कॉप26: अन्तिम चरण की वार्ता का दौर खिंचा, निर्धारित अवधि से लम्बा

स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में संयुक्त राष्ट्र का 26वाँ वार्षिक जलवायु सम्मलेन (कॉप26) शुक्रवार को समाप्त होना था, मगर निर्धारित समय पर ख़त्म होने के बजाय अन्तिम चरण की वार्ताओं का दौर अभी जारी है. 

विश्व नेता और वार्ताकार, वैश्विक तापमान में विनाशकारी बढ़ोत्तरी को रोकने और निर्बल देशों की मदद के लिये उपायों पर सहमति बनाने की कोशिशों में जुटे हैं.

कॉप26 अध्यक्ष आलोक शर्मा ने शुक्रवार को बताया कि कुछ अहम मुद्दों पर अभी सहमति नहीं बन पाई है.

उन्होंने प्रतिनिधियों को जानकारी देते हुए कहा, “यह इतिहास में हमारा सामूहिक क्षण है, यह हमारे लिये एक ज़्यादा स्वच्छ, ज़्यादा स्वस्थ और ज़्यादा समृद्ध विश्व को आकार देने का अवसर है.”

कॉप26 अध्यक्ष के मुताबिक़ यह समय उन ऊँची महत्वाकांक्षाओं को पूरी करने का भी है, जिनकी रूपरेखा, सम्मेलन की शुरुआत पर नेताओं ने पेश की थी. 

जलवायु कार्रवाई के लिये वित्तीय संसाधनों का प्रबन्ध और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली क्षति से प्रभावित देशों की मदद, ये कुछ ऐसे अहम मुद्दे हैं, जिन पर फ़िलहाल अभी सहमति नहीं बन पाई है. 

बताया गया है कि जलवायु वित्त पोषण और ‘हानि व क्षति’ (loss and damage) के मुद्दों पर, मंत्रियों की बातचीत, देर रात तक चली थी, और जल्द ही एक अन्तिम समझौते को रूप दिये जाने के लिये प्रयास किये जा रहे हैं.

सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों ने पुरज़ोर आवाज़ में अपनी बात सामने रखते हुए मांग की है कि महज़ कोयले पर निर्भरता के अन्त के बजाय, सभी प्रकार के जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर रोक लगाया जाना, इस समझौते में शामिल किया जाना चाहिये. 

फ़िलहाल समझौते के प्रस्तावित मसौदे के अनुसार, “सम्बद्ध पक्ष निम्न-उत्सर्जन ऊर्जा प्रणालियों की ओर बढ़ने के लिये, टैक्नॉलॉजी के विकास, तैनाती व प्रसार, और नीतियाँ अपनाए जाने में तेज़ी लाएंगे.”

इसके तहत, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का स्तर तेज़ी से बढ़ाया जाएगा और निर्बाध ढंग से कोयला चालित बिजली के इस्तेमाल और जीवाश्म ईंधनों को दी जाने वाली सब्सिडी को चरणबद्ध ढंग से हटाने की प्रक्रिया में तेज़ी लाई जाएगी.

जीवाश्म ईंधन पर रोक की मांग

योरोपीय संघ के शीर्ष वार्ताकार ने कहा, “यह निजी है, यह राजनीति के बारे में नहीं है.”

उन्होंने कहा कि अगर देश सभी प्रकार के जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी का अन्त करने का स्पष्ट संकेत नहीं देते हैं, तो ग्लासगो में तय लक्ष्य पूरी तरह से बेअसर हो जाएंगे.

अमेरिका के जलवायु दूत, जॉन कैरी ने भी इस मुद्दे पर कहा कि इस प्रकार की सब्सिडी पर धन का व्यय, “मूर्खतापूर्ण” है.

“इन सब्सिडी को हटाना होगा. हम दुनिया में सबसे बड़े तेल व गैस उत्पादक हैं और हमारे पास भी इनमें से कुछ सब्सिडी हैं, और राष्ट्रपति बाइडेन ने उनसे निजात पाने के लिये क़ानून बनाया है.”

ग्लासगो सम्मेलन के ब्लू ज़ोन में एक समूह.
UN News/Laura Quinones
ग्लासगो सम्मेलन के ब्लू ज़ोन में एक समूह.

उन्होंने कहा कि अमेरिका को हर वर्ष धनराशि का प्रबन्ध करने मे मशक़्क़त करनी पड़ती है जबकि पिछले पाँच-छह सालों में ढाई हज़ार अरब डॉलर, जीवाश्म ईंधन के लिये सब्सिडी यानि अनुदान के रूप में गया है. 

“हम स्वयं उसी समस्या को पोषित कर रहे हैं, जिसका इलाज हम यहाँ ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं. इसका कोई अर्थ नहीं है.”

एक अन्य अनसुलझा मुद्दा, विकसित देशों द्वारा निर्बल देशों को जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली ‘हानि व क्षति’ से उबरने के लिये दी जाने वाली मदद का प्रस्ताव है.  

जलवायु चुनौती से निपटने के लिये मदद

विकासशील देशों के समूह, जी77 और चीन के प्रतिनिधियों ने गहरी निराशा जताई है कि इस विषय में ‘Glasgow Loss and Damage Facility’ स्थापित किये जाने का उनका प्रस्ताव, मसौदे में परिलक्षित नहीं हुआ है.

इसके अलावा, अनेक देशों ने वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्य को जीवित रखने और जलवायु वित्त पोषण के लिये ज़्यादा महत्वाकांक्षा दर्शाने के लिये दबाव बनाया है. 

सबसे कम विकसित देशों के समूह का नेतृत्व कर रहे भूटान के वार्ताकार ने कहा, “हम बड़ी उम्मीदों और अपेक्षाओं के साथ ग्लासगो आए थे, मगर कॉप26 के इस अन्तिम घण्टे में हमें कुछ संशय हैं.” 

उन्होंने बताया कि 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य, हानि व क्षति के मुद्दे पर और जलवायु वित्त पोषण के लिये समर्थन में रुकावटें नज़र आ रही हैं.  

विरोध प्रदर्शन

इससे पहले, दिन में नागरिक समाज संगठन, कॉप26 सम्मेलन के मुख्य कक्ष में एकत्र हो गए, जिसमें वार्ताकार, बातचीत की समीक्षा के लिये बैठे हुए थे. 

प्रतिनिधियों से कहा गया कि उन्होंने कोविड-19 महमारी के दौरान अपने प्रियजन को खोया है, या फिर जलवायु परिवर्तन के असर को महसूस किया है. 

इसके बाद अधिकतर प्रतिनिधि अपने स्थान पर खड़े हो गए.

आदिवासी समुदाय के संगठनों, महिला समूहों और अन्य प्रतिभागियों ने बैनर व तख़्तियाँ थामे हुए थे, उन्होंने जलवायु न्याय के लिये अपनी आवाज़ बुलन्द की और फिर बाहर चले गए, जहाँ बड़ी संख्या में अन्य प्रदर्शनकारी एकत्र थे.

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