अफ़ग़ानिस्तान: लड़कियों व महिलाओं की शिक्षा व अधिकार संरक्षण की पुकार

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने मंगलवार को यूएन महासभा के 76वें सत्र के दौरान आयोजित एक कार्यक्रम में कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान ने अगस्त में सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद से, मानवाधिकारों का सम्मान करने के लिये कुछ प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की हैं, हालाँकि उनकी गतिविधियों में इसके उलट हालात नज़र आते हैं जिनमें उन प्रतिबद्धताओं या वादों का दुखद उल्लंघन दिखाई देता है.

न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय में, अफ़ग़ानिस्तान में अन्तरराष्ट्रीय मौजूदगी के 20 वर्ष के मौक़े पर एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया गया.

मिशेल बाशेलेट ने इस कार्यक्रम में बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में, सार्वजनिक स्थलों से महिलाओं को लगातार बाहर रखा गया है, महिलाओं को किसी पुरुष के बिना घरों से बाहर निकलने पर पाबन्दियाँ लगाई गई हैं और महिलाओं को, कामकाज करने के अधिकार का प्रयोग करने के मामले में बहुत सी पाबन्दियों का सामना करना पड़ रहा है.

यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने कहा, “जो मंत्रालय कभी, महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देता था, उसे ख़त्म कर दिया गया है, और उसकी इमारत व स्थान, नैतिक मूल्यों (सदाचार) के प्रचार और दोष उन्मूलन के मंत्रालय को दे दिये गए हैं, जहाँ केवल पुरुषों का कार्यालय होगा जो सही तरीक़े से कपड़े पहनने और तथाकथित उचित व्यवहार सम्बन्धी दिशा-निर्देश लागू करेगा.”

इससे भी ज़्यादा, तालेबान प्रतिनिधियों ने, देश की पूर्व सरकार द्वारा, महिलाओं के मामलों से सम्बन्धित अनेक कार्यालय बन्द कर दिये हैं, सम्वेदनशील फ़ाइलें अपने क़ब्ज़े में ले ली हैं जिससे स्टाफ़ के लिये जोखिम उत्पन्न हो गया है. साथ ही, महिलाओं के सिविल सोसायटी समूहों और संगठनों पर, “इस्लाम विरोधी” विचार फैलाना के आरोप लगाए हैं.

मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने कहा, “अफ़ग़ान महिलाओं में ये वास्तविक और वाजिब डर बैठा हुआ है कि महिलाओं और लड़कियों पर तालेबान का क्रूर और व्यवस्थागत दमनकारी रवैया फिर शुरू हो जाएगा, जैसा कि 1990 के दशक में हुआ था.”

गम्भीर परिणाम

इस बीच, अफ़ग़ानिस्तान में एक बढ़ते मानवीय संकट के कारण, पूरे देश में लगभग 10 लाख बच्चों के लिये, अत्यन्त गम्भीर भुखमरी का संकट उत्पन्न हो गया है. ये ऐसे परिवार हैं जिनका भरण-पोषण महिलाओं पर निर्भर है – इनमें से ज़्यादातर महिलाएँ अब वेतन या आमदनी वाले रोज़गार या कामकाज नहीं कर सकतीं, ऐसे परिवारों पर सबसे ज़्यादा जोखिम है.

पिछले 20 वर्षों के दौरान, महिलाओं ने अपने लिये ज़्यादा सम्मान और अपनी तालीम व कामकाज के अधिकार को संरक्षण मुहैया कराए जाने, राजनैतिक भागीदारी व आवागन और अपने विचार व्यक्त करने की आज़ादी हासिल करने की दिशा में सक्रियता से काम किया है.

मिशेल बाशेलेट ने कहा, “ये अधिकार, अफ़ग़ान समाज के विकास और बढ़त का एक हिस्सा हैं, और अन्ततः देश के विकास और आर्थिक वृद्धि का भी अभिन्न अंग हैं.”

उन्होंने ध्यान दिलाया कि चूँकि अफ़ग़ान आबादी का आधा हिस्सा महिलाओं और लड़कियों से बनता है, इसलिये उनकी प्रतिभा व क्षमताओं से, अन्ततः देश को ही लाभ होगा.

मानवाधिकारों का सम्मान हो

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि महिलाओं और लड़कियों को आवश्यक सेवाओं तक, पूर्ण और समान पहुँच मुहैया कराई जाए, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा प्राप्ति शामिल है; उन्हें अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में कामकाज करने की इजाज़त हो; बिना किसी पाबन्दी के, कहीं भी जाने-आने की आज़ादी हो; और वो किसी भी तरह की लैंगिक हिंसा से मुक्त माहौल में जीवन जी सकें.

“संक्षिप्त में कहें तो अफ़ग़ान महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों का सम्मान हो और उनकी हिफ़ाज़त की जाए.”

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जब तालेबान के साथ सम्पर्क व बातचीत स्थापित की जाए तो संयुक्त राष्ट्र व इसके सदस्य देशों सहित पूरे अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को, इन बुनियादी ज़रूरतों और अधिकारों की ज़ोरदार हिमायत करनी होगी. समानता पर आधारित, और एक न्यायसंगत समाज के लिये ये बहुत ज़रूरी है.

मिशेल बाशेलेट ने कहा, “अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों का सम्मान किये जाने में, देश के बेहतर भविष्य की सम्भावनाएँ छुपी हुई हैं. उन्हें असाधारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है – और हम उनकी तरफ़दारी में मुस्तैद रहेंगे.”

लड़कियों के लिये स्कूल बन्द

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशक हैनरीएटा फ़ोर ने ध्यान दिलाया कि अफ़ग़ानिस्तान में वर्ष 2002 के बाद से, स्कूलों की संख्या तीन गुना ज़्यादा हो गई है. पिछले एक दशक दौरान, युवाओं में साक्षरता दर 47 प्रतिशत से बढ़कर  65 प्रतिशत हो गई है.

अफ़ग़ानिस्तान में, कोविड-19 के कारण स्कूल बन्द होने से, बच्चों का, दो शैक्षिक वर्षों का नुक़सान हुआ है
UNICEF/Sayed Bidel
अफ़ग़ानिस्तान में, कोविड-19 के कारण स्कूल बन्द होने से, बच्चों का, दो शैक्षिक वर्षों का नुक़सान हुआ है

उन्होंने कहा, “पिछले 20 वर्षों के दौरान, स्कूलों में बच्चों के दाखिलों में दस गुना वृद्धि हुई है, जिसक बदौलत, आज कुल स्कूली छात्रों की संख्या लगभग एक करोड़ पर पहुँच गई है. इनमें से लगभग 40 लाख, लड़कियाँ हैं. ये सब बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं.”

अलबत्ता, बिल्कुल हाल के समय में, 12 वर्ष से ज़्यादा उम्र की लड़कियों को स्कूल जाने से मना कर दिया गया है – विश्वविद्यालय स्तर पर भी लैंगिक विभाजन लागू कर दिया गया है, महिला छात्रों को, पुरुष प्रोफ़ेसरों/ प्राध्यापकों द्वारा पढ़ाए जाने पर भी पाबन्दी लगा दी गई है. ध्यान रहे कि ज़्यादातर प्रोफ़ेसर/प्राध्यापक पुरुष ही हैं. 

यूनीसेफ़ प्रमुख ने इस पर गम्भीर चिन्ता जताई कि बहुत सी लड़कियों को अपनी स्कूली तालीम जारी रखने की शायद कभी इजाज़त ना दी जाए. 

उन्होंने इसे बहुत ज़रूरी क़रार दिया कि अफ़ग़ानिस्तान में सभी बच्चों को तालीम हासिल करने और हुनर व कौशल सीखने के बराबर मौक़े दिये जाएँ, ताकि वो अपनी ज़िन्दगियाँ बेहतर बना सकें.

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