कॉप26: एसडीजी या एनडीसी? कठिन शब्दावली, सरल भाषा में...

यदि आप, संयुक्त राष्ट्र के कामकाज या विभिन्न यूएन एजेंसियों की गतिविधियों के बारे में दिलचस्पी रखते हैं, तो आपने शब्द समूहों के अनेक संक्षिप्त रूपों, तकनीकी भाषा और शब्दावली का बहुत अधिक इस्तेमाल होते हुए भी देखा होगा. वार्षिक यूएन जलवायु सम्मेलन और उसका संक्षिप्त रूप, यानि कॉप26 इसी की एक बानगी है. जलवायु मुद्दे पर इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान, आपको ऐसे ही अनेक अन्य शब्दों से दो-चार होना पड़ सकता है. इसलिये, हमने प्रचलित शब्दावली को सरल बनाने का प्रयास किया है...

कॉप26 (COP26)

आइये, शुरुआत, यूएन सम्मेलन के नाम, कॉप26, से ही करते हैं. आसान शब्दों में, इसे संयुक्त राष्ट्र का 26वाँ जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कहा जाता है, मगर आधिकारिक तौर पर, यह जलवायु परिवर्तन पर यूएन फ़्रेमवर्क सन्धि (UNFCCC) के सम्बद्ध पक्षों (Conference of the Parties/COP) का 26वाँ सम्मेलन है.

इसे थोड़ा और ज़्यादा समझते हैं...

वर्ष 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जैनेरियो में पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर यूएन पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) के बाद, UNFCCC संस्था स्थापित की गई थी.

UNFCCC को घोषित लक्ष्य, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती लाना है ताकि मानवीय गतिविधियों की वजह से होने वाले जलवायु परिवर्तन के ख़तरनाक दुष्प्रभावों की रोकथाम की जा सके. 

सन्धि के सम्बद्ध पक्षों के सम्मेलन, या COPs, औपचारिक बैठकें हैं जिन्हें वर्ष 1995 से, हर साल आयोजित किया जाता रहा है. हालाँकि, वर्ष 2020 इसका एक अपवाद है चूँकि कोविड-19 महामारी के कारण कॉप26 के आयोजन में एक वर्ष की देरी हुई है. 

एसडीजी (SDG)

ये टिकाऊ विकास (sustainable development) पर आधारित 17 लक्ष्य (goals) हैं, जोकि आपस में जुड़े हुए हैं.

2030 एजेण्डा के तहत निर्धारित इन लक्ष्यों के ज़रिये, स्वच्छ ऊर्जा, निर्धनता उन्मूलन, भुखमरी, लैंगिक भेदभाव, टिकाऊ खपत जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने का प्रयास किया जा रहा है. 

टिकाऊ विकास के लिये 2030 एजेण्डा, संयुक्त राष्ट्र का एक ऐसा ब्लूप्रिण्ट है जिसका महत्वाकांक्षी लक्ष्य, पृथ्वी और मानवता के लिये शान्ति व समृद्धि सुनिश्चित करना है. 

जलवायु परिवर्तन, इनमें से ही एक लक्ष्य (SDG13) है, मगर यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अनेक टिकाऊ विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में जलवायु परिवर्तन की एक अहम भूमिका है.

जलवायु संकट की चुनौती का सामना किये बिना, 2030 एजेण्डा प्राप्ति असम्भव प्रतीत होती है.

एनडीसी (NDC)

एनडीसी यानि राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution). ये देशों द्वारा राष्ट्रीय स्तर की जलवायु कार्रवाई योजनाएँ हैं, जो पैरिस समझौते के तहत तैयार की गई हैं.

इनके ज़रिये, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती के उपाय साझा किये जाते हैं. बताया गया है कि हर देश अपने एनडीसी को ज़्यादा महत्वाकांक्षी बनाने के लिये उनमें संशोधन कर रहा है.

मगर, फ़िलहाल ये योजनाएँ, पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिये पर्याप्त नहीं हैं.

इसलिये. इस वर्ष देशों पर अपनी महत्वाकांक्षाओ का स्तर बढ़ाने के लिये दबाव बढ़ रहा है.

नैट शून्य (Net Zero) उत्सर्जन

आसान शब्दों में, नैट शून्य का अर्थ है वातावरण में उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाउस गैस की कुल मात्रा और कार्बन उत्सर्जन में कटौती की मात्रा में सन्तुलन. यानि जितनी मात्रा उत्सर्जित हो, उतनी ही मात्रा वातावरण से सोख ली जाए. 

इस क्रम में, हरित अर्थव्यवस्था, नवीकरणीय, स्वच्छ ऊर्जा, महासागरों और वनों की अहम भूमिका है. 

व्यवहारिक रूप से, लगभग हर देश, जलवायु परिवर्तन पर पैरिस समझौते का हिस्सा बन गया है, जिसका उद्देश्य, वैश्विक तापमान में वृद्धि को, पूर्व औद्योगिक काल के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है. 

जलवायु परिवर्तन की एक मुख्य वजह, वातावरण में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा का बढ़ना है और यदि यह रुझान जारी रहा तो, तो वैश्विक तापमान में होने वाली बढ़ोत्तरी 1.5 डिग्री सेल्सियम से अधिक होगी.

इससे ज़िन्दगियों और हर क्षेत्र में आजीविकाओं के लिये ख़तरें बढ़ जाएंगे.

यही वजह है कि वर्ष 2050 तक नैट शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने का संकल्प लेने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है. यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी है, जिसके लिये महत्वाकांक्षी जलवायु कार्रवाई और उपायों की आवश्यकता अभी है. 

1.5°C

कॉप सम्मेलन के दौरान अक्सर 1.5 डिग्री सेल्सियस का ज़िक्र होता सुनाई देगा.

वर्ष 2018 में, एक आईपीसीसी रिपोर्ट में दर्शाया गया था कि वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक ना बढ़ने देने से, जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी दुष्प्रभावों को टाला जा सकता है और पृथ्वी पर जीवन के लिये अनुकूल जलवायु सुनिश्चित की जा सकती है.

नवीनतम डेटा के अनुसार, पृथ्वी का तापमान, पूर्व-औद्योगिक काल (18वीं शताब्दी) की तुलना में पहले ही 1.06 से 1.26 डिग्री तक बढ़ चुका है.

अगर मौजूदा वादे पूरे कर भी लिये जाते हैं, तो भी हम इस सदी में 2.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की ओर बढ़ रहे होंगे. 

इसका अर्थ है, जलवायु विनाश, जैसाकि यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने भी आगाह किया है. अगर ऐसा हुआ तो, पारिस्थितिकी तंत्र ढह जाने और जीवन-यापन मुश्किल हो जाने की आशंका है. 

आईपीसीसी (IPCC)

जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी आयोग यानि आईपीसीसी (IPCC), जलवायु परिवर्तन के विषय में विज्ञान की समीक्षा के लिये यूएन की एक संस्था है. 

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने वर्ष 1988 में आईपीसीसी स्थापित किया था. 

आईपीसीसी का उद्देश्य है: जलवायु नीतियाँ तैयार करने में, सभी स्तरों पर देशों की सरकारों को वैज्ञानिक जानकारी व तथ्य मुहैया कराना है.  

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में भी आईपीसीसी रिपोर्टों की अहम भूमिका है, और कॉप26 के दौरान भी इन पर चर्चा होगी. 

इस वर्ष अगस्त में जारी एक रिपोर्ट दर्शाती है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य गैस) में त्वरित, सतत और व्यापक कटौती के अभाव में, वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी के लक्ष्य को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रख पाना मुश्किल हो जाएगा. 

एण्टीगा और बरबूडा में वर्ष 2017 में चक्रवाती तूफ़ान इरमा से हुई क्षति का एक हवाई दृश्य.
UN Photo/Rick Bajornas
एण्टीगा और बरबूडा में वर्ष 2017 में चक्रवाती तूफ़ान इरमा से हुई क्षति का एक हवाई दृश्य.

लघु द्वीपीय विकासशील देश (SIDS)

लघु द्वीपीय विकासशील देश (Small Island Developing States) यानि SIDS, 58 ऐसे देशों का समूह है जो निचले तटीय इलाक़ों में स्थित हैं. 

ये देश जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से बेहद सम्वेदनशील हैं और अक्सर उन्हें चरम मौसम की घटनाओं, जैसेकि चक्रवाती तूफ़ान, मूसलाधार बारिश, समुद्री जलस्तर में वृद्धि और महासागरीय अम्लीकरण, का सामना करना पड़ता है. 

हाल ही में यूएन महासभा सत्र के उच्चस्तरीय खण्ड के दौरान, SIDS समूह के फ़िजी, तुवालू, और मालदीव जैसे देशों ने दुनिया को जलवायु ख़तरों के प्रति आगाह करते हुए बताया कि अगर धनी देशों ने वैश्विक तापमान को सीमित रखने के लिये किये जा रहे वादे पूरे नहीं किये तो, उनके अस्तित्व के लिये ख़तरा पदा हो जाएगा. 

जलवायु वित्त पोषण 

मोटे तौर पर, जलवायु वित्त पोषण से तात्पर्य उस धनराशि से है, जिसे जलवायु परिवर्तन की वजह बनने वाले कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर केन्द्रित विविध गतिविधियों में ख़र्च किया जाना है. 

साथ ही, इसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को झेल रहे समुदायों की सहनक्षमता को मज़बूती देने के लिये व्यय किया जाएगा. 

इस क्रम में, स्थानीय, राष्ट्रीय और पार-देशीय वित्तीय संसाधन उपयोग में लाए जा सकते हैं और सार्वजनिक, निजी और वैकल्पिक स्रोतों से प्रबन्ध किया जाता है. 

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिये जलवायु वित्त पोषण महत्वपूर्ण है, चूँकि कार्बन उत्सर्जनों में कमी लाने के लिये व्यापक-स्तर पर निवेश किये जाने की आवश्यकता है.

मुख्य रूप से उन सैक्टरों में जहाँ बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है. इसके समानान्तर अनुकूलन प्रयासों को भी सहायता दी जानी ज़रूरी है. 

वर्ष 2009 में, कोपनहेगन में कॉप15 के दौरान, धनी देशों ने वर्ष 2020 तक विकासशील देशों के लिये, वार्षिक 100 अरब डॉलर उपलब्ध कराए जाने का वादा किया था. इसका उद्देश्य, उन्हें जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उपायों में मदद करना और वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को टालने के इन्तज़ाम करना है. 

लेकिन यह वादा अभी पूरा नहीं किया गया है. विकासशील देशों के लिये फ़िलहाल जलवायु वित्त पोषण 80 अरब डॉलर आँका गया है, जिसके मद्देनज़र, कॉप26 के दौरान जलवायु वित्त पोषण, विचार-विमर्श का एक बड़ा मुद्दा होगा. 

एसबीटीआई (SBTi)

एसबीटीआई से मन्तव्य, संयुक्त राष्ट्र समर्थित ‘विज्ञान आधारित लक्ष्य पहल’ Science Based Target initiative से है. इस पहल में शामिल होने वाली कम्पनियाँ, विज्ञान-आधारित उत्सर्जन कटौती लक्ष्य हासिल करने का संकल्प लेती हैं.

इससे उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये बेहतर ढंग से तैयार होने में मदद मिलती है, और नैट-शून्य अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने में, वे ज़्यादा प्रतिस्पर्धात्मक हो जाती हैं. 

विज्ञान-आधारित लक्ष्यों को स्थापित किया जाना अब एक मानक व्यावसायिक चलन बनता जा रहा है. 

वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती लाने और देशों द्वारा लिये गए संकल्पों की प्राप्ति में कॉरपोरेशन, एक अहम भूमिका निभा रहे हैं. 

प्रकृति-आधारित समाधान

प्राकृतिक और संशोधित पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण, टिकाऊ प्रबन्धन और पुनर्बहाली के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों के तहत कार्रवाई की जाती है. 

संयुक्त राष्ट्र, जलवायु परिवर्तन से मुक़ाबला करने के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा दे रहा है.
UNFCCC
संयुक्त राष्ट्र, जलवायु परिवर्तन से मुक़ाबला करने के लिये प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा दे रहा है.

इसके ज़रिये, पर्यावरणीय चुनौतियों का कारगर ढंग से मुक़ाबला किया जाता है और मानव स्वास्थ्य व जैवविविधता से प्राप्त होने वाला लाभ भी सुनिश्चित किया जाता है.  

प्रकृति-आधारित समाधान, जलवायु परिवर्तन पर पैरिस समझौते के लक्ष्यों को पाने के लिये वैश्विक प्रयासों का एक अहम घटक हैं. 

कार्बन पर निर्भरता घटाने, जलवायु जोखिमों को कम करने और जलवायु सहनशील समाजों को स्थापित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है.  

इन समाधानों के कुछ उदाहरण: व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम, जिनसे कार्बन सोख़ने में मदद मिलती है और भीषण वर्षा से रक्षा होती है. 

साथ ही, मैनग्रोव पुनर्बहाली की मदद से, तटीय बाढ़ और किनारों के क्षरण के विरुद्ध कारगर व कम लागत पर प्राकृतिक अवरोध स्थापित किये जा सकते हैं.  

जी20 (G20)

जी20 समूह एक अन्तर-सरकारी फ़ोरम है, जोकि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से मिलकर बनी है. इसमें 19 देश और योरोपीय संघ शामिल है. 

यह समूह, वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों, जैसेकि अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता, कार्बन उत्सर्जन में कटौती और टिकाऊ विकास, पर चर्चा व कार्रवाई के लिये साथ मिलकर कार्य करता है.

यूएन महासचिव ने स्पष्ट किया है कि जलवायु कार्रवाई की अगुवाई जी20 देशों द्वारा की जानी होगी, जोकि सामूहिक रूप से विश्व का 90 फ़ीसदी सकल विश्व उत्पाद, 75-80 प्रतिशत अन्तरराष्ट्रीय व्यापार और दो-तिहाई विश्व आबादी के लिये ज़िम्मेदार हैं.

कॉप26 सम्मेलन के दौरान, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती लाने व जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिये, उनके संकल्प और उन पर अमल, महत्वपूर्ण होंगे. 

एजीएन (AGN)

जलवायु परिवर्तन पर वार्ताकारों का अफ़्रीकी समूह, जर्मनी के बर्लिन में वर्ष 1995 में कॉप1 के दौरान गठित किया गया था. 

इसे अफ़्रीकी सदस्य देशों के एक ऐसे गठबन्धन के रूप में स्थापित किया गया था, जोकि अन्तरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में, साझा और एकजुट आवाज़ में, क्षेत्र के हितों का प्रतिनिधित्व करता है.

जीसीएए (GCAA)

औपचारिक अन्तर-सरकारी वार्ताओं से इतर, देश, शहर, क्षेत्र, व्यवसाय और नागरिक समाज के सदस्य, दुनिया भर में जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ा रहे हैं. 

वैश्विक जलवायु कार्रवाई एजेण्डा (Global Climate Action Agenda / GCAA), लीमा पैरिस कार्रवाई एजेण्डा के तहत शुरू किया गया था.

इसका उद्देश्य, जलवायु कार्रवाई में तेज़ी लाना, सरकारों, स्थानीय प्रशासनों, व्यवसायिक समुदायों, निवेशकों और नागरिक समाज के बीच सहयोग को मज़बूती देना और पैरिस समझौते को लागू करने की प्रक्रिया को समर्थन देना है. 

Share this story