ईजाद के 100 वर्ष बाद भी इंसुलिन, बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने (WHO) ने शुक्रवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा है कि खोज किये जाने के एक शताब्दी बाद भी इंसुलिन, दुनिया भर में, डायबटीज़ के साथ जीवन जीने वाले बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर है. ये रिपोर्ट इंसुलिन की खोज की एक सदी पूरी होने के अवसर पर प्रकाशित की गई है.

इस रिपोर्ट का नाम है - Keeping the 100-year-old promise – making insulin access universal 

रिपोर्ट में ऐसी प्रमुख बाधाओं का विवरण दिया गया है जो इस जीवनरक्षक औषधि की उपलब्धता के रास्ते में आड़े आ रही हैं. इनमें प्रमुख हैं - उच्च क़ीमतें, मानव इंसुलिन की कम उपलब्धता, एक ऐसा बाज़ार जिस पर केवल कुछ ही उत्पादकों का दबदबा है, और कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ.

एकजुटता की क़ीमत पर मुनाफ़ा

इंसुलिन को डायबटीज़ के इलाज में अहम बुनियाद माना जाता है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन, देशों व इस औषधि के निर्माताओं के साथ मिलकर इस लक्ष्य के लिये काम कर रहा है कि इंसुलिन की उपलब्धता उस हर व्यक्ति के लिये आसान हो, जिसे इसकी ज़रूरत है.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा है, “जिन वैज्ञानिकों ने 100 वर्ष पहले इंसुलिन का आविष्कार किया था, उन्होंने अपने लिये इससे कोई मुनाफ़ा कमाना मंज़ूर नहीं किया और इसका बौद्धिक सम्पदा अधिकार केवल एक डॉलर में बेच दिया था.”

“दुर्भाग्य से, वो एक जुटता की वो भावना, बहु-अरबीय डॉलर के कारोबार में दबकर रह गई है, जिसने इंसुलिन की उपलब्धता के क्षेत्र में बहुत बड़ी खाई उत्पन्न कर दी है.”

डायबटीज़ को एक ऐसी बीमारी कहा जाता है जो रक्त में शर्करा यानि शुगर के बढ़े स्तरों के कारण होती है, और दीर्घकाल में ये अवस्था हृदय, रक्त धमनियों, आँखों, गुर्दों और तंत्रिकाओं को गम्भीर नुक़सान पहुँचा सकती.

करोडों हैं वंचित

इस बीमारी के दो रूप हैं. टाइप 1 डायबटीज़, जिसे अतीत में ‘अवयस्क डायबटीज़’ भी कहा जाता था और ये आमतौर पर बच्चों व किशोरों में होती है. ये बहुत लम्बे समय तक चलने वाली एक बीमारी है जिसके कारण, शरीर में या तो बहुत कम या फिर बिल्कुल भी इंसुलिन नहीं बनती है.

दुनिया भर में लगभग 90 लाख लोग टाइप 1 डायबटीज़ के साथ जीवन जी रहे हैं. इंसुलिन का सेवन करने से ये बीमारी, उनके लिये एक ऐसी स्वास्थ्य अवस्था में तब्दील हो जाती है जिसके साथ जीवन जिया जा सकता है.  

दूसरा रूप है डायबटीज़ 2, जो बहुत आम मानी जाती है और ये आमतौर पर वयस्कों में पाई जाती है. ये तब होती है जब शरीर में इंसुलिन के लिये प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो जाती है या फिर शरीर में इसकी समुचित मात्रा का उत्पादन नहीं होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया भर में छह करोड़ से भी ज़्यादा लोग टाइप 2 डायबटीज़ के साथ जीवन जी रहे हैं और इंसुलिन के सेवन से, उनके गुर्दे नाकाम होने, आँखों की रौशनी चले जाने और शरीर का कोई अंग भंग करने का जोखिम कम हो जाता है.  

अलबत्ता, जितने लोगों को इंसुलिन की ज़रूरत है, उनमें से लगभग आधी संख्या यानि दो में से एक मरीज़ को इंसुलिन उपलब्ध नहीं होती है.

निम्न व मध्यम आय वाले देशों में डायबटीज़ बढ़ रहा है, मगर उन देशों में, इंसुलिन का सेवन, इस बीमारी के बढ़ते बोझ की रफ़्तार के साथ ही नहीं बढ़ा है.

इंसुलिन की क़िल्लत को दूर करना

शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में, इंसुलिन और उससे सम्बन्धित उत्पादों की उपलब्धता बेहतर बनाने के उपायों का भी विवरण दिया गया है.

इन उपायों में मानव इंसुलिन का उत्पादन व आपूर्ति बढ़ाना, और इस औषधि के उत्पादन का दायरा इस तरह बढ़ाना कि इसमें प्रतिस्पर्धा का चलन बढ़े, जिससे क़ीमतें कम हों.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी ने बताया है कि वैश्विक बाज़ार, कम लागत में तैयार होने वाली मानव इंसुलिन के उत्पादन से हटकर, ज़्यादा महंगी सिन्थेटिक इंसुलिन के उत्पादन में लग गए हैं, जो मानव इंसुलिन की तुलना में, तीन गुना ज़्यादा तक महंगी हो सकती है.

यूएन एजेंसी ने, इंसुलिन की क़ीमतों पर नियंत्रण स्थापित करके, इसकी उपलब्धता बेहतर बनाने का आहवान किया है. साथ ही, मूल्य पारदर्शिता सुनिश्चित करके और स्थानीय उत्पादकों की क्षमता बढ़ाकर भी इसकी उपलब्धता बेहतर बनाई जा सकती है.

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