व जलवायु आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं.” 

उन्होंने महिलाओं का सशक्तिकरण किये जाने का आग्रह करते हुए कहा कि, “जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का महिलाओं व लड़कियों पर विषमतापूर्ण असर होता है.”

सोमालिया में सूखे की घटनाओँ से खाद्य सुरक्षा पर भीषण असर हुआ है और महिलाओं के यौन शोषण का जोखिम बढ़ा है.
IOM/Celeste Hibbert
सोमालिया में सूखे की घटनाओँ से खाद्य सुरक्षा पर भीषण असर हुआ है और महिलाओं के यौन शोषण का जोखिम बढ़ा है.

बताया गया है कि जलवायु आपदाओं और बदलावों के कारण विस्थापित होने वाले लोगों में, 80 प्रतिशत महिलाएँ हैं.

महिलाएँ सदियों से अपने समुदायों के कल्याण व टिकाऊ विकास के साथ-साथ पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्रों, जैविक विविधता व प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख में अहम योगदान देती रही हैं. 

विकासशील देशों में पर्यावरणीय पूंजी के प्रबन्धन में महिलाएँ अक्सर पहली पाँत में खड़ी हैं. 

भोजन व साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था के लिये जल भरकर लाने, मवेशियों के लिये भूमि का इस्तेमाल करने, ईंधन के लिये लकड़ी एकत्र करने से लेकर अन्य ज़िम्मेदारियों को निभाने में, महिलाएँ दैनिक जीवन में प्राकृतिक संसाधनों व पारिस्थितिकी तंत्रों के सम्पर्क में आती हैं.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और अन्य यूएन एजेंसियों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव भी, पहले महिलाएँ ही अनुभव करेंगी, जब उहें अपनी पारिवारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये लम्बी-लम्बी दूरियाँ तय करनी होंगी.

इसके बावजूद, पृथ्वी के संरक्षण और विकास में महिलाओं के योगदान की सीमित रूप से ही पहचान की गई है.

भेदभावपूर्ण सामाजिक व सांस्कृतिक मानकों, जैसेकि भूमि, जल व अन्य संसाधनों तक असमान सुलभता, और प्रकृति के प्रबन्धन व नियोजन की निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी का अभाव है. 

यह “न्याय” का विषय है

अमेरिका की हाउस स्पीकर (प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष) नैन्सी पेलोसी ने कॉप26 प्रतिनिधियों को अपने सम्बोधन में कहा, “तेज़ी से बदली जलवायु से निपटा जाना, न्याय और समानता का मामला है: सर्वाधिक निर्बल और सर्वाधिक प्रभावित, जिनमें आदिवासी समुदाय, कम विकसित देश और आज व हमेशा हमारी चर्चा में रहने वालीं: महिलाएँ.”

वियतनाम में महिलाएँ धान की फ़सल को अपनी साइकिल पर लाद कर ले जा रही हैं.
UNDP/Ho Ngoc Son
वियतनाम में महिलाएँ धान की फ़सल को अपनी साइकिल पर लाद कर ले जा रही हैं.

उन्होंने बताया कि कॉप26 में हिस्सा लेने के लिये, वह अमेरिकी संसद के अब तक के सबसे बड़े प्रतिनिधिमण्डल को अपने साथ वहाँ लाई हैं. 

स्पीकर पेलोसी ने घोषणा की है कि इस वर्ष के अन्त तक, अमेरिकी कांग्रेस की अन्तरराष्ट्रीय जलवायु वित्त पोषण को दोगुना करने के लिये क़ानून को मंज़ूरी देने की योजना है.   

उन्होंने अपने प्रतिनिधिमण्डल में शामिल महिला सदस्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं को साथ लेकर, बेहतर पुनर्बहाली सुनिश्चित की जानी होगी. 

जलवायु परिवर्तन का महिलाओं पर असर

इमैक्युलेटा कासीमेरो, गयाना की एक आदिवासी कार्यकर्ता हैं और जलवायु परिवर्तन के महिलाओं पर हो रहे प्रभावों को बख़ूबी समझती हैं.

यही वजह है कि वह अपने समुदाय में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिये प्रयासरत हैं. 

उन्होंने यूएन न्यूज़ के साथ एक इण्टरव्यू में बताया, “हम प्रशिक्षण सत्र आयोजित करते हैं, चूँकि हम नेतृत्व पदों पर ज़्यादा महिलाओं को देखना चाहते हैं. सामुदायिक स्तर पर, अधिकाँं समय केवल पुरुष ही होते हैं.”

“यह पितृसत्ता है और इसे तोड़े जाने की ज़रूरत है.”

इमैक्युलेटा कासीमेरो ने आदिवासी महिलाओं की भूमिका को भी रेखांकित करते हुए कहा कि भावी पीढ़ियों के लिये वे पारम्परिक ज्ञान की वाहक हैं, और जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में उनकी अहम भूमिका है. 

उन्होंने चिन्ता जताई कि जलवायु संकट उनके समुदाय को प्रभावित कर रहा है, और इस वर्ष भीषण व अनपेक्षित वर्षा के कारण, कई हैक्टेयर कसावा की फ़सल बर्बाद हो गई है, जोकि उनकी आय का मुख्य स्रोत है.

गयाना में आदिवासी समुदाय की इमैक्युलेटा कासीमेरो अपने समुदाय में महिला सशक्तिकरण के लिये प्रयासरत हैं.
UN News/Laura Quinones
गयाना में आदिवासी समुदाय की इमैक्युलेटा कासीमेरो अपने समुदाय में महिला सशक्तिकरण के लिये प्रयासरत हैं.

इन हालात में उनके समुदाय के लिये खाद्य असुरक्षा की स्थिति पैदा हो गई है.

वहीं विश्व के एक दूसरे हिस्से में, सामी आदिवासी समुदाय को भी जलवायु चुनौती का सामना प्रत्यक्ष रूप से करना पड़ रहा है. ये समुदाय नॉर्वे, स्वीडन, फ़िनलैण्ड में बसा है. 

समुदाय की युवा कार्यकर्ता माजा क्रिस्टीन जामा ने आदिवासी समुदाय के पैवेलियन से अपनी बात रखी. 

“आर्कटिक में जलवायु परिवर्तन बहुत तेज़ गति से हो रहा है. जलवायु बदल रही है और बेहद अस्थिर है, हमारी सर्दियाँ अस्थिर हैं, पानी को जब जमना चाहिये, वो नहीं जमता है.”

“भूदृश्य का प्रबन्धन किस तरह किया जाए, इसके लिये हमारा सारा पारम्परिक ज्ञान भी बदल रहा है.”

विज्ञान का स्पष्ट सन्देश

कॉप26 में मंगलवार को ‘विज्ञान दिवस’ भी था, और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने कार्बन उत्सर्जन के सम्बन्ध में अपनी नवीनतम ‘Emissions Gap’ रिपोर्ट और सम्मेलन में अब तक लिये गए संकल्पों के आधार पर जलवायु कार्रवाई का एक ख़ाका पेश किया.

यूएन एजेंसी की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐण्डरसन ने कहा कि यह स्पष्ट है कि पर्याप्त उपाय नहीं किये जा रहे हैं.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अभी और ज़्यादा कार्रवाई, तात्कालिकता व महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है.

साथ ही नेतृत्व के अभाव को भी सम्मेलन के समाप्त होने से पहले दूर किया जाना होगा.

काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में तूफ़ान से तबाह हुए स्कूल के बाहर खड़ी छात्राएँ.
© UNICEF/Nicolas Rice-Chudeau
काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में तूफ़ान से तबाह हुए स्कूल के बाहर खड़ी छात्राएँ.

कॉप26 की शुरुआत से पहले जारी, यूएन एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि देशों की संशोधित राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं (Nationally Determined Contributions / एनडीसी) से, पिछले संकल्पों की तुलना में, 2030 तक वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में केवल 7.5 प्रतिशत की ही अतिरिक्त गिरावट होगी. 

जबकि वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम तक सीमित रखने के लिये, ग्रीनहाउस उत्सर्जनों में 55 प्रतिशत की कटौती की आवश्यकता होगी. 

यूएन एजेंसी ने मंगलवार को किये अपने विश्लेषण के बाद बताया कि कॉप26 में लिये गए संकल्पों के बावजूद, दुनिया इस सदी में वैश्विक तापमान में चिन्ताजनक वृद्धि की ओर बढ़ रही है.   

यूएन एजेंसी की शीर्ष अधिकारी ने सचेत किया कि यह देखना सुखद नहीं है कि संकल्प, आमतौर पर अस्पष्ट हैं, अपारदर्शी हैं, कुछ ग्रीनहाउस गैसों के सम्बन्ध में हैं, जबकि अन्य महज़ कार्बन की बात करते हैं.

उन्होंने कहा कि कुछ संकल्पों की गणना मुश्किल है और बहुत से संकल्पों को तो 2030 के बाद तक के लिये टाल दिया गया है.

Share this story