एशिया-प्रशान्त: जटिल संकटों से निपटने के लिये कारगर रणनीति का आहवान

एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के लिये संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवँ सामाजिक आयोग (UNESCAP) की एक समिति की बैठक में देशों की सरकारों से बीमारियों, आपदाओं व जलवायु परिवर्तन के तिहरे संकटों से निपटने के लिये प्रयासों में तेज़ी लाने का आहवान किया गया है. 

थाईलैण्ड की राजधानी बैन्कॉक में आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर गठित समिति के सातवें सत्र की बैठक में आगाह किया गया है कि क्षेत्र में स्थित देश, आपस में जुड़े हुए संकटों का सामना कर रहे हैं. 

इन जोखिमों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय आबादियों व अर्थव्यवस्थाओं की सहनक्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ जटिल संकटों से निपटने की तैयारी भी की जानी होगी. 

यूएन आर्थिक एवँ सामाजिक आयोग की कार्यकारी सचिव आर्मिदा सालसाहिया अलिसजबाना ने सचेत किया कि कोविड-19 महामारी ने दर्शाया है कि लगभग सभी देश, आपस में गुंथे, विविध संकटों का सामना करने के लिये तैयार नहीं हैं. 

उन्होंने ध्यान दिलाया कि अक्सर एक संकट, दूसरे संकट के उपजने की वजह बन जाता है. 

“चक्रवाती तूफ़ान, उदाहरणस्वरूप, बाढ़ की वजह बन सकते हैं, जिससे बीमारियाँ पैदा हो सकती हैं, जो कि निर्धनता को और भी गहरा कर सकती हैं.”

अपने सम्बोधन में यूएन संगठन की कार्यकारी सचिव ने बढ़ती निर्धनता व विषमता, और महामारी द्वारा उजागर की गई कमज़ोरियों से निपटने के लिये सार्वभौमिक सहनक्षमता की अहमियत को रेखांकित किया है. 

उन्होंने कहा कि आपदा जोखिम प्रबन्धन में कामकाज के तरीक़ों में मूलभूत परिवर्तन लाना होगा और इस क्रम में, आपदाओं की रोकथाम व सहनक्षमता के निर्माण को सुनिश्चित किया जाना ज़रूरी है.

वैश्विक महामारी की शुरुआत से ही, एशिया-प्रशान्त क्षेत्र अनेक प्राकृतिक व जैविक आपदाओं से पीड़ित रहा है.

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी जारी है, जिससे ऐसी अनेक आपदाओं के प्रभाव और भी गहरे हो रहे हैं. 

बढ़ते जोखिम

इसी सत्र के दौरान, Asia-Pacific Disaster Report 2021, शीर्षक वाली रिपोर्ट को जारी किया है, जो दर्शाती है कि कोविड-19 महामारी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के लिये आपदाओं का जोखिम बढ़ रहा है. 

बीमारी, आपदा और जलवायु परिवर्तन का तिहरा ख़तरा ना सिर्फ़ विकट मानवीय परिस्थितियों की वजह बन रहा है, बल्कि इससे व्यापक पैमाने पर आर्थिक नुक़सान भी हो रहा है.

फ़िलहाल, वार्षिक आपदा-सम्बन्धी आर्थिक हानि को औसतन 780 अरब ड़ॉलर आंका गया है. अगर हालात इससे भी बदतर होते हैं तो यह आँकड़ा बढ़कर दोगुना, लगभग 1400 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है.

इसके मद्देनज़र, प्राकृतिक व जैविक जोखिमों को ध्यान में रखते हुए पहले से ही एक किफ़ायती, मुस्तैद रणनीति तैयार किये जाने पर बल दिया गया है. 

इसके लिये 270 अरब डॉलर की वार्षिक धनराशि का अनुमान लगाया गया है.  

आपदा जोखिम न्यूनीकरण के मुद्दे पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि मामी मीज़ूतोरी ने आपदा सहनक्षमता को बेहतर बनाने के लिये निर्णायक कार्रवाई व अन्तरराष्ट्रीय वित्त पोषण की अहमियत पर ज़ोर दिया है. 

वहीं, विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव पेटेरी टालस ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिये उठाये जाने वाले सफल उपायों से रोज़मर्रा के जीवन पर ख़ास असर नहीं होगा.

मगर, इस कार्य में अगर विफलता हाथ लगी तो उसका असर अनेक सदियों तक महसूस किया जाएगा. 

'Asia-Pacific Disaster Report 2021' को डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें.

Share this story