एशिया-प्रशान्त: जल संकट, आर्थिक व सामाजिक प्रगति के लिये ख़तरा

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने आगाह किया है कि एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में, आबादी में तेज़ी से हो रही वृद्धि, ग़ैर-टिकाऊ खपत के रुझानों और ख़राब प्रबन्धन के कारण, स्वच्छ जल स्रोतों के लिये ख़तरा बढ़ रहा है. यूएन प्रमुख ने शनिवार को जापान के कुमामोतो शहर में आयोजित चौथे एशिया-प्रशान्त जल शिखर बैठक के लिये अपने वीडियो सन्देश में, जल संकट से निपटने के लिये तीन प्राथमिकताएँ पेश की हैं. 

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने जल के मुद्दे पर आयोजित शिखर बैठक को, टिकाऊ जगत के निर्माण की दिशा में जारी प्रयासों के लिये एक अहम पड़ाव क़रार दिया है.

यूएन प्रमुख ने कहा कि टिकाऊ विकास के हर एक पहलू के नज़रिये से जल अहम है.

“इसके बावजूद, हम एक बढ़ते हुए जल संकट का सामना कर रहे हैं और टिकाऊ विकास के छठे लक्ष्य से बुरी तरह दूर हैं.” 

उन्होंने सचेत किया कि दुनिया को जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता हानि और प्रदूषण, इन तीन बड़े संकटों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इन मूल्यवान संसाधनों पर गहरा दबाव पड़ रहा है.

एक अनुमान के अनुसार, विश्व की लगभग आधी आबादी को हर वर्ष कुछ अवधि के लिये जल क़िल्लत का सामना करना पड़ता है. 

“सूखा और ताप लहरें पहले से ज़्यादा गहन हो रहे हैं और उनकी आवृत्ति बढ़ रही है.”

समुद्री जलस्तर में वृद्धि के कारण धरातल की सतह के नीचे एकत्र और चट्टानों में से प्रवाहित जल (aquifers) का खारापन बढ़ रहा है.

साथ ही, बर्फ़ और हिमनदों के पिघलने से प्राप्त जलराशि की हानि से भी आपूर्ति प्रभावित हो रही है.

महासचिव गुटेरेश ने चिन्ता जताई कि एशिया-प्रशान्त में हालात विशेष रूप से कठिन हैं, जोकि विश्व में सबसे कम प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वाला क्षेत्र है.

“आबादी में तेज़ वृद्धि, ग़ैर-टिकाऊ खपत और ख़राब प्रबन्धन के कारण, इन सभी वजहों से क्षेत्र में स्वच्छ जल स्रोतों के लिये ख़तरा बढ़ रहा है.”

यूएन महासचिव ने सभी हिस्सेदारों से जलवायु कार्रवाई का स्तर व दायरा बढ़ाने और जल संसाधनों की टिकाऊ क्षमता बढ़ाने का आग्रह किया है.
UNDP Belarus
यूएन महासचिव ने सभी हिस्सेदारों से जलवायु कार्रवाई का स्तर व दायरा बढ़ाने और जल संसाधनों की टिकाऊ क्षमता बढ़ाने का आग्रह किया है.

यूएन के शीर्षतम अधिकारी ने ध्यान दिलाया कि जल क़िल्लत के कारण आर्थिक व सामाजिक प्रगति के लिये जोखिम पैदा होता है, मानवाधिकार कमज़ोर होते हैं और शान्ति व सुरक्षा के लिये ख़तरा उत्पन्न होता है. 

“जल संकट से निपटने के लिये एक समग्र, व्यवस्थागत और बहुपक्षीय जवाबी कार्रवाई की आवश्यकता है.”

तीन प्राथमिकताएँ

इस क्रम में, यूएन महासचिव ने अपनी तीन प्राथमिकताओं का खाका पेश किया है:

पहला, अतिरिक्त वित्त पोषण 

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिये अनुकूलन व कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिये सार्वजनिक, निजी व मिश्रित वित्त पोषण को नाटकीय ढँग से बढ़ाया जाना होगा.

इसके साथ-साथ ज़रूरी तैयारी व टिकाऊ जल प्रबन्धन पर ध्यान केंद्रित करना होगा और विकासशील देशों की आवश्यकताओं को पूरा किया जाना होगा. 

दूसरा, बेहतर सहयोग

यूएन प्रमुख ने कहा कि जल संकट व जलवायु परिवर्तन से निपटने और सहनक्षमता बढ़ाने के लिये समन्वित व एकजुट ढँग से कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता है. 

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि राष्ट्रों, समुदायों व घर-परिवारों की जल सम्बन्धी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये सभी पक्षकारों व सैक्टरों को साथ मिलकर काम करना होगा.

तीसरा, त्वरित कार्रवाई

यूएन प्रमुख ने ध्यान दिलाया कि दुनिया, टिकाऊ विकास के लिये जल पर कार्रवाई के अन्तरराष्ट्रीय दशक के पाँच साल पूरे करने जा रही है.

अगले मार्च में, संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जोकि 1970 के दशक के बाद से यूएन का पहला जल सम्मेलन होगा. 

इस सम्मेलन के ज़रिये नीतिगत सम्वाद को आगे बढ़ाने, सर्वोत्तम उपायों के आदान-प्रदान और साझीदारियों को गढ़ने का प्रयास किया जाएगा.

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